Tuesday, 20 September 2011

टूटते उपग्रह के टुकड़े रहो सावधान



arvish khan
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी (नासा) का दो दशक पुराना मौसम उपग्रह (यूएआरएस) आने वाले शुक्रवार को नष्ट हो जाएगा और उसके कई टुकड़े धरती की सतह पर गिरेंगे जिनमें से कोई टुकड़ा आपके सिर पर भी गिर सकता है।


हालांकि नासा का कहना है कि उपग्रह के कचरे से किसी व्यक्ति के घायल होने या मारे जाने का खतरा काफी कम है। इस बेकार हो चुके उपग्रह के धरती के वायुमंडल में प्रवेश करते ही कई टुकडे हो जाएंगे। वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रति 3200 व्यक्तियों में से सिर्फ एक व्यक्ति के इन टुकड़ों से चोटिल होने का खतरा है।
आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि इस यूएआरएस उपग्रह को धरती के ऊपरी वातावरण पर शोध करने के लिए 1991 में प्रक्षेपित किया गया था। इसका समय 2005 में समाप्त हो गया था। इन 14 वर्षों के दौरान इसने ऊपरी वातावरण में ओजोन जैसे रसायनों पर काफी आकंड़े जुटाए। पिछले कुछ वर्षों से इसकी कक्षा में परिवर्तन हो रहा था और यह तेजी से धरती की तरफ खिंचता जा रहा था।

उल्लेखनीय है कि हर वर्ष यूएआरएस जितने बड़े और बेकार हो चुके उपग्रह धरती के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं। अब तक किसी भी इंसान के इनसे हताहत होने के मामले अब तक देखने में नहीं आए हैं।

बेगानी शादी, मलेशिया दीवाना......


warisha khan
मलेशिया की प्रशासनिक राजधानी पुत्राजया की वो सुबह कुछ अलहदा थी। दरअसल कुआलांलपुर की संगीन नाइट लाइफ का जायजा लेने की वजह से देर से सोये थे और सुबह आठ बजे नींद खुली। मौसम की तबीयत का एहसास करने के लिए खिडकी खोली तो कानों पर शहनाई और तबले से मिलते-जुलते वाद्यों की सुर-ताल में एक धुन ने दस्तक दी। वो राजकपूर की बेहतरीन फिल्मों में एक संगम का सुपर हिट गीत था, शंकर जयकिशन की सुर साधना के शानदार नतीजों में एक बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं? एकबारगी गलतफहमी हुई कि कहीं ये सुबह अपने मोहल्ले की तो नहीं। इस गलतफहमी ने खुशफहमी में तब्दील होने के लिए कुछ वक्त लिया। सुरीली धुन का पीछा करते हुए जब हम होटल की तीसरी मंजिल की ब्रिज गैलरी पर पहुंचे तो बाहर का नजारा वैसा नहीं था जो हम कल सुबह छोडकर कुआलालंपुर के लिए रवाना हुए थे। वहां से हम होटल के अंदरूनी परिसर का जितना भी नजारा ले सकते थे, वो स्थायी चीनी-मलय मिश्रित स्थापत्य के अलावा जितना भी अस्थायी था, पूरी तरह से पारंपरिक भारतीय विवाह समारोह का आभास करा रहा था।

ऐसी भरपूर सजावट, जैसी आप भारत में किसी भी विवाह समारोह में आम तौर पर देखते हैं। हां, शैली कुछ उत्तर-दक्षिण मिली जुली थी, उसी तरह जैसे जिसे हम शहनाई समझ रहे थे, असल में वो दक्षिण भारत की सुरनाई थी। सजावट में कदली स्तंभ (केले के पेड) तो थे ही, नारियल परिवार की भरपूर उपस्थिति थी। हम जैसे अपने यहां आम के पत्तों का वंदनवार सजाते हैं, उनका भी भरपूर इस्तेमाल किया गया था, हां, जब नजदीक से उन्हें नुमाया करने की कोशिश की तो पता लगा कि वो असली नहीं थे। फिर भी माहौल कुछ ऐसा था कि मन ने दिमाग से कहा कि इन्हें असल की तरह ही लो और जो कुछ भी है, उसे असल की तरह ही जियो, एहसास करो। कई गीतों का सफर तय करते हुए इस वक्त सुरनाई राजेश खन्ना के सदाबहार गाने पर आ गई थी, मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू..?
जिंदगी की तमाम चीजें जिस तरह से ग्लोबल हो रही हैं, उसे देखते हुए मलेशिया में भारतीय रीति से शादी का आयोजन कोई अजीब बात तो नहीं है लेकिन भारत से समंदर पार मलेशिया में पूरे भारतीय रस्मो रिवाज के साथ शादी रचते हुए देखना जरूर एक खास किस्म का एहसास था। सभी बाराती भारत से और सभी घराती भारत से। चेन्नई से दो बोइंग घरातियों-बारातियों को लेकर कुआलालंपुर पहुंचे थे। पुरोहित से लेकर शगुन का साज सामान भारत से और इस पूरी गतिविधि के कर्ताधर्ता मलेशिया से, जापान से, कंबोडिया से और फिलीपींस से। ये सारी चीजें अब बहुत कुछ जानने और देखने के लिए प्रेरित कर रही थीं, बाध्य कर रही थीं। बारात की रस्म के लिए हम देर शाम पुत्राजया से 20 किलोमीटर दूर एक दूसरे होटल में पहुंचे। वहां बारातियों के स्वागत लिए पारंपरिक भारतीय व्यंजन संजोने में जुटी एक कंबोडियाई कन्या से जब हमने मलाई की गिलौरी की तरफ इशारा करते हुए उसके बारे में पूछा तो उसने सिरे से अनजानियत जाहिर कर दी। उसके पास एक फाइल थी, जिसमें सिर्फ और सिर्फ आइटम नंबर का जिक्र था और उसे फाइल में दर्ज मेज नंबर पर सजाना भर था। उसके लिए अगर मलाई की गिलौरी एक आइटम थी तो समधियों के लिए राजस्थानी शैली की पगडियां भी एक आइटम ही थीं। उन पगडियों को जिन्हें सिपुर्द करना था, समधी स्तर के वो बाराती भी उनके लिए आइटम ही थे, उनकी फाइल में हर बाराती-घराती के लिए एक नंबर तय था। सभी बारातियों-घरातियों के लिए मोबाइल फोन अनिवार्य था। हर बाराती के लिए एक डायरेक्टरी थी और मैरिज प्लान था। इवेंट मैनेजमेंट का एक पहलू हमने ऐसे भी देखा।

हमारे लिए ये अचरज भरा अनुभव था। अचरज तो और बढ गया जब हमें होटल प्रबंधन से ये जानकारी मिली कि वो औसतन तीन महीने में इस तरह की एक भारतीय शादी का आयोजन करते हैं। ये जानकारी सिर्फ एक होटल के स्तर पर थी। लेकिन ये मामला सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं था। पोर्ट डिक्सन में जब हम वहां के एक होटल प्रबंधन से मिले तो उन्होंने हमें समंदर के रेतीले किनारे पर ले जाकर दिखाया कि वहां दो-दो शादियों की तैयारियां चल रही थी, एक चीनी और दूसरी जापानी। उन्होंने दूसरी तरफ उजडते हुए एक पांडाल की ओर इशारा करते हुए बताया कि कल भी एक जापानी युगल विवाह बंधन की डोर में बंधे हैं। और ये सब कुआलालंपुर, पुत्राजया या पोर्ट डिक्सन तक ही सीमित नहीं है। पोर्ट डिक्सन से लौटते हुए हम वादियों से घिरे एक गांव पहुंचे। वहां के सामुदायिक केंद्र के एक कमरे में पर्यटन विभाग का छोटा सा दफ्तर था। दफ्तर के मुलाजिमों ने हमें बताया कि किस तरह दुनिया के तमाम मुल्क और खासकर दक्षिण एशियाई देशों से लोग मलय परंपरा में निबद्ध तौर तरीकों से यहां विवाह रचाने आते हैं। गांव के मुखिया वहां के स्थानीय स्कूल में अंग्रेजी के अध्यापक भी हैं। उन्होंने तो हमसे पेशकश कर डाली कि अगर मैं खुद चाहूं तो एक बार मलय परंपरा से शादी क्यों न रचा लूं? उन्होंने मुझसे पूछा कि मेरी शादी को कितने साल हो गए? जवाब मिलने के बाद उनका प्रस्ताव था कि क्यों न मुझे शादी की रजत जयंती यहीं आकर मनानी चाहिए। उनके आग्रह में मेजबानी का अवसर उठाने का भाव तो था ही आग्रह में व्यावसायिकता भी भरपूर तरीके से छिपी हुई थी।

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दरअसल पर्यटन मलेशिया के आमदनी उद्यमों में प्रमुख है। वहां की शहरी आबादी का हर चौथा-पांचवां शख्स परोक्ष-अपरोक्ष तरीके से पर्यटन कारोबार से जुडा है। मलेशिया ने पिछले एक दशक के दौरान पारंपरिक पर्यटन से हटकर तमाम नई विधाओं को खोजने की कोशिश की है। विलेज टूरिज्म से लेकर मैरिज टूरिज्म तक। लगभग ढाई करोड आबादी वाले इस मुल्क में भारतीय मूल की आबादी साढे सात फीसदी तक पहुंच गई है। उनमें हिंदू भी हैं, मुस्लिम भी और सिख भी। अपनी उद्यमशीलता के चलते राजनीति से लेकर उद्योग-व्यवसाय में भारतीयों की प्रभावी उपस्थिति झलकती है। हमें वहां ऐसे भारतीय भी मिले जो तीन पीढी से हैं तमाम ऐसे भी जो छह-सात पीढियों से वहां हैं। दो-तीन पीढियों से जो लोग हैं, उनके भारतीय जडों से संपर्क तो कायम हैं लेकिन जो छह-सात पीढियों से हैं, उनमें अब अपनी मूल भारतीय जडों की तलाश जोरों से ललक मार रही है। वहां का पर्यटन विभाग इसमें भी व्यावसायिकता की संभावनाएं देख रहा है। जोर इस बात का है कि लोग तमिलनाडु और केरल में बसे अपने मूल लोगों को तलाशें। उन्हें आमंत्रित करें। हमारे गाइड दत्ता नघेसन, जिनके पूर्वज मूल रूप से केरल के रहने वाले थे, उनका कहना था कि इससे दोहरे पर्यटन की संभावनाएं उपजती हैं। हम वहां जाएंगे और वो यहां आएंगे। मलेशियाई पर्यटन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी चंद्रा सेहगरन थंगास्वामी, जो संयोग से भारतीय मूल के हैं, उनका कहना है कि हम अपने तमाम संस्कारों को भूल गए हैं, हमारे तमाम संस्कार और रीति-रिवाज यहां की शैली से गड्ड-मड्ड हो गए हैं। अगर भारत से हमारे गांव-खानदान के लोग यहां आएंगे, हमारे त्योहारों और पारिवारिक कार्यक्रमों में शामिल होंगे तो हमें अपने वास्तविक रीति-रिवाजों और संस्कारों को समझने में मदद मिलेगी। हमारे संस्कार संशोधित होंगे, परिवर्धित होंगे, परिशोधित होंगे।
आसमान से बातें करती तरक्की
कुदरत ने तो सभी को कुछ न कुछ नायाब चीजें बख्शी हैं लेकिन उन्हें कैसे सहेजा जा सकता है, संवारा जा सकता है, इसे देखना हो तो मलेशिया एक बेहतर जगह हो सकती है। पाम के मीलों लंबे खेत फोटोजेनिक हो सकते हैं और टिन की बेकार हो चुकी गहरी खदानें न सिर्फ वाटर पार्क में तब्दील हो सकती हैं बल्कि शहर की जलापूर्ति में भी भरपूर मददगार हो सकती हैं। कई किलोमीटर तक फैली एक शानदार सुंदर झील के पहले का चित्र देखकर विश्वास ही नहीं हुआ कि टिन माइनिंग के चलते बंजर वीराना हो चुका इलाका आदमजात के हाथों प्राकृतिक सौंदर्य को मात करने वाली सुंदरता हासिल कर सकता है। अगर हम आजाद मलेशिया की बात करें तो वो भारत से कुल दस साल छोटा है। यानी मलेशिया को ब्रिटिश राजशाही से 1957 में आजादी मिली, महीना अगस्त का ही था। 13 राज्यों और अपने यहां के चंडीगढ की तरह तीन संघ शासित राज्यों वाला ये मुल्क घोषित इस्लामी देश है। आम तौर तरीकों से लेकर कानूनी बंदिशों तक हर जगह इस्लामी आग्रह पूरी शिद्दत से मौजूद है। लेकिन.. धार्मिक आग्रहों के बीच व्यावसायिक-औद्योगिक तालमेल जबर्दस्त है।



