Saturday, 30 July 2011

पहली भारतीय महिला सुचेता गोबी जिसने रेगिस्तान पार किया

मंगोलिया की रेत की गर्मी में यह कारनामा करने वाली सुचेता पहली भारतीय महिला बन गई हैं। महाराष्ट्र में पुणे की 33 वर्षीय सुचेता 1623 किलोमीटर में फैले गोबी रेगिस्तान पार करने वाली पहली भारतीय महिला बन गई हैं। गोबी रेगिस्तान एशिया का सबसे बड़ा और विश्व का पांचवा बड़ा रेगिस्तान है।
रिपले डेवनपोर्ट की अगुवाई में गए 13 सदस्यीय अभियान में शामिल सुचेता ने अपना अभियान 15 जुलाई को पूरा किया। तब 60 दिवसीय इस अभियान के खत्म होने में नौ दिन बाकी थे।
मंगोलिया की रेत की गर्मी में यह साहसिक कारनामा करने वाली वह पहली भारतीय महिला बन गई हैं। इस अभियान के लिए गए 13 सदस्यीय दल में से केवल सात ही मंजिल तक पहुंच पाए। सुचेता कदेथांकर के साथ साथ ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर की एक एक महिला को भी गोबी रेगिस्तान पार करने में सफलता मिली। शेष छह सदस्य घायल होने या किसी अन्य कारण के चलते अभियान से अलग हो गए थे।
शहर वापस लौटने के बाद सुचेता ने कहा कि गोबी को पार करते समय सबसे बड़ी चुनौती मिशन पूरा करने को हौसला बनाए रखने की थी। पर्वतारोहण के दौरान जहां हर कदम पर परिदृश्य बदलता रहता है वहीं रेगिस्तान में दूर दूर तक केवल रेत ही नजर आती है।
अभियान के दौरान सुचेता हर दिन औसतन 32 किमी चलती थीं। 25 मई को उनका अभियान मंगोलिया के खोंगोर्न के उत्तर से शुरू हुआ था।

gazala khan

Monday, 25 July 2011

विदेशी महिलाएं और वेश्यावृत्ति

विदेशी महिलाओं ने जिस्म फरोशी के धंधा का देश भर में जाल बिछा रखा है। देश में कोई सख्त कानून न होने के कारण यह धंधा काफी फल फूल रहा है। जिससे भारतीय समाज भी प्रभावित हो रहा है। शासन और प्रशासन इसे रोकने में पूरी सफल नहीं हो पा रहा है।
अब तो बाकायदा इस धंधे को विदेशों की तरह भारत में भी सामाजिक मान्यता दिलाये जाने के लिए कानून बनाने पर विचार शुरू हो गया है। अगर ऐसा होता है तो क्या भारतीय परंपराएं धार्मिक मान्यताएं और सामाजिक व्यवस्थाओं को कुचलने का काम नहीं होगा? क्या पश्चिम सभ्यता हम पर हावी हो जायेगी? भारत सदियों में धार्मिक परम्पराओं और सामाजिक ढांचे में जीता आया है।
इसलाम धर्म हो, सनातन और या फिर सिख धर्म हो । कोई धर्म वेश्यावृत्ति और समलैंगिकता को मान्यता नहीं देता।
कुछ समय पूड्ढर्व बहस छिड़ी थी कि समलैंगिकता को मान्यता मिले या न मिले। लेकिन इसे बाद में न्यायालय से मान्यता मिल गई। जिस का लगभग सभी धर्म को गुरुओं ने
विरोध भी किया। अब वेश्यावृत्ति को लेकर बहस छिड़ी हुई है। सुप्रीमकोर्ट ने भी सभी प्रदेशों से पूछा है कि क्यों न वेश्यावृत्ति को
सामाजिक मान्यता दिलाए जाने के लिए कानून बनाया जाये।
देश के बड़े शहरों दिल्ली मुंबई कोलकाता तो दूर छोड़े छोड़े शहरों में भी आधुनिकता के नाम पर अश्लीलता परोसी जा रही है। इसे रोकने में सफलता नहीं मिल पा रही है क्यों कोड्ढई सड्ढख्त कानून नहीं है।
देश में नेपाल, उकेजिस्तान, आस्ट्रेलिया और देशों ने महिलाएं ट्यूरिस्ट वीजा लेकर भारत आती हैं और बाद में यह वेश्यावृत्ति के धंधे में लग जाती हैं। आए दिन ऐसे रैकेट को भंडा भी फूटता है लेकिन इस के बाद भी वेश्यावृत्ति
पर अंकुश नहीं लग पा रहा है।
पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि यह विदेशी महिलाएं एक रात के 20,000 से 35,000 रुपये वसूलती हैं।
अपराध शाखा ने 18 जुलाई को साउथ एक्स पार्ट-2 से विदेशी महिलाओं के एक रैकेट का पर्दाफाश करते हुए सात महिलाओं को गिरफ्तार किया था। उनमें एक महिला कजाकिस्तान, तीन उजबेकिस्तान तथा दो नेपाल की रहने वाली थीं।
कजाकिस्तान की रहने वाली महिला उनकी मुख्य सरगना थी जो अभिलाष नाम व्यक्ति के साथ मिलकर यह रैकेट चलाती थी।
पुलिस ने 12 जुलाई को दक्षिणी दिल्ली के छतरपुर से भी ऐसे ही एक रैकेट का पर्दाफाश कर पांच महिलाओं तथा उनके दो चचेरे भाइयों को गिरफ्तार किया था। उनसे ऑडी कार भी बरामद की गई थी।
अगर वेश्यावृत्ति को मान्यता दिये जाने के लिए कानून बनता है तो इससे धार्मिक मान्यताओं पर तो प्रभाव पड़ेगा ही साथ ही सामाजिक ढांचा भी अछूता नहीं रह पाएगा।
कानून तो बने लेकिन ही उसमें सामाजिक ढांचे और भारतीय सभ्यता प्रभावित न होने पाये।
Gazala Khan

