गज़ाला खान
आज हम सभी भष्टाचार पर ना केवल बड़ी बड़ी बातें कर रहे हैं बल्कि दुनिया को ये भी दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि हम सभी भ्रष्ट रूपी उस दानव को जिसको कहीं ना कहीं हमने ही इस काबिल बनाया हैं कि आज वो प्रतिएक भारतीय के जीवन का अभिन्न अंग बन गया हैं, क्या ये बताने कि आवशकता हैं कि हम आज भी अपना छोटे से छोटा काम करने के लिए क्या क्या हथकंडे अपनाते हैं, सिनेमा घर की टिकटों से लेकर न्यायालय तक, यद्दपि सिनेमा मे फिल्म आज नहीं तो कल देखी जा सकती है न्यायालय में तारीख़ जल्दी नहीं तो विलब से मिल सकती हैं परन्तु हम भारतीय उस विचार धारा में विश्वास रखते कि कल करे सो आज कर आज करे सो अब।
सुविधा शुल्क (जिसको समाज के असभ्य लोग रिश्वत का नाम देते हैं ) एक ऐसा टेक्स है जिसको हमारे समाज ने ना केवल स्वीकारा अपितु बड़ी निष्ठा एवं ईमानदारी से अपनाया भी। चलये छोडिये इन बेकार कि बातों को बातें है बातों का क्या, चलिये हम उस भ्रष्टा रुपी दानव को मारने में सक्षम उस शास्त्र (जन लोकपल विधेयक) कि बात करते हैं जिसके बारे मै विगत एक पखवाड़े से तरह तरह कि बातें कुछ जायदा ही हो रही हैं जैसे जन लोकपाल विधेयक ना हुआ अलादीन का चिराग हो, रगड़ते ही, एक जिन आएगा और बोलेगा क्या हुक्म हैं मेरे आका और फिर उस भ्रष्ट रुपी दानव की ख़ैर नहीं........?
मगर सोचने का विषय हैं कि संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र मैं भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए विधेयक, कानून या संस्था नहीं हैं फिर याद आता हैं प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई , सीबीसी आईडी प्रमुख सतकर्ता आयुक्त और लोकायुक्त आदि अनेक संस्थागत विभाग हैं जो केवल भ्रष्टाचार आदि के लिए ही बनाये गए हैं!
लोकायुक्त के सन्दर्भ में बात कुछ अजीब सी हैं कि गुजरात में जहाँ लोकायुक्त जैसी संस्था नहीं है वहां अपेक्षाकृत कम भ्रष्टाचार ज़्यादा हैं बल्कि लोकायुक्त संस्था होते हुए भी कर्नाटक मं अधिक भ्रष्टाचार हैं! पिछले एक वर्ष में अगर दृष्टि डाले तो संज्ञान में आते हैं घोटाले ही घोटाले जैसे 2 जी स्पक्ट्रम घोटाला, आदर्श सोसाइटी घोटाला मुंबई .......आदि! जी स्पक्ट्रम घोटाला कि एक बड़ी ही दिलचस्प बात हैं कि घोटाले कि जांच कर रही लोक लेखा समिति (पीएसी) के सदस्य समाजवादी पार्टी के संसद रेवती रमण सिंह ने जब टाटा समूह के अध्यक्ष और वैष्णवी केशन कि प्रमुख नीरा राडिया के पीएसी के समक्ष उपस्तिथ होने पर सवालों कि झड़ी लगा दी परन्तु जब रिलायंस केशन के प्रमुख अनिल अम्बानी की पेशी होती है तब सिंह साहब पूरी तरह से खामोश रहते हैं एवं शुन्य कल का स्मरण करते है!
आज हम सभी भष्टाचार पर ना केवल बड़ी बड़ी बातें कर रहे हैं बल्कि दुनिया को ये भी दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि हम सभी भ्रष्ट रूपी उस दानव को जिसको कहीं ना कहीं हमने ही इस काबिल बनाया हैं कि आज वो प्रतिएक भारतीय के जीवन का अभिन्न अंग बन गया हैं, क्या ये बताने कि आवशकता हैं कि हम आज भी अपना छोटे से छोटा काम करने के लिए क्या क्या हथकंडे अपनाते हैं, सिनेमा घर की टिकटों से लेकर न्यायालय तक, यद्दपि सिनेमा मे फिल्म आज नहीं तो कल देखी जा सकती है न्यायालय में तारीख़ जल्दी नहीं तो विलब से मिल सकती हैं परन्तु हम भारतीय उस विचार धारा में विश्वास रखते कि कल करे सो आज कर आज करे सो अब।
सुविधा शुल्क (जिसको समाज के असभ्य लोग रिश्वत का नाम देते हैं ) एक ऐसा टेक्स है जिसको हमारे समाज ने ना केवल स्वीकारा अपितु बड़ी निष्ठा एवं ईमानदारी से अपनाया भी। चलये छोडिये इन बेकार कि बातों को बातें है बातों का क्या, चलिये हम उस भ्रष्टा रुपी दानव को मारने में सक्षम उस शास्त्र (जन लोकपल विधेयक) कि बात करते हैं जिसके बारे मै विगत एक पखवाड़े से तरह तरह कि बातें कुछ जायदा ही हो रही हैं जैसे जन लोकपाल विधेयक ना हुआ अलादीन का चिराग हो, रगड़ते ही, एक जिन आएगा और बोलेगा क्या हुक्म हैं मेरे आका और फिर उस भ्रष्ट रुपी दानव की ख़ैर नहीं........?
मगर सोचने का विषय हैं कि संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र मैं भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए विधेयक, कानून या संस्था नहीं हैं फिर याद आता हैं प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई , सीबीसी आईडी प्रमुख सतकर्ता आयुक्त और लोकायुक्त आदि अनेक संस्थागत विभाग हैं जो केवल भ्रष्टाचार आदि के लिए ही बनाये गए हैं!
लोकायुक्त के सन्दर्भ में बात कुछ अजीब सी हैं कि गुजरात में जहाँ लोकायुक्त जैसी संस्था नहीं है वहां अपेक्षाकृत कम भ्रष्टाचार ज़्यादा हैं बल्कि लोकायुक्त संस्था होते हुए भी कर्नाटक मं अधिक भ्रष्टाचार हैं! पिछले एक वर्ष में अगर दृष्टि डाले तो संज्ञान में आते हैं घोटाले ही घोटाले जैसे 2 जी स्पक्ट्रम घोटाला, आदर्श सोसाइटी घोटाला मुंबई .......आदि! जी स्पक्ट्रम घोटाला कि एक बड़ी ही दिलचस्प बात हैं कि घोटाले कि जांच कर रही लोक लेखा समिति (पीएसी) के सदस्य समाजवादी पार्टी के संसद रेवती रमण सिंह ने जब टाटा समूह के अध्यक्ष और वैष्णवी केशन कि प्रमुख नीरा राडिया के पीएसी के समक्ष उपस्तिथ होने पर सवालों कि झड़ी लगा दी परन्तु जब रिलायंस केशन के प्रमुख अनिल अम्बानी की पेशी होती है तब सिंह साहब पूरी तरह से खामोश रहते हैं एवं शुन्य कल का स्मरण करते है!
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