 आर्थिक उबाल के रास्ते में धार्मिक बंदिशों का ठंडापन आडे नहीं आता। आपको बाहर से जो इमारत एक सितारा होटल की तरह लग रही है, दरअसल वो आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं से भरपूर एक अति आधुनिक अस्पताल हो सकता है या किसी अमेरिकन-यूरोपीय यूनिवर्सटी की फ्रेंचाइजी। पूर्ण सरकारी खर्चे पर प्राथमिक (बेसिक) शिक्षा अनिवार्य है और उसमें भी स्कूली शिक्षा में अंग्रेजी की एकदम अनिवार्यता है।
मलेशिया ने ये काफी पहले समझ लिया था कि टिन, रबर, पाम और पेट्रोलियम जैसे परंपरागत साधनों के बल पर ही वो सब कुछ नहीं हासिल किया जा सकता जो आर्थिक रूप से मजबूत एक मुल्क के लिए जरूरी है। उसने पर्यटन को भविष्य की भरपूर संभावनाओं के तौर पर देखा और सबसे पहले अपनी तस्वीर बदलने की ठानी। आधुनिक मलेशिया के निर्माता कहे जाने वाले डॉ. महातिर मोहम्मद की धारणा ही यही थी कि तस्वीर बदलेगी तो तासीर भी बदलेगी और तदबीर भी। खासकर पश्चिमी मलेशिया में उन्नत राजमार्ग, दुनिया के महंगे से महंगे ब्रांड्स से भरे पडे विशालकाय माल्स और गगनचुंबी इमारतें, भूख और बेकारी की समस्या से अभी भी जूझ रहे दक्षिण एशिया की तस्वीर को धुंधली करने की कोशिश करते दिखते हैं। ये बात अब पूरे दम से नहीं कही जा सकती कि दुनिया की सबसे ऊंची जुडवां इमारत पेट्रोनास को शहर के हर हिस्से से देखा सकता है। दर्जनों आसमान छूती इमारतें उससे होड लेती दिखती हैं। लोगों की नजरों में कुआलालंपुर भले ही दुनिया की सर्वाधिक व्यवस्थित आकर्षक राजधानियों में एक थी, लेकिन इस देश ने एक और नई राजधानी बनाने की ठानी, जो पहले प्रधानमंत्री तुंकु अब्दुल रहमान पुत्रा के नाम पर पुत्राजया के रूप में आज दुनिया के सामने है। इतने कम समय में इतने व्यापक और विस्तृत निर्माण के लिए नजीर के तौर पर पेश किये जाने वाले इस शहर को मुल्क का एक वर्ग सफेद हाथी के रूप में भी मानता है, खासकर वाम विचारों के लोग। 
बेशक तमाम उजालों के अंधेरे पहलू भी होते हैं। विकास की तमाम तहों में मलेशिया में भ्रष्टाचार भी रह-रह कर उघडता है और कई बडे पदों पर बैठे हुए लोगों के दामन दागदार हुए हैं, खुद डॉ. महातिर मोहम्मद भी आरोपों से बचे नहीं। चकाचौंध के बीच रातभर जागने वाले शहर कुआलालंपुर में रंगीनियों की अपनी अलग दुनिया है, उसमें जिस्मानी कारोबार का सबब बना दूसरे मुल्कों से अवैध आव्रजन का मामला भी शुमार है और अंडरवर्ल्ड का भी। शुद्धता का हामी यहां का एक तबका ये डर जताने में संकोच नहीं करता कि कि चौतरफा आधुनिकता की जबरदस्त होड सुदूर गांवों में छिपी पाक मलय संस्कृति को अपनी ओर खींच रही है। एक तबका अब शहरों से गांवों को दूर रखने के लिए आंदोलित है, उसका कहना है कि मलेशिया सिर्फ सात सितारा होटलों, लंबे चौडे राजमागरें और जिंटेंग हाईलैंड्स जैसे अजूबों की वजह से ही नहीं है, मलेशिया उस मलय शब्द से है जिसका मूल मलय या संस्कृत में एक अर्थ होता है पवित्र पहाडों के बीच बसा पवित्र देश।

तब्दील होगा होटल में सिंगापुर का मरलॉयन

arvish khan
सिंगापुर की खास पहचान मरलॉयन अब एक होटल में तब्दील होने जा रहा है। सिंगापुर का नाम लेने पर सैलानियों के जेहन में आने वाली छवियों में एक सबसे प्रमुख मैरिना बे में खडे मुंह से पानी गिराते आठ मीटर ऊंचे मरलॉयन की भी है। अब सिंगापुर की संस्कृति का यह खास प्रतीक मशहूर जापानी कलाकार तात्जू निशी के डिजाइन किए हुए होटल में तब्दील होने जा रहा है। यह तब्दीली सिंगापुर आर्ट म्यूजियम द्वारा आयोजित किए जाने वाले सिंगापुर बाइनेल (द्विवार्षिकी) का हिस्सा है। 13 मार्च से 15 मई 2011 के बीच होने वाले बाइनेल का यह तीसरा संस्करण है।
मरलॉयन का नया स्वरूप दरअसल अपने आप में एक कलाकृति है जो उसे एक अस्थायी शानदार होटल स्वीट का रूप दे देगी। दिन के समय (सवेरे 10 बजे से शाम 7 बजे तक) यह आम लोगों के देखने के लिए उपलब्ध रहेगा तो शाम के वक्त यह होटल के कमरे के तौर पर रात गुजारने के इच्छुक लोगों को किराये पर मिल सकेगा।

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इस अनुभव को उठाने के इच्छुक लोग 28 फरवरी 2011 से बुकिंग कराना शुरू कर सकते हैं। यह कमरा 4 अप्रैल से 5 मई के बीच दो वयस्क लोगों को 150 सिंगापुर डॉलर की दर पर एक रात के लिए उपलब्ध रहेगा। एक कमरे के इस होटल में सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं- डबल बेड, बाथरूम, खास मरलॉयन होटल बटलर और सिंगापुर फुलर्टन होटल में सुबह का नाश्ता। हर मेहमान को वहां पहुंचने पर मेजबानों की तरफ से विशेष तोहफे भी मिलेंगे। और तो और, आम लोगों के लिए एक कॉंटेस्ट भी रखी गई है जिसमें बाइनेल की पहली व आखिरी रात (13 मार्च व 15 मई) को मरलॉयन होटल में ठहरने का मुकाबला जीता जा सकता है। इस मुकाबले में शामिल होने के लिए लोगों को सौ शब्दों में अपनी निजी कहानी लिखनी होगी कि क्यों उन्हें मरलॉयन होटल में रात गुजारने का मौका दिया जाना चाहिए। सिंगापुर मरलॉयन को सबसे पहले 1972 में आठ मीटर ऊंची कलाकृति के तौर पर बनाकरसिंगापुर नदी के मुहाने पर स्थापित किया गया था- सिंगापुर आने वाले सभी लोगों का स्वागत करने के लिए। उस समय इसकी लागत 1.65 लाख सिंगापुर डॉलर आई थी। उसे एक स्थानीय शिल्पकार लिम नांग सेंग ने बनाया था, जिसने शिल्प में कई मुकाबले जीते हुए थे। 15 सितंबर 1972 को इसे औपचारिक रूप से तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वारा स्थापित किया गया। लेकिन 15 सितंबर 2002 को इसे वन फुलर्टन के निकट मरलॉयन पार्क में इसकी मौजूदा जगह पर ले जाया गया जो ठीक मैरिना बे पर है। अब इस नई कलाकृति को रूप देने के लिए मरलॉयन को 7 फरवरी को ढक दिया गया है। 9 मार्च तक यह ऐसे ही रहेगा। 11 मार्च को इसका अनावरण होगा। एक बार सिंगापुर बाइएनेल 15 मई को खत्म हुआ तो 16 मई से 5 जून तक इसे फिर इसे अपने मूल स्वरूप में लाने का काम चलेगा और 6 जून को मरलॉयन फिर अपने असली रूप में लोगों के सामने होगा। इस सिंगापुर बाइएनेल का एक और खास आकर्षण होगा। मैरिना बे पर लाइट शो की जगह इस बार राफेल लोजानो-हेमर की एक अद्भुत कलाकृति होगी जिसमें लोग पुराने कलांग एयरपोर्ट की लंबी दीवार पर अपनी छाया डालकर मनपसंद रेडियो स्टेशन सुन सकेंगे। एक कंप्यूटराइज्ड टै्रकिंग सिस्टम उनकी छाया के स्थान और आकार के अनुरूप रेडियो फ्रीक्वेंसी ट्यून करेगा और वोल्यूम भी नियंत्रित करेगा। बस, लोग छाया हिलाएंगे और सुनेंगे मनपसंद स्टेशन।

Thursday, 15 September 2011

हैरत: मरने के बाद दुबारा आ गई जान




जिले के सिंहवाडा प्रखंड में हुई एक घटना को जहां कुछ लोग चमत्कार मान रहे हैं वही कुछ इसे ऊपर वाले की कृपा मान रहा है। हुआ यूं कि सिंहवाडा प्रखंड के भरवाडा पुरानी बाजार निवासी शत्रुघ्न साह की पुत्री रागिनी देवी प्रेगनेंट थीं। बीती रात रागिनी ने एक बच्ची को जन्म दिया। बच्ची के जन्म के बाद उसकी हालत बिगड़ गई। वह बेहोश हो गई। फिर उसकी सांसें थम सी गई। घर में रोना-धोना शुरू हो गया।
शरीर को हिलाया-डुलाया। लेकिन, कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। परिजनों ने उसे मृत मान लिया। उसके अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू कर दी गई। सभी उसे अर्थी पर लेकर श्मशान घाट पहुंच गए। चिता सजाई ही जा रही थी कि तभी लोगों ने देखा कि उसके शरीर में कंपन हो रही है। इसके बाद अचानक से वह जिंदा हो उठी। आसपास के लोग हैरत में पड़ गए। कई डर कर वहां से भाग गए तो कुछ ने जाकर फ़ौरन डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर ने नब्ज़ टटोली तो उसकी नब्ज चलती मिली। इसके बाद उसे अर्थी पर ही अस्पताल ले जाया गया। वहां फिलहाल उसका इलाज चल रहा है।

Wednesday, 14 September 2011

सऊदी अरब: विदेशी नर्सों की नौकरी खतरे में

arvish khan
सऊदी अरब ने देश के अस्पतालों में मरीजों की देखभाल के काम में स्थानीय लोगों को वरीयता देने की योजना बनाई है जिससे भारत सहित विदेशी नर्सों की नौकरी खतरे में पड़ने की आशंका है। सऊदी गजट में प्रकाशित एक रपट के मुताबिक, सऊदी अरब के स्वास्थ्य मंत्रालय की प्रशासनिक इकाइयों को जारी एक सर्कुलर में कहा गया है कि जिन विदेशी नर्सों ने सेवा के 10 वर्ष पूरे कर लिए हों, उनका अनुबंध खत्म कर दिया जाएगा।
रपट के मुताबिक होमोडायलेसिस, आपात एवं आईसीयू चिकित्सा के क्षेत्रों में दक्ष नर्सों को तत्काल नहीं हटाया जा सकेगा और उन्हें नौकरी में बने रहने दिया जाएगा। स्थानीयकरण योजना दूर दराज के इलाकों में स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के लिए काम कर रही नर्सों पर तब तक लागू नहीं होगी जब तक उनकी जगह काम करने के लिए सक्षम स्थानीय नर्सें नहीं मिल जातीं। रपट में मंत्रालय के एक अधिकारी के हवाले से लिखा गया है कि प्रशासनिक इकाइयों को इन दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन करने को कहा गया है।
http://visharadtimes.com/

Monday, 12 September 2011

भारतीय महिलाओ का बाजारी करण

Gazala Khan
भारतीय महिलाओ को आजकल विज्ञापन के माध्यम से बाजार में परोसा जा रहा है। जिससे भारतीय सभ्यता और समाजिक मान्यताओ पर गहरा असर पड रहा है। अब तो देश की सर्वश्रेष्ठ अदालत ने भी नये बाजार को मान्यता देने के लिये विचार शुरू कर दिया है। 
एक वह बाजार है, जो परंपरा से सजा हुआ है और दूसरा वह बाजार है, जिसने औरतों के लिए एक नया बाजार पैदा किया है। जबकी महिलाओ के शरीर की नुमाइश कर मीडिया लोकप्रियता (टीआरपी) बढाने में चौबिसो घंटे प्रयासरत रहती हैं।
 
समय-समय पर देहव्यापार को कानूनी अधिकार देने की बातें इस देश में भी उठती रहती हैं। हर मामले में दुनिया की नकल करने पर आमादा हमारे लोग वैसे ही बनने पर उतारू हैं। जाहिर तौर पर यह संकट बहुत बड़ा है। ऐसा अधिकार देकर हम देह के बाजार को न सिर्फ कानूनी बना रहे होंगे, बल्कि मानवता के विरुद्ध एक अपराध भी कर रहे होंगे।
हम देखें तो सुप्रीमकोर्ट की पहल के बाद एक बार फिर वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता देने की बातचीत तेज हो गई है। यह बहस हाल में ही सुप्रीमकोर्ट द्वारा इस मामले में वकीलों के पैनल व विशेषज्ञों से उस राय के मागने के बाद छिड़ी है, जिसमें कोर्ट ने पूछा है कि क्या ऐसे लोगों को सम्मान से अपना पेशा चलाने का अधिकार दिया जा सकता है? उनके संरक्षण के लिए क्या शर्ते होनी चाहिए?
कुछ समय पहले काग्रेस की सासद प्रिया दत्त ने वेश्यावृत्ति को लेकर एक नई बहस छेड़ दी थी, तब उन्होंने कहा था, ‘मेरा मानना है कि वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता प्रदान कर देनी चाहिए ताकि यौन कर्मियों की आजीविका प्रभावित न हो।’ प्रिया के बयान के पहले भी इस तरह की मागें उठती रही हैं। कई संगठन इसे लेकर बात करते रहे हैं। खासकर ‘पतिता उद्धार सभा’ ने वेश्याओं को लेकर कई महत्वपूर्ण मागें उठाई थीं।
हमें देखना होगा कि आखिर हम वेश्यावृत्ति को कानूनी जामा पहनाकर क्या हासिल करेंगे? क्या भारतीय समाज इसके लिए तैयार है कि वह इस तरह की प्रवृत्ति को सामाजिक रूप से मान्य कर सके। दूसरा विचार यह भी है कि इससे इस पूरे दबे-छिपे चल रहे व्यवसाय में शोषण कम होने के बजाए बढ़ जाएगा। आज भी यहा स्त्रिया कम प्रताड़ित नहीं हैं। 
दुनिया भर की नजर इस समय औरत की देह को अनावृत करने में है। ये आकड़े हमें चौंकाने वाले ही लगेंगे कि 100 बिलियन डॉलर के आसपास का बाजार आज देह व्यापार उद्योग ने खड़ा कर रखा है। हमारे अपने देश में भी 1 करोड़ से ज्यादा लोग देह व्यापार से जुड़े हैं, जिनमें पांच लाख बच्चे भी शामिल हैं।
सेक्स और मीडिया के समन्वय से जो अर्थशास्त्र बनता है, उसने सारे मूल्यों को शीर्षासन करवा दिया है। फिल्मों, इंटरनेट, मोबाइल, टीवी चैनलों से आगे अब वह मुद्रित माध्यमों पर पसरा पड़ा है। प्रिंट मीडिया जो पहले अपने दैहिक विमर्शाे के लिए ‘प्लेबॉय’ या ‘डेबोनियर’ तक सीमित था, अब दैनिक अखबारों से लेकर हर पत्र-पत्रिका में अपनी जगह बना चुका है।
अखबारों में ग्लैमर वर्ल्ड के कॉलम ही नहीं, खबरों के पृष्ठों पर भी लगभग निर्वसन विषकन्याओं का कैटवाक खासी जगह घेर रहा है। वह पूरा हल्लाबोल 24 घटे के चैनलों के कोलाहल और सुबह के अखबारों के माध्यम से दैनिक होकर जिंदगी में एक खास जगह बना चुका है। शायद इसीलिए इंटरनेट के माध्यम से चलने वाला ग्लोबल सेक्स बाजार करीब 60 अरब डॉलर तक जा पहुंचा है। मोबाइल के नए प्रयोगों ने इस कारोबार को शक्ति दी है।
एक आकड़े के मुताबिक मोबाइल पर अश्लीलता का कारोबार भी पांच सालों में पांच अरब डॉलर तक जा पहुंचेगा।
बाजार के केंद्र में भारतीय स्त्री है और उद्देश्य उसकी शुचिता का अपहरण है। सेक्स सांस्कृतिक विनिमय की पहली सीढ़ी है। शायद इसीलिए जब कोई भी हमलावर किसी भी जातीय अस्मिता पर हमला बोलता है तो निशाने पर सबसे पहले उसकी औरतें होती हैं। यह बाजारवाद अब भारतीय अस्मिता के अपहरण में लगा है- निशाना भारतीय औरतें हैं।
ऐसे बाजार में वेश्यावृत्ति को कानूनी जामा पहनाने से जो खतरे सामने हैं, उससे यह एक उद्योग बन जाएगा। आज कोठेवालिया पैसे बना रही हैं तो कल बड़े उद्योगपति इस क्षेत्र में उतरेंगे। युवा पीढ़ी पैसे की ललक में आज भी गलत कामों की ओर बढ़ रही है, कानूनी जामा होने से यह हवा एक आंधी में बदल जाएगी। इससे हर शहर में ऐसे खतरे आ पहुंचेंगे। जिन शहरों में यह काम चोरी-छिपे हो रहा है, वह सार्वजनिक रूप से होने लगेगा। ऐसी कालोनिया बस जाएंगी और ऐसे इलाके बन जाएंगे।
संभव है कि इसमें विदेशी निवेश और माफिया का पैसा भी लगे। हम इतने खतरों को उठाने के लिए तैयार नहीं हैं। जाहिर तौर पर स्थितिया हतप्रभ कर देने वाली हैं। इनमें मजबूरियों से उपजी कहानिया हैं तो मौज-मजे के लिए इस दुनिया में उतरे किस्से भी हैं। भारत जैसे देश में लड़कियों को किस तरह इस व्यापार में उतारा जा रहा है, ये किस्से आम हैं। आदिवासी इलाकों से निरंतर गायब हो रही लड़किया और उनके शोषण के अंतहीन किस्से इस व्यथा को बयान करते हैं।
खतरा यह है कि शोषण रोकने के नाम पर देहव्यापार को कानूनी मान्यता देने के बाद सेक्स रैकेट को एक कारोबार का दर्जा मिल जाएगा।
सबसे बड़ा खतरा हमारी सामाजिक व्यवस्था के लिए पैदा होगा, जहा देह व्यापार भी एक प्रोफेशन के रूप में मान्य हो जाएगा। आज चल रहे गुपचुप सेक्स रैकेट कानूनी दर्जा पाकर अंधेरगर्दी पर उतर आएंगे। परिवार नाम की संस्था को भी इससे गहरी चोट पहुंचेगी। हमें देखना है कि क्या हमारा समाज इस तरह के बदलावों को स्वीकार करने की स्थिति में है। यह भी बड़ा सवाल है कि क्या औरत की देह को उसकी इच्छा के विरुद्ध बाजार में उतारना और उसकी बोली लगाना उचित है? क्या औरतें एक मनुष्य न होकर एक वस्तु में नहीं बदल जाएंगी, जिनकी बोली लगेगी और वे नीलाम की जाएंगी? स्त्री की देह का मामला सिर्फ श्रम को बेचने का मामला नहीं है।
देह और मन से मिलकर होने वाली क्रिया को हम क्यों बाजार के हवाले कर देने पर आमादा हैं, यह एक बड़ा मुद्दा है। औरत की देह पर सिर्फ और सिर्फ उसका हक है। उसे यह तय करने का हक है कि वह उसका कैसा इस्तेमाल करना चाहती है। इस तरह के कानून औरत की निजता को एक सामूहिक प्रोडक्ट में बदलने का वातावरण बनाते हैं। अपने मन और इच्छा के विरुद्ध औरत के जीने की स्थितिया बनाते हैं। यह अपराध कम से कम भारत की जमीन पर नहीं होना चाहिए।
स्त्री आज के समय में घर और बाहर दोनों स्थानों पर अपेक्षित आदर प्राप्त कर रही है। वह समाज को नए नजरिये से देख रही है। उसका आकलन कर रही है और अपने लिए निरंतर नए क्षितिज खोल रही है। ऐसी सामर्थ्यशाली स्त्री को शिखर छूने के अवसर देने के बजाए हम उसे बाजार के जाल में फंसा रहे हैं। वह अपनी निजता और सौंदर्यबोध के साथ जीने की स्थितिया और आदर समाज जीवन में प्राप्त कर सके, हमें इसका प्रयास करना चाहिए। हमारे समाज में स्त्रियों के प्रति धारणा निरंतर बदल रही है।
स्त्री सही मायने में इस दौर में ज्यादा शक्तिशाली होकर उभरी है, लेकिन बाजार हर जगह शिकार तलाश ही लेता है। वह औरत की शक्ति का बाजारीकरण करना चाहता है। हमें देखना होगा कि भारतीय स्त्री पर मुग्ध बाजार उसकी शक्ति तो बने, लेकिन उसका शोषण न कर सके।
आज मीडियामय और विज्ञापनी बाजार में औरत के लिए हर कदम पर खतरे हैं। पल-पल पर उसके लिए बाजार सजे हैं। देह के भी, रूप के भी, प्रतिभा के भी, कलंक के भी। हद तो यह कि कलंक भी पब्लिसिटी के काम आ रहे हैं, क्योंकि यह समय कह रहा है कि दाग अच्छे हैं। बाजार इसी तरह से हमें रिझा रहा है और बोली लगा रहा है। हमें इस समय से बचते हुए इसके बेहतर प्रभावों को ग्रहण करना है। सुप्रीमकोर्ट को चाहिए कि वह ऐसे लोगों की मंशा को समझे, जो औरत को बाजार की वस्तु बना देना चाहते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर महिलाओं के प्रति अपनी संवेदनशीलता का परिचय देते हुए परमादेश जारी किया है कि केंद्र और राच्य सरकारें एक सर्वेक्षण करके उन यौन कर्मियों के बारे में बताएं, जो अपने जीवन को बेहतर ढंग से जीने की इच्छा रखती हैं, ताकि उन्हें बेहतर और श्रेष्ठ कामों के मौके दिए जा सकें और वे एक सम्मानित जीवन जी सकें।
अपने आप में यह एक प्रगतिशील फैसला है, क्योंकि इससे यौनकर्म में दासता और अपमान का जीवन जी रही लाखों महिलाओं को मुक्ति की आशा और राह दिखाई दे रही है। बेशक यौन कर्मियों के पुनर्वास और तकनीकी हुनर विकास के लिए दिया यह आदेश स्वागत योग्य है, लेकिन इससे भी कई बड़े सवाल हैं, जो कहीं आगे सोचने पर मजबूर करते हैं। यौन कर्म या यौन व्यापार में शामिल महिलाओं का पुनर्वास समस्या का सिर्फ एक पक्ष है। उससे जुड़े और भी गंभीर मुद्दे हैं, जैसे पारिवारिक और सामाजिक स्वीकृति, सम्मान और पहचान, श्रम-मूल्य और उनके वैकल्पिक श्रम को मान्यता।
कड़वा सच तो यह है कि आज दलितों के पास श्रम विकल्प मौजूद हैं, मगर सामाजिक स्वीकृति न होने के कारण आज भी उन्हें अछूत माना जाता है। आज भी असंख्य लोग सामाजिक स्वीकृति के अभाव में अपने जातीय व्यवसाय को ही अपनाए रखने पर विवश हैं। पारिवारिक और सामािजक स्वीकृति के अभाव में कितनी ही यौनकर्मी महिलाएं जिल्लत और अपमान का जीवन जीने पर विवश होकर वापस इसी व्यवसाय में लौट आती हैं।
दुनिया के बहुत से देशों में यौन कर्म को एक वैध व्यापार के रूप में मान्यता प्राप्त है। वहा इसे इतनी हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता। यह भी एक प्रकार का श्रम ही माना जाता है। एक मजदूर अपनी मेहनत बेचकर मजदूरी प्राप्त करता है और एक कलाकार अपने कलात्मक श्रम का मूल्य पाता है। इसी तरह एक यौन कर्मी अपने कलात्मक दैहिक श्रम का मूल्य पाती है। इसलिए उसमें हेयता और तुच्छता की सोच नहीं होनी चाहिए। अन्य श्रम व्यापारों की ही भाति उसका भी नियमन और उसे मान्यता दी जानी चाहिए।
दूसरी बात यह कि आज यौन कर्म एक अवैध व्यापार है, मगर फिर भी वह धड़ल्ले से जारी है। आम आदमी से लेकर बड़े और सम्मानित जनों तक यौन कर्म की महिमा व्याप्त है। यौन कर्म को वैध करार दिए जाने से उससे जुड़े तमाम अवैध कार्याे और तरीकों को रोका जा सकता है। एक व्यापारी की भाति अपना पूरा मूल्य पाने का अधिकार यौन कर्मियों को मिल सकता है। उन्हें दलालों और पेशेवर व्यापारियों के जाल में फंसने से बचाया जा सकता है। बस जो होता है, वह चोरी छिपे होता है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण हमें अपने इतिहास से ही मिल जाता है।
न्यूजीलैंड, फिलिपींस, थाइलैंड, कनाडा जैसे देशों की भांति अगर भारत समेत दूसरे देशों में यौन कर्म एक वैध व्यापार के रूप में स्वीकृत होता है तो इससे यौन कर्मियों के साथ होने वाले भेदभाव, जबरदस्ती और हिंसा को रोका जा सकेगा। वैधता के रहते उन्हें अपना मूल्य, अपनी इच्छा-अनिच्छा और मोल-भाव करने की आजादी प्राप्त होगी। वे दलालों और ठेकेदारों के चंगुल से आजाद और आगाह होंगी। उन्हें देह-व्यापार के वैध और अवैध रूप के बारे में जानकारी होगी। यौन सावधानियों और सुरक्षा उपायों पर उनका नियंत्रण होगा। ठीक उसी तरह जैसे अन्य किसी भी तरह के व्यापार में व्यापारियों के हाथ में नियंत्रण होता है। यौन कर्मी स्त्रिया ग्राहक और ठेकदार पुरुषों के शोषण को चुनौती दे पाएंगी।
बेशक, पुनर्वास और तकनीकी हुनर विकास यौनकर्मियों के लिए एक बेहतरीन विकल्प है, मगर तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि पुनर्वास के बाद भी तमाम स्त्रियां इस व्यापार में लौट आती हैं। दरअसल, समाज में दोबारा उन्हें न तो परिवार स्वीकार करता है और न ही उन्हें सम्मानित दर्जा मिल पाता है। यौन कर्म को वैधता मिल जाने पर उनके बच्चों को समाज और शिक्षा की मुख्य धारा के साथ जोड़ा जा सकेगा। उनके बच्चों को बेहतर विकल्पों और श्रम क्षेत्रों में आगे बढ़ने के मौके दिए जा सकेंगे।
यौन कर्म की वैधता इस क्षेत्र में चोरी छिपे चल रहे व्यापारों और धाधलियों को रोक सकती है। एक व्यापार के रूप में शासकीय नियंत्रण में वह एक बेहतर व्यापारिक क्षेत्र साबित हो सकता है।

एक और नये चांद की खोज

 अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने घोषणा की है कि खगोलविदों ने बर्फीले बौने ग्रह प्लूटो का चक्कर लगाते एक चैथे चांद की खोज की है।
इस छोटे से नए उपग्रह को अस्थायी तौर पर पी4 नाम दिया गया है। हबल अंतरिक्ष टेलीस्कोप से प्लूटो के चारों ओर बने छल्लों की खोज की जा रही थी और इसी दौरान इस नए उपग्रह के सम्बंध में पता चला। पी4 को सबसे पहले हबल के वाइड फील्ड कैमरा 3 से 28 जून को ली गई एक तस्वीर में देखा गया था। इसके बाद तीन जुलाई और 18 जुलाई को हबल से ली गई अन्य तस्वीरों में इसकी पुष्टि हुई।
यह प्लूटो का चक्कर लगाने वाला अब तक का सबसे छोटा चंद्रमा है। इसका अनुमानित व्यास 13 से 34 किलोमीटर तक है। दूसरी ओर प्लूटो के सबसे बड़े चांद, कैरान का व्यास 1,043 किलोमीटर है। अन्य दो चांदों, निक्स व हाइड्रा का व्यास क्रमशः 32 किलोमीटर व 113 किलोमीटर है।
इस कार्यक्रम से जुड़े कैलीफोर्निया के एसईटीआई संस्थान के मार्क शोवाल्टर का कहना है कि मुझे यह
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बहुत असाधारण लगा कि हबल के कैमरों से हम इतने सूक्ष्म उपग्रह को तीन अरब मील (या पांच अरब किलोमीटर) से भी लंबी दूरी पर इतनी स्पष्टता के साथ देख सके।
पी4, निक्स व हाइड्रा की कक्षाओं के बीच स्थित है। निक्स व हाइड्रा को 2005 में हबल के जरिए ही खोजा गया था। अमेरिकी नौसेना वेधशाला ने 1978 में कैरान को खोजा था। साल 1990 में हबल के इस्तेमाल से यह स्पष्ट हुआ कि यह प्लूटो से अलग उपग्रह है।

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बनाया एमएमएस स्कूली छात्रा से सामूहिक दुष्कर्म करके

gazala khan
पतौवापुरा गांव की 14वर्षीय एक छात्रा से शाहपुर के ही तीन युवकों ने सामूहिक दुष्कर्म कर उसका ‘एमएमएस’ तैयार कर लिया। ‘साइबर क्राइम’ अब महानगरों से निकल कर दूरस्थ ग्रामीण अंचलों तक पहुंच चुका है,जिसकी एक झलक बैतूल जिले के आदिवासी बहुल शाहपुर तहसील में देखने को मिली,
शाहपुर पुलिस थाने के प्रभारी (टीआई) विल्सन मैनुअल ने आज यहा बताया कि लगभग चार माह बाद इस बात का खुलासा तब हुआ जब आरोपी युवकों ने ‘एमएमएस’ के जरिए छात्रा को श्ब्लैकमेलश् करना शुरू कर दिया। बालिका ने परिजन के साथ थाने पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने मामला दर्ज कर कल दोपहर में जिला अस्पताल में स्कूली छात्रा का मेडिकल परीक्षण कराया है।
पुलिस में दर्ज रिपोर्ट के अनुसार, जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के पतौवापुरा गाव की 14 वर्षीय एक छात्रा के पास गत 29 मार्च को शाहपुर के ही दो युवक आए और ‘गेस पेपर’ देने का लालच दिया। इसके लिए वे उसे चोपना रोड स्थित एक शिवमंदिर के निकट सुनसान इलाके में ले गए और वहा मौजूद एक साथी के साथ मिलकर उन्होंने उससे सामूहिक दुष्कर्म किया।
दुष्कर्म के दौरान युवकों ने मोबाइल से इस कृत्य की ‘क्लिप’ भी तैयार कर ली। यह बालिका शाहपुर के एक निजी स्कूल में पढ़ती है। घटना के बाद युवक स्कूली छात्रा को इस ‘क्लिप’ को ‘एमएमएस’ के जरिए सार्वजनिक करने की धमकी देकर ‘ब्लैकमेल’ करते रहे। इस दौरान युवकों ने कई बार छात्रा से दुष्कर्म किया।
‘ब्लैकमेल’ से तंग आकर छात्रा ने यह बात अपनी मा को बताई, जिसके बाद छात्रा के पिता ने आरोपियों के खिलाफ शाहपुर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई।
शाहपुर टीआई मैनुअल ने बताया कि इस बालिका ने आरोपी युवकों का नाम ह्मदेश, बाबू जगताप एवं गिरीश बताया है। ये तीनों युवक शाहपुर बाजार में दुकान लगाते हैं। मामले की शिकायत उसने कलेक्टर बी. चन्द्रशेखर एवं एसडीएम के. वासुकी से भी की है।
उन्होंने कहा कि तीनों आरोपी फरार हैं और उनकी तलाश की जा रही है। आरोपियों के खिलाफ छह अलग-अलग धाराओं 363, 366, 376 (2-जी) 506 के तहत प्रकरण दर्ज किया गया है। उनकी तलाशी के लिए कई स्थानों पर छापे मारे जा रहे हैं।

बनाया एमएमएस स्कूली छात्रा से सामूहिक दुष्कर्म करके

gazala khan
पतौवापुरा गांव की 14 वर्षीय एक छात्रा से शाहपुर के ही तीन युवकों ने सामूहिक दुष्कर्म कर उसका ‘एमएमएस’ तैयार कर लिया। ‘साइबर क्राइम’ अब महानगरों से निकल कर दूरस्थ ग्रामीण अंचलों तक पहुंच चुका है, जिसकी एक झलक बैतूल जिले के आदिवासी बहुल शाहपुर तहसील में देखने को मिली,
शाहपुर पुलिस थाने के प्रभारी (टीआई) विल्सन मैनुअल ने आज यहा बताया कि लगभग चार माह बाद इस बात का खुलासा तब हुआ जब आरोपी युवकों ने ‘एमएमएस’ के जरिए छात्रा को श्ब्लैकमेलश् करना शुरू कर दिया। बालिका ने परिजन के साथ थाने पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने मामला दर्ज कर कल दोपहर में जिला अस्पताल में स्कूली छात्रा का मेडिकल परीक्षण कराया है।
पुलिस में दर्ज रिपोर्ट के अनुसार, जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के पतौवापुरा गाव की 14 वर्षीय एक छात्रा के पास गत 29 मार्च को शाहपुर के ही दो युवक आए और ‘गेस पेपर’ देने का लालच दिया। इसके लिए वे उसे चोपना रोड स्थित एक शिवमंदिर के निकट सुनसान इलाके में ले गए और वहा मौजूद एक साथी के साथ मिलकर उन्होंने उससे सामूहिक दुष्कर्म किया।
दुष्कर्म के दौरान युवकों ने मोबाइल से इस कृत्य की ‘क्लिप’ भी तैयार कर ली। यह बालिका शाहपुर के एक निजी स्कूल में पढ़ती है। घटना के बाद युवक स्कूली छात्रा को इस ‘क्लिप’ को ‘एमएमएस’ के जरिए सार्वजनिक करने की धमकी देकर ‘ब्लैकमेल’ करते रहे। इस दौरान युवकों ने कई बार छात्रा से दुष्कर्म किया।
‘ब्लैकमेल’ से तंग आकर छात्रा ने यह बात अपनी मा को बताई, जिसके बाद छात्रा के पिता ने आरोपियों के खिलाफ शाहपुर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई।
शाहपुर टीआई मैनुअल ने बताया कि इस बालिका ने आरोपी युवकों का नाम ह्मदेश, बाबू जगताप एवं गिरीश बताया है। ये तीनों युवक शाहपुर बाजार में दुकान लगाते हैं। मामले की शिकायत उसने कलेक्टर बी. चन्द्रशेखर एवं एसडीएम के. वासुकी से भी की है।
उन्होंने कहा कि तीनों आरोपी फरार हैं और उनकी तलाश की जा रही है। आरोपियों के खिलाफ छह अलग-अलग धाराओं 363, 366, 376 (2-जी) 506 के तहत प्रकरण दर्ज किया गया है। उनकी तलाशी के लिए कई स्थानों पर छापे मारे जा रहे हैं।

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अंडे दिये मुर्गे ने ..


WARISHA KHAN
मुर्गा अंडा देने लगे! फिल्मों में तो यह डायलाग सुनने मिल जाता है कि.. डर के मारे मुर्गा भी अंडे देने लगता है। लेकिन इटली में इन दिनों वास्तव में ऐसा हो रहा है। एक मुर्गा, मुर्गी बन गया है और अंडे दे रहा है! ..वह भी डर के मारे। हुआ यूं कि इटली के टस्कनी शहर के एक दड़बे में अकेला मुर्गा कई मुर्गियों के साथ रहता था। लेकिन एक दिन अचानक लोमड़ी ने दड़बे पर हमला बोल दिया। लोमड़ी सारी मुर्गियों को चट कर गई। मुर्गा किसी तरह बच गया। लेकिन इस घटना से वह ऐसा सहमा कि मुर्गी बन गया। मुर्गे के मालिक ने बताया कि उस घटना के कुछ दिन बाद से जियानी नाम का यह मुर्गा अंडे देने लगा। इतना ही नहीं वह मुर्गी की तरह अंडों को से भी रहा है। इस घटना के बाद मुर्गा सुर्खियों में आ गया है और अब संयुक्त राष्ट्र के वैज्ञानिक मुर्गे के डीएनए के बारे में अध्ययन कर रहे हैं। वह पता लगाने की कोशिश में हैं कि मुर्गे के शरीर में अचानक परिवर्तन कैसे आया? एक विशेषज्ञ का कहना है कि यह मुर्गा किसी आदिम प्रजाति का हो सकता है, जो अब तक हमारी नजर में नहीं आया। लेकिन यह भी हो सकता है कि सारी मुर्गियों के मारे जाने के बाद अपने वंश को बचाए रखने के लिए उसके शरीर में यह परिवर्तन आया हो। खैर वैज्ञानिक कोई भी तर्क दें, है तो यह एक असंभव घटना। जो दुनिया की आंखों के आगे संभव हो रही है।
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छात्रा से गैंगरेप कर बनाया एमएमएस


Gazala Khan
पतौवापुरा गांव की 14वर्षीय एक छात्रा से शाहपुर के ही तीन युवकों ने सामूहिक दुष्कर्म कर उसका ‘एमएमएस तैयार कर लिया। ‘साइबर क्राइम’ अब महानगरों से निकल कर दूरस्थ ग्रामीण अंचलों तक पहुंच चुका है, जिसकी एक झलक बैतूल जिले के आदिवासी बहुल शाहपुर तहसील में देखने को मिली,

शाहपुर पुलिस थाने के प्रभारी (टीआई) विल्सन मैनुअल ने आज यहा बताया कि लगभग चार माह बाद इस बात का खुलासा तब हुआ जब आरोपी युवकों ने ‘एमएमएस’ के जरिए छात्रा को श्ब्लैकमेलश् करना शुरू कर दिया। बालिका ने परिजन के साथ थाने पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने मामला दर्ज कर कल दोपहर में जिला अस्पताल में स्कूली छात्रा का मेडिकल परीक्षण कराया है।
 

पुलिस में दर्ज रिपोर्ट के अनुसार, जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के पतौवापुरा गाव की 14 वर्षीय एक छात्रा के पास गत 29 मार्च को शाहपुर के ही दो युवक आए और ‘गेस पेपर’ देने का लालच दिया। इसके लिए वे उसे चोपना रोड स्थित एक शिवमंदिर के निकट सुनसान इलाके में ले गए और वहा मौजूद एक साथी के साथ मिलकर उन्होंने उससे सामूहिक दुष्कर्म किया।

दुष्कर्म के दौरान युवकों ने मोबाइल से इस कृत्य की ‘क्लिप’ भी तैयार कर ली। यह बालिका शाहपुर के एक निजी स्कूल में पढ़ती है। घटना के बाद युवक स्कूली छात्रा को इस ‘क्लिप’ को श्एमएमएसश् के जरिए सार्वजनिक करने की धमकी देकर ‘ब्लैकमेल’ करते रहे। इस दौरान युवकों ने कई बार छात्रा से दुष्कर्म किया।

‘ब्लैकमेल’ से तंग आकर छात्रा ने यह बात अपनी मा को बताई, जिसके बाद छात्रा के पिता ने आरोपियों के खिलाफ शाहपुर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई।

शाहपुर टीआई मैनुअल ने बताया कि इस बालिका ने आरोपी युवकों का नाम ह्मदेश, बाबू जगताप एवं गिरीश बताया है। ये तीनों युवक शाहपुर बाजार में दुकान लगाते हैं। मामले की शिकायत उसने कलेक्टर बी. चन्द्रशेखर एवं एसडीएम के. वासुकी से भी की है।

उन्होंने कहा कि तीनों आरोपी फरार हैं और उनकी तलाश की जा रही है। आरोपियों के खिलाफ छह अलग-अलग धाराओं 363, 366, 376 (2-जी) 506 के तहत प्रकरण दर्ज किया गया है। उनकी तलाशी के लिए कई स्थानों पर छापे मारे जा रहे हैं।

इस तस्वीर को ध्यान से देखें क्यूंकि कोई नहीं जानता ये सब कैसे हुआ...

waarisha khan
अंटार्कटिका की बर्फ के नीचे ‘गैम्बर्टसेव’ नामक रहस्य छिपा है। असल में यह एक पहाड़ है, जिस पर लंबे समय तक किसी का ध्यान नहीं गया था, क्योंकि यह चार किलोमीटर मोटी बर्फ की परत के नीचे है। इसका खोजा जाना भू-गर्भ वैज्ञानिकों के लिए उत्साहित करने वाला तो है, लेकिन इससे अधिक उन्हें इस बात की हैरानी है कि यह पहाड़ कैसे बना और अब तक अपना वजूद कैसे कायम रखे है? हालांकि इन सवालों का जवाब पाने का प्रयास वैज्ञानिक छह दशक से कर रहे हैं लेकिन ‘गैम्बर्टसेव’ का वजूद राज बना हुआ है।

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 ‘गैम्बर्टसेव’ की खोज 1950 के दशक के अंत में एक सोवियत टीम ने की थी। इसे देखकर वे काफी चौंक गए थे, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि यहां की सतह सपाट होगी। आमतौर पर पर्वतमालाएं महाद्वीपों के किनारे पर होती हैं, लेकिन
अंटार्कटिका का यह पहाड़ महाद्वीप के बीचोंबीच है। इसका अध्ययन कर चुके अमेरिकी शोधकर्ता डॉ. रॉबिन कहते हैं, पहाड़ दो वजहों से बनते हैं। पहला महाद्वीपों की टक्कर से। यहां आखिरी टक्कर 50 करोड़ साल से भी पहले हुई थी, इसलिए इस पहाड़ को अब तक यहां नहीं होना चाहिए था। पहाड़ बनने की दूसरी वजह ज्वालामुखी होते हैं, लेकिन अंटार्कटिका की बर्फ की मोटी चादर के नीचे किसी ज्वालामुखी का होना मुश्किल है। गौरतलब है कि अंटार्कटिका महाद्वीप के बीचोंबीच स्थित ‘गैम्बर्टसेव’ पहाड़ की जानकारी लंबे समय तक किसी को नहीं थी, क्योंकि यह चार किलोमीटर मोटी बर्फ की परत के नीचे दबा है। भू-गर्भ वैज्ञानिक समझ नहीं पा रहे कि यह कैसे बना और अब तक कैसे मौजूद है।

पुरूषों से अधिक महिलाएं होती हैं बेइफा



gazala khan
महिलाओं और पुरुषों के बीच कराए गए सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि पुरूषों से अधिक महिलाएं एक साथ कई प्रेम संबंधों में संलिप्त रहती हैं। 2,000 लोगों के बीच कराए गए इस सर्वेक्षण में एक चैथाई महिलाओं ने माना कि वे एक समय में एक साथ दो पुरूषों के साथ संबंध में रही हैं, जबकि 15 फीसदी पुरूष ने माना कि वे एक साथ दो महिलाओं के साथ संबंध में थे। प्रेम त्रिकोण के मामले में 18 फीसदी लोगों ने माना कि उनका प्यार फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिए परवान चढ़े
महिलाओं और पुरुषों के बीच कराए गए सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि पुरूषों से अधिक महिलाएं एक साथ कई प्रेम संबंधों में संलिप्त रहती हैं। 2,000 लोगों के बीच कराए गए इस सर्वेक्षण में एक चैथाई महिलाओं ने माना कि वे एक समय में एक साथ दो पुरूषों के साथ संबंध में रही हैं, जबकि 15 फीसदी पुरूष ने माना कि वे एक साथ दो महिलाओं के साथ संबंध में थे। प्रेम त्रिकोण के मामले में 18 फीसदी लोगों ने माना कि उनका प्यार फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिए परवान चढ़ा।

Friday, 9 September 2011

सिर्फ एक नंबर डायल कर आंख दान कर सकते हैं

अगर आप अपने मृत रिश्तेदार की आंखे दान करना चाहते हैं यअपनी आंखें दान करने के लिए फार्म भरना चाहते हैं तो बस आपको 1919 नंबर पर फोन करना होगा। मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ एंड फेमिली वेलफेयर ने नेत्र दान करने वालों की सुविधा के लिए 1919 टोल फ्री नंबर देश भर में जारी करने का फैसला किया है। यह नंबर अभी सिर्फ देश के छह शहरों में चल रहा है। अगले साल तक पूरे देश में एक्टिवेट कर दिया जाएगा। आप जैसे ही यह नंबर डायल करेंगे तो नजदीक के आई बैंक की टीम घर आकर मृतक की आंखें ले जाएगी या फिर आंखें दान करने वाले का फार्म भरेंगी। मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ एंड फेमिली वेलफेयर के असिस्टेंट डायरेजनरल डॉ. एएस राठौर ने बताया कि आई डोनेशन के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए पूरे देश में 1919 टोल फ्री नंबर शुरू करने का फैसला किया है।
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मैं हूं बीवी नं 1

अपने सब-इंस्पेक्टर पति से मिलने आई महिला ने वीरवार को थाना-तीन में हंगामा खड़ा कर दिया। महिला का दावा है कि सब-इंस्पेक्टर उसका दूसरा पति है, जबकि एसआई उस महिला को अपना दोस्त तो कबूल करता है, पत्नी नहीं। एसआई ने महिला के बेटे को भी अपना मानने से इनकार कर दिया। इस पर महिला के तेवर तीखे हो गए। उसने एसआई को तमाचा जड़ने का भी प्रयास किया। हंगामे के शांत करने में पुलिस अधिकारियों को नाकों चने चबाने पड़े। पुलिस कालोनी, अजनाला रोड अमृतसर की रहने वाली पूजा शाम साढ़े पांच बजे थाना-३ पहुंची। एसआई मंगल सिंह को देखते ही उसने कहा, आपसे जरूरी बात करनी है। एसआई ने उससे हाथ छुड़ा लिया और ड्यूटी रूम की ओर जाने लगा। इसी बात पर बात बढ़ गई और पूजा ने हंगामा शुरू कर दिया। वहां मौजूद अन्य पुलिसकर्मियों ने दोनों को एक कमरे में बिठा दिया ताकि आपस में बातचीत कर सकें। कमरे में पूजा ने मंगल सिंह से कहा कि उनका पांच माह का बेटा बीमार है। इलाज के लिए पैसे चाहिए। वह मंगल को साथ ले जाना चाहती थी। मंगल सिंह ने हंसते हुए कहा, ‘नया ड्रामा रचकर तंग करने आ गई। तुम एक बेवफा औरत हो और पता नहीं यह बच्चा किसका है।’ यह सुनकर पूजा और भड़क गई। मंगल सिंह को तमाचा मारने के लिए हाथ उठाया, लेकिन गाल तक हाथ जाकर रुक गया। गुस्से को शांत कर पूजा बोली कि अगर उसे संदेह है तो वह बच्चे का डीएनए टेस्ट करवा ले, सच्चाई सामने आ जाएगी। हंगामे के बीच पूजा ने मंगल सिंह से शादी की फोटो से लेकर अंतरंग क्षणों की कुछ फोटो पेश कर दी। इतने में एसीपी अश्विनी कुमार और एसएचओ सुरिंदर पाल थाने आ गए। पूजा और मंगल से एकांत में बात करने के लिए एसीपी दोनों को एसएचओ के रूम में ले गए। 15 मिनट बाद बाहर आई पूजा के तेवर शांत थे। कहने लगी, सात दिन का टाइम दिया गया है।
पूजा दोस्त थी, पत्नी नहीं: मंगल
एसआई मंगल सिंह ने बताया, पूजा दोस्त थी, मगर पत्नी नहीं। पूजा ने उस पर एक झूठा केस दर्ज करवा दिया था, जिसका बाद में राजीनामा हो गया था। राजीनामा के एवज में पूजा के नाम उसकी पत्नी कुलबीर कौर ने दस लाख मूल्य का प्लाट लिख दिया था। वह पूजा से एक साल पहले नाता तोड़ चुका है, मगर किसी के बच्चे को उसका बता कर उसे बदनाम किया जा रहा है। मंगल ने मीडिया के सामने कुछ दस्तावेज पेश किए और कहा कि महिला का चरित्र संदिग्ध है। पूजा ने ओम प्रकाश से तलाक नहीं लिया, बल्कि अदालत के आदेश पर वह उसे 3500 रुपए खर्चा दे रहा है। मंगल के मुताबिक पूजा ने ओम प्रकाश को तलाक दिए बिना एक वकील के मुंशी विनोद से जनवरी, 2007 में दूसरी शादी कर ली थी और उसे झूठे केस में उलझा कर सात लाख की वसूली कर चुकी है। मंगल ने पूजा द्वारा पेश शादी की तस्वीर को झूठा करार दिया। उनका तर्क था कि फर्जी तरीके से शादी की फोटो तैयार की गई है। हालांकि झूठा केस क्या था और राजीनामा की नौबत क्यों आई, इस पर मंगल सिंह कुछ नहीं बोले।
रंगीन तबीयत का आदमी है मंगल: पूजा
पूजा बोली, उसकी शादी 1998 में अमृतसर में ही ओम प्रकाश नामक शख्स से हुई थी। उसके तीन बेटे और एक बेटी हुए। पति दहेज के लिए तंग करता था और उसके खिलाफ केस दर्ज किया गया था। बाद में उसका पंचायती तौर पर ओम प्रकाश से तलाक हो गया था। 2009 में उसकी मुलाकात एसआई मंगल सिंह से हुई। मंगल रंगीन तबीयत का आदमी है। उसे प्यार के जाल में फांस लिया। मंगल ने उसे बताया था कि उसका पहली पत्नी कुलवीर कौर से तलाक हो चुका है और उसके तीन बेटे हैं। पूजा का दावा था कि मंगल सिंह ने 24 मई, 2009 को उससे शादी कर ली थी। जिससे उसका पांच माह का बेटा है। अब मंगल धोखा देकर पहली पत्नी के पास चला गया और उसे जान से मारने की धमकी देकर अपनी पत्नी मानने से इनकार कर रहा है। पूजा ने मंगल सिंह से खर्चा हासिल करने के लिए अदालत में केस दायर किया हुआ है। एक केस अमृतसर पुलिस में दर्ज करवाया है, जिसकी जांच चल रही है। पूजा वकील के मुंशी से दूसरी शादी से साफ इनकार कर गई।
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Thursday, 8 September 2011

94 की दुल्हन, 84 का दूल्हा


warisha khan
जीवन में अच्छा काम करने की कोई उम्र नहीं होती। वह 94 साल की हैं और अपने 84 साल के बॉयफ्रेंड से शादी करने के लिए इतनी उतावली हैं कि अस्पताल के बेड से सीधे चर्च ही पहुंच गईं। इंग्लैंड के हार्स्टेड की वाई ने अपने प्रेमी डेरेक से शादी करने का फैसला अपने घर के पास ही एक चर्च में किया, जहां वह चोट लगने के बाद भी सीधे वील चेयर पर बैठ कर पहुंचीं। हालांकि, वाई को इस पूरे कार्यक्रम को निपटाने के बाद बाकी इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती होना पड़ा।
डेरेक ने अपनी शादी के मौके पर खुशी का इजहार करते हुए कहा कि वैसे तो मुझे वाई को अस्पताल ले जाना पड़ा, लेकिन हम ने फिर भी शादी की और यह बेहतरीन अवसर रहा। अपनी पत्नी की तारीफ करते हुए डेरेक ने कहा कि वह बहुत ही बहुत बहादुर है और डॉक्टरों को भी इस बात में तब तक कोई दिक्कत नहीं है, जब तक कि उसकी तबियत खराब न हो।
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Wednesday, 7 September 2011

जापान बचायेगा अब दिल्ली का पानी

AZAM KHAN
जापान की कंपनी की मदद से दिल्ली जल बोर्ड पानी के सप्लाई सिस्टम को सुधारेगा। इसके लिए दिल्ली सरकार ने भी हामी भर दी है। दिल्ली सरकार ने केंद्रीय वित्त मंत्रालय और शहरी विकास मंत्रालय को भी इस बारे में लेटर लिखा है। जल बोर्ड को उम्मीद है कि चार महीने में जापान की कंपनी से लोन मिल जाएगा , जिसके बाद जल्दी ही काम शुरू कर दिया जाएगा। जापान इंटरनेशनल कॉरपोरेशन एजेंसी ( जेआईसीए ) ने दिल्ली जल बोर्ड को सुझाया था कि दिल्ली में पानी सप्लाई के सिस्टम को सुधारने और पानी के नुकसान को कम करने के लिए सभी वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट्स को आधुनिक बनाने और डिस्ट्रिब्यूशन लाइन में लीकेज को ठीक करने की जरूरत है। जेआईसीए की सलाह है कि पहले एक वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट से शुरुआत करके पहले उसकी कमांड एरिया की सभी सर्विस सुधारी जाएं उसके बाद ही दूसरे प्लांट पर ध्यान दिया जाए। दूसरा सुझाव है कि पूरे शहर को डिस्ट्रिक्ट मीटर एरिया ( डीएमए ) में बांटा जाए इसके तहत 1100 डीएमए की पहचान भी की गई। जेआईसीए के साथ दिल्ली जल बोर्ड के अधिकारियों की कई दौर की मीटिंग हो चुकी है। इसके बाद ही तय किया गया कि चंद्रावल वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट से शुरुआत की जाएगी। मिलेगा 1,150 करोड़ का लोन रू इसके तहत जल बोर्ड 110 एमजीडी क्षमता वाले चंद्रावल वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट में आधुनिक मशीनें लगाएगा साथ ही इस ट्रीटमेंट प्लांट से जुड़ी सभी सप्लाई पाइप लाइन भी बदली जाएंगी। इससे पानी की बर्बादी रोकी जा सकेगी। इसके लिए जेआईसीए से 1,150 करोड़ रुपये की राशि कम इंटरेस्ट रेट पर ली जाएगी। इस पैसे से चंद्रवाल प्लांट में आधुनिक मशीनें लगाई जाएंगी और इसकी क्षमता को बढ़ाया जाएगा। यहां का सप्लाई सिस्टम स्काडा सिस्टम से जुड़ा होगा। जल बोर्ड के सीईओ रमेश नेगी ने बताया कि चंद्रावल वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट की मशीनें बहुत पुरानी हो गई हैं। दिल्ली की जनता को पानी की सप्लाई लगातार बनी रहे इसके लिए यहां आधुनिक मशीनें लगाई जाएगी। उन्होंने कहा कि हमें उम्मीद है कि जापान से अगले चार महीने में कर्ज मिल जाएगा। जिसके बाद हम छह महीने में टेंडर प्रोसेस पूरा कर काम शुरू कर देंगे। फिलहाल चंद्रावल की हकीकत रू इस ट्रीटमेंट प्लांट से जिस इलाके में पानी सप्लाई होता है वहां की पाइप लाइनें करीब 70 साल पुरानी हैं। जिस वजह से यह कई जगहों पर गल गई हैं। खराब पाइप लाइनों की वजह से पानी तो बर्बाद होता ही है साथ ही पानी में गंदगी भी मिल जाती है जिसकी वजह से लोगों को गंदा पानी मिलता है। पाइप लाइन बदले जाने से यहां के लोगों को गंदे पानी से भी आजादी मिलेगी। ट्रीटमेंट पर किस तरह काम किया जाए कि पानी सप्लाई बाधित न हो इस पर अभी काम किया जा रहा है। जल बोर्ड के अधिकारी ने कहा कि कर्ज मिल जाने के बाद हम इन सब पहलुओं को देखेंगे। चंद्रावल वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट से एनडीएमसी एरिया , सेंट्रल दिल्ली और आसपास के इलाकों में पानी सप्लाई होता

अल्जाइमर का बिमारी का पता चलेगा दस मिनट में

warisha khan
वैज्ञानिकों ने मात्र दस मिनट का तस्वीरों पर आधारित एक ऐसा परीक्षण तैयार करने का दावा किया है जिसकी मदद से अल्जाइमर जैसी बीमारी का शुरुआती अवस्था में ही पता लगाया जा सकेगा। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों की टीम द्वारा तैयार किया गया यह परीक्षण याददाश्त से संबंधी एक ‘पिक्चर टेस्ट’ है। उनका कहना है कि वर्तमान में मौजूद परीक्षणों के मुकाबले इस परीक्षण के जरिए अल्जाइमर के लक्षणों को शुरुआती अवस्था में ही पहचाना जा सकता है। इसमें पहचानने की क्षमता के लिए जिम्मेदार मस्तिष्क के प्रमुख भाग हिप्पोकैम्पस की जांच की जाती है। अखबार ‘दे डेली टेलीग्राफ’ के मुताबिक, यह परीक्षण दैनिक दिनचर्या के कार्याे को याद करने को लेकर बनाया गया है। जैसे आपने अपनी कार कहां पार्क की और कार की चाबी कहां रखी? पर्स कहां रखा? कैंब्रिज यूनिवर्सिटी की न्यूरोसाइंटिस्टप्रोफेसर बारबरा साहाकिन ने अखबार को इस परीक्षण के बारे में बताया है। वैज्ञानिकों की टीम का कहना है कि इस परीक्षण से 95 फीसदी तक सटीक परिणाम देखे गए हैं। अगर डॉक्टर अल्जाइमर के मरीजों को पहचानने के लिए इस परीक्षण का प्रयोग करना शुरू कर दें तो इससे बेहतर परिणाम मिलेंगे।
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चॉकलेट खाओ दिल की बिमारी दूर भगाओ

GAZALA KHAN
एक नए शोध में पाया गया है कि ज्यादा मात्रा में चॉकलेट का सेवन आपको दिल संबंधी बीमारियों के खतरे से दूर रखता है। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में छपे इस शोध को कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने अंजाम दिया है। इसके लिए उन्होंने एक लाख चौदह हजार मरीजों के आधार पर किए गए सात अध्ययनों की समीक्षा की। शोधकर्ताओं ने पाया कि जो व्यक्ति ज्यादा मात्रा में चॉकलेट का सेवन करता है उसमें चॉकलेट नहीं खाने वाले के मुकाबले दिल संबंधी बीमारी होने का खतरा 37 प्रतिशत और दिल का दौरा पड़ने का खतरा 29 प्रतिशत तक कम होता है। विश्वविद्यालय की तरफ से जारी एक बयान में कहा गया कि इस शोध में डार्क चॉकलेट, मिल्क चॉकलेट, चॉकलेट से बने पेय पदार्थों और अन्य चॉकलेट उत्पादों को शामिल किया गया। शोध के प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर ऑस्कर फ्रांको ने कहा कि चॉकलेट लाभदायक हो सकते हैं लेकिन इनका सेवन नियंत्रित मात्रा में किया जाना चाहिए।
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उम्र कम कमजोर याददाश्त वालों की

GAZALA KHAN
आपको अगर सोचने और ध्यान केंद्रित करने के साथ-साथ अगर तार्किकता तथा चीजों को याद रखने में समस्या होती है तो आप यह मानकर चलें कि आपके जीवन काल की अवधि बहुत कम है। अल्प संज्ञानात्मक दुर्बलता, मधुमेह या घातक दिल का दौरा जैसे रोगों के समान किसी की लम्बी आयु को प्रभावित करती है। संज्ञानात्मक दुर्बलता स्मृति को प्रभावित करता है लेकिन यह सीखने की असमर्थता से भिन्न है क्योंकि इसे भविष्य में किसी दुर्घटना या बीमारी के बाद पुनरू प्राप्त किया जा सकता है। इस विषय पर अध्ययन करने वाले इंडियाना विश्वविद्यालय के ग्रेग ए. सैस के अनुसार हमने पाया कि थोड़ी भी संज्ञानात्मक दुर्बलता घातक बीमारियों के जैसे ही व्यक्ति की लम्बी आयु को अत्यधिक प्रभावित करती है। विश्वविद्यालय के बयान के अनुसार इस अध्ययन में 3,957 लोगों को शामिल किया गया। स्क्रीनिंग के दौरान 3,157 लोगों में संज्ञानात्मक दुर्बलता नहीं पाई गई जबकि 533 में थोड़ी समस्या थी और 267 में कम से लेकर अधिक दुर्बलता पाई गई। परीक्षण में शामिल होने वाले लोगों के बारे में बाद में पता लगाने पर पाया गया कि उनमें से मरने वाले 57 प्रतिशत बिना संज्ञानात्मक दुर्बलता वाले थे और 68 प्रतिशत थोड़ी दुर्बलता वाले थे जबकि सबसे ज्यादा 79 प्रतिशत हल्के से लेकर अत्यधिक दुर्बलता वाले थे।

Tuesday, 6 September 2011

उम्मीद आपका नाम है!

GAZALA KHAN
इस आलेख को पूरा पढ़ने से पहले थोड़ी देर के लिए अपने विचारों को विराम देकर अपने किशोर या टीनएजर बच्चे से जुड़े सवाल का जवाब दीजिए- क्या आप अपने बेटे या बेटी पर भरोसा करते हैं? याद रखिए कि इस समय कठघरे में आप हैं और फैसला भी आपको ही करना है। इसलिए आकलन पूरी ईमानदारी से कीजिएगा। दूसरा सवाल क्या आपके बच्चे आप पर भरोसा करते हैं?
आप असमंजस में हैं? जरा गौर कीजिए-

दुविधा कैसे जन्मी?
बड़े हो रहे बच्चों की सोच और व्यवहार में तेजी से परिवर्तन आता है। ये बदलाव ज्यादातर अभिभावकों को डरा देते हैं। भय सीमाओं को रेखांकित करता है और सीमाएं पहरों को। बस, यहीं से अविश्वास का बीज अंकुरित होने लगता है। यह स्थिति दोनों के बीच एक द्वंद्व को जन्म देती है। रही सही कसर संवादहीनता से पूरी हो जाती है। रास्ते अलग होते जाएंगे, तो दिशाएं एक रह पाना मुश्किल है।
समय जब मिलता है
जैसे ही दूरियां बढ़ती हैं, एक-दूसरे के साथ बिताने के लिए समय कम होता जाता है। जब समय मिलता है, तो उसमें अभिभावकों को लगता है कि वे बच्चे का उन मामलों पर मार्गदर्शन कर लें, जिनमें वे कमी पाते हैं। इससे बच्चे को लगता है कि वे मीनमेख निकाल रहे हैं और वह और कटने लगता है।
साथ छूटा, भरोसा टूटा
युवावस्था की दहलीज पर कदम रखे बच्चे अपने बड़े होने को लेकर बेहद उत्साहित होते हैं। वे अपने फैसले खुद लेना चाहते हैं। घर के मार्गदर्शन को वे आलोचना मानने ही लगते हैं, सो दोस्तों की अहमियत बढ़ने लगती है। बच्चों की इस कच्ची उम्र से वाकिफ अभिभावक अब और ज्यादा ही सचेत हो जाते हैं। उन्हें जिम्मेदारियों के निर्वाह, लोगों की परख और सही और गलत में फर्क कर पाने को लेकर बच्चों की समझ पर संशय होता है। ये संशय अभिभावकों को बात-बात पर बच्चों को समझाइश देने या सवाल पूछने के लिए प्रेरित करता है। कुल मिलाकर हालात बिगड़ते चले जाते हैं।
कहीं बगावत, तो कहीं आत्मविश्वास पर घात
कदम-कदम पर अविश्वास का सामना करने से बच्चे का मन आहत होता है। इसके दो तरह के परिणाम सामने आ सकते हैं।
1. बच्चे पहले ही मान लेते हैं कि माता-पिता उनकी बातों को एक बार में नहीं मानेंगे, इसलिए अपनी बात रखने के साथ-साथ वे विरोध दर्ज करने के लिए भी तैयार रहते हैं और मौका पड़ते ही पूरी ताकत लगा देते हैं। फिर संवाद नहीं सिर्फ तर्क-विर्तक होता है। इससे रिश्तों में कड़वाहट का शामिल होना लाजमी है। दो-तीन ऐसे वाकये बच्चे को विश्वास दिला देते हैं कि आप अभिभावक उसकी बातों को कभी नहीं समझ पाएंगे। इसलिए धीरे-धीरे वह अपनी बातों को बांटना छोड़ देता है और अपनी दुनिया में व्यस्त होने लगता है।
2. माता-पिता बच्चे के लिए आईना होते हैं। आपकी तारीफ उन्हें बेहतर प्रदर्शन करने की प्रेरणा देती है। आपके भरोसे को कायम रखने के लिए वह जी-जान से कोशिश करते हैं। लेकिन जब वे इसी भरोसे को डगमगाते देखते हैं, तो उनके आत्मविश्वास को चोट पहुंचती है। इस बात को समझिए कि बच्चे की हर बात को लेकर आपका संदेह, उसे खुद पर भी भरोसा करने नहीं देगा। ऐसे में वह हीन भावना से घिरने लगेगा। अपनी खूबियों को नजरअंदाज करेगा। इन बातों का सीधा असर उसके मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास पर पड़ेगा।
क्या करें
झ स्वस्थ संवाद कीजिए। ध्यान रखें कि संवाद तभी होता है, जब दोनों पक्ष एक-दूसरे को सुनें। आपको बच्चे की बातों न सिर्फ सुनना है, बल्कि उसे समझने की कोशिश भी करना है। जैसे-जैसे आपके बीच संवाद की डोर मजबूत होगी, अविश्वास की गुंजाइश कम होती जाएगी। बच्चे को क्या और क्यों मना किया जा रहा है, साफ-साफ बताइए। यह बचपन से करें, तो और बेहतर।
झ बच्चे को छोटी-छोटी जिम्मेदारियां सौंपिए। यदि कोई कमी रह गई हो, तो उसके बारे में भी प्यार से बताएं। आपका भरोसा उसका सम्बल है।

झ सकारात्मक रवैया अपनाएं। बच्चे की संगत और उसके दोस्तों के बारे में शक के साथ नहीं, बल्कि केवल जानकारीपरक बातें करें।
झ उम्र के इस पड़ाव में बच्चे आजादीभरा माहौल चाहते हैं। यदि आपको बच्चे के रहन-सहन को लेकर कोई आपत्ति है, तो उसे डांटने के बजाय अपना तर्क रखें। बच्च खुद-ब-खुद समझ जाएगा।
झ आपके दिए भरोसे के कारण ही आपका बच्च एक भरोसेमंद इंसान बन पाएगा। जो आपसे पाएगा, वो उसके व्यक्तित्व में झलकेगा। आप उसकी उम्मीद बनेंगे, वो आपका भरोसा।

अंडे दिये मुर्गे ने ..

WARISHA KHAN
मुर्गा अंडा देने लगे! फिल्मों में तो यह डायलाग सुनने मिल जाता है कि.. डर के मारे मुर्गा भी अंडे देने लगता है। लेकिन इटली में इन दिनों वास्तव में ऐसा हो रहा है। एक मुर्गा, मुर्गी बन गया है और अंडे दे रहा है! ..वह भी डर के मारे। हुआ यूं कि इटली के टस्कनी शहर के एक दड़बे में अकेला मुर्गा कई मुर्गियों के साथ रहता था। लेकिन एक दिन अचानक लोमड़ी ने दड़बे पर हमला बोल दिया। लोमड़ी सारी मुर्गियों को चट कर गई। मुर्गा किसी तरह बच गया। लेकिन इस घटना से वह ऐसा सहमा कि मुर्गी बन गया। मुर्गे के मालिक ने बताया कि उस घटना के कुछ दिन बाद से जियानी नाम का यह मुर्गा अंडे देने लगा। इतना ही नहीं वह मुर्गी की तरह अंडों को से भी रहा है। इस घटना के बाद मुर्गा सुर्खियों में आ गया है और अब संयुक्त राष्ट्र के वैज्ञानिक मुर्गे के डीएनए के बारे में अध्ययन कर रहे हैं। वह पता लगाने की कोशिश में हैं कि मुर्गे के शरीर में अचानक परिवर्तन कैसे आया? एक विशेषज्ञ का कहना है कि यह मुर्गा किसी आदिम प्रजाति का हो सकता है, जो अब तक हमारी नजर में नहीं आया। लेकिन यह भी हो सकता है कि सारी मुर्गियों के मारे जाने के बाद अपने वंश को बचाए रखने के लिए उसके शरीर में यह परिवर्तन आया हो। खैर वैज्ञानिक कोई भी तर्क दें, है तो यह एक असंभव घटना। जो दुनिया की आंखों के आगे संभव हो रही है।

मोबाइल, इंटरनेट ने कम किया डाकिए का बोझ

GAZALA KHAN
‘सीधा सादा डाकिया जादू करे महान, एक ही थैले में भरे आंसू और मुस्कान’ निदा फाजली के ये शब्द घर-घर जाकर चिट्ठियां बांटने वाले डाकिए की पूरी कहानी बयां करते हैं और उसके महत्व को दर्शाते हैं। ‘नाइदर रेन नॉर स्नो डे’ सात सितंबर को मनाया जाता है। लोग ‘नाइदर रेन नॉर स्नो’ को अमेरिकी डाक सेवा का मोटो मानते हैं हालांकि इसका कोई आधिकारिक मोटो नहीं हैं। यह लाइन डाक वितरित करने वालों की मेहनत और किसी भी मौसम, किसी भी स्थिति में काम के प्रति उनके समर्पण की याद दिलाती है।
आज की मोबाइल और एसएमएस वाली पीढ़ी भले ही डाकिए याच्चिट्ठियों का महत्व न समझती हो, लेकिन आज से कुछ साल पहले जब मोबाइल या इंटरनेट वगैरह नहीं थे तब स्थिति इससे एकदम अलग थी। तब सचमुच डाकिए को भगवान का रूप माना जाता था जो लोगों को उनके अपनों की, उनके सुख-दुःख की खबर देता था। पूछ कर देखिए अपनी मां, दादी या नानी से, किस तरह डाकिए का इंतजार किया जाता था। जिस समय वह गुजरता लोग घरों के दरवाजे पर यह पूछने के लिए उसकी राह देखते खड़े रहते कि उनकी कोई चिट्ठी तो नहीं है, खासकर उस समय जब उन्हें किसी अपने के पत्र का इंतजार होता। खबर अच्छी होने पर बाकायदा डाकिए का मुंह मीठा कराया जाता। शादी ब्याह जैसी खुशखबरी हो या किसी के निधन की दुखद खबर डाकिया ही उन्हें चिट्ठियों के माध्यम से बांटता। गांव देहात में तो डाकिया लोगों को चिट्ठियां बांटने के साथ ही पढ़ने का काम भी करता था। जो लोग अनपढ़ होने की वजह से पत्र नहीं पढ़ पाते थे, डाकिया उन्हें चिट्ठी पढ़ कर सुनाता। 45 वर्षीय शशि शेवडे़ ने कहा कि आज भले ही डाकिए का महत्व कुछ कम हो गया हो लेकिन पहले वह एक दिन न आए तो लोग परेशान हो जाते थे।
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खुदकुशी की कोशिश

GAZALA KHAN
मेडिकल कालेज (जीएसवीएम) के छात्रों द्वारा आत्महत्या की कोशिश करने का मामला अब जातिवादी रंग लेता जा रहा है। एमबीबीएस प्रथम वर्ष के तीन छात्रों ने बायोकेमेस्ट्री विषय में फेल होने के कारण आत्महत्या का प्रयास किया था और इस विषय में फेल हुए कुल 29 छात्रों में से 25 दलित हैं तथा उन्होंने मांग की है कि उनकी परीक्षा की कापियों की जांच दोबारा करवाई जाए। जीएसवीएम के प्राचार्य आनंद स्वरूप ने आज माना कि एमबीबीएस प्रथम वर्ष के बायोकेमेस्ट्री पेपर में 29 छात्र फेल हुए हैं, जिनमें से 25 छात्र दलित समाज से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी जानकारी मिली है कि फेल छात्रों तथा उनके परिजनों ने कानपुर के छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के कुलपति से मिलकर मांग की है कि उनकी बायोकेमेस्ट्री विषय की कापियों की जांच दोबारा करवाई जाए। ऐसी जानकारी भी मिली है कि कुलपति ने उनकी इस मांग पर विचार करने को कहा है। गौरतलब है कि एमबीबीएस द्वितीय वर्ष के तीन छात्र शोभित, संजीव कुमार और विवेक ने दो सितंबर को देर रात काफी मात्रा में नींद की गोलियां खा ली थी। तीनों छात्र हास्टल वन में रहते थे। देर रात जब हास्टल में उनके सहयोगी छात्रों को पता चला तो वे उनके कमरे का दरवाजा तोड़ कर अंदर घुसे और इन तीनों को बेहोश पाया। बाद में तीनों को अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां से उन्हें दो दिनों के बाद ठीक होने पर डिस्चार्ज कर दिया गया। प्रचार्य प्रो. स्वरूप ने माना कि आत्महत्या की कोशिश करने वाले तीनों छात्रों और उनके परिजनों ने यह आरोप लगाए हैं कि कालेज में कुछ शिक्षकों द्वारा उन पर जाति सूचक टिप्पणी की जाती थी। उन्होंने कहा कि छात्रों के परिजनों ने यह भी आरोप लगाया है कि दलित होने के कारण उन्हें एक विषय में दो टीचरों ने फेल कर दिया है। इन आरोपो की गंभीरता को देखते हुए मेडिकल कालेज प्रशासन ने वरिष्ठ प्रोफेसरों की एक तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया है जो पूरे मामले की जांच कर रही है और शीघ्र ही अपनी रिपोर्ट कालेज प्रशासन को सौपेंगी। प्रो. स्वरूप ने कहा कि अगर छात्रों के आरोप सही पाए गए तो इस जांच रिपोर्ट को आरोपी शिक्षकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की संस्तुति के साथ उत्तर प्रदेश शासन को भेजा जाएंगा।
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Sunday, 4 September 2011

अंडे दिये मुर्गे ने ..


WARISHA KHAN

मुर्गा अंडा देने लगे! फिल्मों में तो यह डायलाग सुनने मिल जाता है कि.. डर के मारे मुर्गा भी अंडे देने लगता है। लेकिन इटली में इन दिनों वास्तव में ऐसा हो रहा है। एक मुर्गा, मुर्गी बन गया है और अंडे दे रहा है! ..वह भी डर के मारे। हुआ यूं कि इटली के टस्कनी शहर के एक दड़बे में

अकेला मुर्गा कई मुर्गियों के साथ रहता था। लेकिन एक दिन अचानक लोमड़ी ने दड़बे पर हमला बोल दिया। लोमड़ी सारी मुर्गियों को चट कर गई। मुर्गा किसी तरह बच गया। लेकिन इस घटना से वह ऐसा सहमा कि मुर्गी बन गया। मुर्गे के मालिक ने बताया कि उस घटना के कुछ दिन बाद से जियानी नाम का यह मुर्गा अंडे देने लगा। इतना ही नहीं वह मुर्गी की तरह अंडों को से भी रहा है। इस घटना के बाद मुर्गा सुर्खियों में आ गया है और अब संयुक्त राष्ट्र के वैज्ञानिक मुर्गे के डीएनए के बारे में अध्ययन कर रहे हैं। वह पता लगाने की कोशिश में हैं कि मुर्गे के शरीर में अचानक परिवर्तन कैसे आया? एक विशेषज्ञ का कहना है कि यह मुर्गा किसी आदिम प्रजाति का हो सकता है, जो अब तक हमारी नजर में नहीं आया। लेकिन यह भी हो सकता है कि सारी मुर्गियों के मारे जाने के बाद अपने वंश को बचाए रखने के लिए उसके शरीर में यह परिवर्तन आया हो। खैर वैज्ञानिक कोई भी तर्क दें, है तो यह एक असंभव घटना। जो दुनिया की आंखों के आगे संभव हो रही है।
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गरीबों की मजबूरी, अमीरों की पसंद

WARISHA KHAN
बिहार तथा अभावग्रस्त पूर्वी उत्तर प्रदेश में कभी गरीबों का भोजन रहा बाटी चोखा अब बदलते परिवेश तथा फैशन में बडे लोग और अमीरों की थाली की पसंद बन चुका है। लगभग 50 वर्ष पूर्व तक पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के गरीब लोग बाटी चोखा खाकर ही गुजारा कर लेते थे। वह भी कण्डे की आग पर बनी बाटी तथा आलू और नमक का चोखा ही उनका प्रिय भोजन बन गया था। उस समय पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों में आवागमन का कोई साधन नही था। इस कारण लोग पैदल ही यात्रा करते थे तथा रात में किसी गांव में रुकने पर झोले में रखा आटा तथा आलू कण्डे पर रख पकाते और बाटी चोखा बनाकर अपना भूख मिटा लेते थे। बदलते परिवेश में बाटी चोखा आज भी लोगों का पसंद बना हुआ है। अब तो बडे बडे लोग बाटी चोखा बनवा कर उसका स्वाद ले रहे हैं।
बाटी चोखा तो वही है लेकिन उसके खाने वाले तथा बाटी चोखा में पडने वाले सामाग्री का रुप बदल गया है। पहले गरीब जो बाटी चोखा खाता था वह आटे की बनी बाटी व आलू नमक का चोखा हुआ करता था1 लेकिन अब बाटी चोखा बडे बडे घरों में शौकिया बन रहा है। उस बाटी में आटे के अंदर चने के बने सत्तू में कई प्रकार के मसाले का प्रयोग कर बाटी तैयार की जा रही है तथा उसमें शुद्ध घी का भी प्रयोग किया जाता है। चोखे में आलू के साथ बैगन। टमाटर या परवल. लहसुन और हरी धनियां की पत्ती का प्रयोग कर इसका जायका और बढाया जाता है।
एक 84 वर्षीय स्थानीय नागरिक श्री भागवत का कहना है कि बाटी चोखा तो वही है लेकिन अब यह गरीब का भोजन न हो के बडे शाकाहारी लोगों के शान का भोजन हो गया है। उनका कहना है कि अब तो बडी पार्टियों में बाटी चोखा का मीनू रखा जा रहा है तथा लोग इसे बडे चाव से खा रहे है। राजधानी लखनऊ समेत पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई शहरों जैसे देवरिया, गोरखपुर, मऊ, कुशीनगर, बलिया, गाजीपुर, बस्ती और बनारस में अच्छी बाटी। चोखा की दुकाने देखी जा सकती है। जहां लोग बडे चाव से इसका स्वाद लेते दिखाई पड जायेंगे। बाटी और चोखे का भोजन करने के पीछे स्वास्थ्य वर्धक तथ्य यह है कि सप्ताह में एक बार भोजन करने पर सामान्य भोजन से थोडा कडा होने के कारण यह आंत की सफाई कर देते हैं। सुपाच्य होने के कारण इस भोजन का कोई साइड इफेक्ट तो नही है। आज लोगों में स्वास्थ्य एवं कैलोरी के प्रति जो जागरुकता है। उसमें भी यह भोजन सहायक है। डाक्टर सचीन्द्र का कहना है कि सप्ताह में एक बार यह भोजन करने से शरीर की पाचन शक्ति बनी रहती है।
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हम क्या, हमारा क्या?

GAZALA KHAN
नाज़ और घमंड में कितना अंतर है, पिछले दिनों एक मालिक मकान को अपने किराएदार से कहते सुना कि हमने आपको रहने के लिए घर दिया। इसे आप क्या कहेंगे, नाज़ या घमंड? कोई किसी को ऐसा क्या दे सकता है, जिस पर अधिकार से कह सके कि मैंने दिया? याचक तो हम सब हैं। अगर नहीं, तो इंकार कर दें कि किसी की दी हवा में सांस नहीं लेंगे, किसी की धरती पर कदम नहीं रखेंगे, किसी और का बरसाया पानी नहीं ग्रहण करेंगे। सब खुद रचें और फिर इस्तेमाल करें। या हो सके, तो जो अब तक इस्तेमाल कर लिया है पीढ़ियों दर पीढ़ी, उसका मोल चुका दें और फिर कहें कि हम किसी के देनदार नहीं। वह आसमान का टुकड़ा हमारा है, जिसके नीचे बसी धरती पर हमने हवा पर घर बनाया है। नाज़ शब्द को जब प्राइड से जोड़ा जाता है, तब भी समझने की बात यह है कि इसमें अपने किए या पाए पर इठलाने का मुद्दा नहीं है। व्यक्तित्व निखार के ज़रिए, जिस प्राइड या नाज़ की बात की जाती है, वह घमंड से कोसों दूर है। जो आप कर रहे हैं, उस पर, अपनी मेहनत पर और उसके नतीजों में मिले इत्मीनान को स्वीकार करने या महसूस करने का ही अर्थ है यहां। नतीजे ठीक न मिले हों, तो कमतर न समझें। बस, इतना ही।
नाज़ खुद पर किया भी नहीं जाता। किसी बेहद काबिल को अपना कह पाने के सौभाग्य पर ही नाज़ किया जा सकता है। नाज़ खुद पर है, तो घमंड के बराबर है। घमंड उसे होता है, जो यह मानता है कि उसके जैसा दूसरा कोई नहीं। उसके पास जो है, वैसा किसी और के पास नहीं हो सकता। यह भाव तुलनात्मक है। लेकिन तुलना तो उनमें की जा सकती है, जिनमें ठहराव हो, बदलें न। जो सदा परिवर्तनशील है, उनमें तुलना सम्भव नहीं। शाश्वत हम हैं नहीं, तो नाज़ किस पर, और कैसा? न वक्त रुकता है और न हालात एक जैसे रहते हैं। हम इंसान जिस दिन इन पर काबू पा लें, उस दिन कह सकते हैं कि हमें नाज़ है खुद पर। तब तक यही मानना चाहिए कि हम किसी को दे ही क्या सकते हैं। बस, ज़रिया हैं चीज़ों के अदल-बदल होने का।

उम्मीद आपका नाम है!

GAZAL KHAN
क्या आप अपने बेटे या बेटी पर भरोसा करते हैं? याद रखिए कि इस समय कठघरे में आप हैं और फैसला भी आपको ही करना है। इसलिए आकलन पूरी ईमानदारी से कीजिएगा। दूसरा सवाल क्या आपके बच्चे आप पर भरोसा करते हैं?
आप असमंजस में हैं?
बड़े हो रहे बच्चों की सोच और व्यवहार में तेजी से परिवर्तन आता है। ये बदलाव ज्यादातर अभिभावकों को डरा देते हैं। भय सीमाओं को रेखांकित करता है और सीमाएं पहरों को। बस, यहीं से अविश्वास का बीज अंकुरित होने लगता है। यह स्थिति दोनों के बीच एक द्वंद्व को जन्म देती है। रही सही कसर संवादहीनता से पूरी हो जाती है। रास्ते अलग होते जाएंगे, तो दिशाएं एक रह पाना मुश्किल है।
समय जब मिलता है
जैसे ही दूरियां बढ़ती हैं, एक-दूसरे के साथ बिताने के लिए समय कम होता जाता है। जब समय मिलता है, तो उसमें अभिभावकों को लगता है कि वे बच्चे का उन मामलों पर मार्गदर्शन कर लें, जिनमें वे कमी पाते हैं। इससे बच्चे को लगता है कि वे मीनमेख निकाल रहे हैं और वह और कटने लगता है।
साथ छूटा, भरोसा टूटा
युवावस्था की दहलीज पर कदम रखे बच्चे अपने बड़े होने को लेकर बेहद उत्साहित होते हैं। वे अपने फैसले खुद लेना चाहते हैं। घर के मार्गदर्शन को वे आलोचना मानने ही लगते हैं, सो दोस्तों की अहमियत बढ़ने लगती है। बच्चों की इस कच्ची उम्र से वाकिफ अभिभावक अब और ज्यादा ही सचेत हो जाते हैं। उन्हें जिम्मेदारियों के निर्वाह, लोगों की परख और सही और गलत में फर्क कर पाने को लेकर बच्चों की समझ पर संशय होता है। ये संशय अभिभावकों को बात-बात पर बच्चों को समझाइश देने या सवाल पूछने के लिए प्रेरित करता है। कुल मिलाकर हालात बिगड़ते चले जाते हैं।
1. बच्चे पहले ही मान लेते हैं कि माता-पिता उनकी बातों को एक बार में नहीं मानेंगे, इसलिए अपनी बात रखने के साथ-साथ वे विरोध दर्ज करने के लिए भी तैयार रहते हैं और मौका पड़ते ही पूरी ताकत लगा देते हैं। फिर संवाद नहीं सिर्फ तर्क-विर्तक होता है। इससे रिश्तों में कड़वाहट का शामिल होना लाजमी है। दो-तीन ऐसे वाकये बच्चे को विश्वास दिला देते हैं कि आप अभिभावक उसकी बातों को कभी नहीं समझ पाएंगे। इसलिए धीरे-धीरे वह अपनी बातों को बांटना छोड़ देता है और अपनी दुनिया में व्यस्त होने लगता है।
2. माता-पिता बच्चे के लिए आईना होते हैं। आपकी तारीफ उन्हें बेहतर प्रदर्शन करने की प्रेरणा देती है। आपके भरोसे को कायम रखने के लिए वह जी-जान से कोशिश करते हैं। लेकिन जब वे इसी भरोसे को डगमगाते देखते हैं, तो उनके आत्मविश्वास को चोट पहुंचती है। इस बात को समझिए कि बच्चे की हर बात को लेकर आपका संदेह, उसे खुद पर भी भरोसा करने नहीं देगा। ऐसे में वह हीन भावना से घिरने लगेगा। अपनी खूबियों को नजरअंदाज करेगा। इन बातों का सीधा असर उसके मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास पर पड़ेगा।
क्या करें
स्वस्थ संवाद कीजिए। ध्यान रखें कि संवाद तभी होता है, जब दोनों पक्ष एक-दूसरे को सुनें। आपको बच्चे की बातों न सिर्फ सुनना है, बल्कि उसे समझने की कोशिश भी करना है। जैसे-जैसे आपके बीच संवाद की डोर मजबूत होगी, अविश्वास की गुंजाइश कम होती जाएगी। बच्चे को क्या और क्यों मना किया जा रहा है, साफ-साफ बताइए। यह बचपन से करें, तो और बेहतर। बच्चे को छोटी-छोटी जिम्मेदारियां सौंपिए। यदि कोई कमी रह गई हो, तो उसके बारे में भी प्यार से बताएं। आपका भरोसा उसका सम्बल है। सकारात्मक रवैया अपनाएं। बच्चे की संगत और उसके दोस्तों के बारे में शक के साथ नहीं, बल्कि केवल जानकारीपरक बातें करें। उम्र के इस पड़ाव में बच्चे आजादीभरा माहौल चाहते हैं। यदि आपको बच्चे के रहन-सहन को लेकर कोई आपत्ति है, तो उसे डांटने के बजाय अपना तर्क रखें। बच्च खुद-ब-खुद समझ जाएगा। आपके दिए भरोसे के कारण ही आपका बच्च एक भरोसेमंद इंसान बन पाएगा। जो आपसे पाएगा, वो उसके व्यक्तित्व में झलकेगा। आप उसकी उम्मीद बनेंगे, वो आपका भरोसा।