Sunday, 24 July 2011

छात्रा से गैंगरेप कर बनाया एमएमएस

Gazala Khan
पतौवापुरा गांव की 14 वर्षीय एक छात्रा से शाहपुर के ही तीन युवकों ने सामूहिक दुष्कर्म कर उसका ‘एमएमएस तैयार कर लिया। ‘साइबर क्राइम’ अब महानगरों से निकल कर दूरस्थ ग्रामीण अंचलों तक पहुंच चुका है, जिसकी एक झलक बैतूल जिले के आदिवासी बहुल शाहपुर तहसील में देखने को मिली,  


शाहपुर पुलिस थाने के प्रभारी (टीआई) विल्सन मैनुअल ने आज यहा बताया कि लगभग चार माह बाद इस बात का खुलासा तब हुआ जब आरोपी युवकों ने ‘एमएमएस’ के जरिए छात्रा को श्ब्लैकमेलश् करना शुरू कर दिया। बालिका ने परिजन के साथ थाने पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने मामला दर्ज कर कल दोपहर में जिला अस्पताल में स्कूली छात्रा का मेडिकल परीक्षण कराया है।

पुलिस में दर्ज रिपोर्ट के अनुसार, जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के पतौवापुरा गाव की 14 वर्षीय एक छात्रा के पास गत 29 मार्च को शाहपुर के ही दो युवक आए और ‘गेस पेपर’ देने का लालच दिया। इसके लिए वे उसे चोपना रोड स्थित एक शिवमंदिर के निकट सुनसान इलाके में ले गए और वहा मौजूद एक साथी के साथ मिलकर उन्होंने उससे सामूहिक दुष्कर्म किया।

दुष्कर्म के दौरान युवकों ने मोबाइल से इस कृत्य की ‘क्लिप’ भी तैयार कर ली। यह बालिका शाहपुर के एक निजी स्कूल में पढ़ती है। घटना के बाद युवक स्कूली छात्रा को इस ‘क्लिप’ को श्एमएमएसश् के जरिए सार्वजनिक करने की धमकी देकर ‘ब्लैकमेल’ करते रहे। इस दौरान युवकों ने कई बार छात्रा से दुष्कर्म किया।
 
‘ब्लैकमेल’ से तंग आकर छात्रा ने यह बात अपनी मा को बताई, जिसके बाद छात्रा के पिता ने आरोपियों के खिलाफ शाहपुर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई।
 
शाहपुर टीआई मैनुअल ने बताया कि इस बालिका ने आरोपी युवकों का नाम ह्मदेश, बाबू जगताप एवं गिरीश बताया है। ये तीनों युवक शाहपुर बाजार में दुकान लगाते हैं। मामले की शिकायत उसने कलेक्टर बी. चन्द्रशेखर एवं एसडीएम के. वासुकी से भी की है।

उन्होंने कहा कि तीनों आरोपी फरार हैं और उनकी तलाश की जा रही है। आरोपियों के खिलाफ छह अलग-अलग धाराओं 363, 366, 376 (2-जी) 506 के तहत प्रकरण दर्ज किया गया है। उनकी तलाशी के लिए कई स्थानों पर छापे मारे जा रहे हैं।




Saturday, 23 July 2011

भारतीय महिलाओ का बाजारी करण



 भारतीय महिलाओ को आजकल विज्ञापन के माध्यम से बाजार में परोसा जा रहा है। जिससे भारतीय सभ्यता और समाजिक मान्यताओ पर गहरा असर पड रहा है। अब तो देश की सर्वश्रेष्ठ अदालत ने भी नये बाजार को मान्यता देने के लिये विचार शुरू कर दिया है। 
एक वह बाजार है, जो परंपरा से सजा हुआ है और दूसरा वह बाजार है, जिसने औरतों के लिए एक नया बाजार पैदा किया है। जबकी महिलाओ के शरीर की नुमाइश कर मीडिया लोकप्रियता (टीआरपी) बढाने में चौबिसो घंटे प्रयासरत रहती हैं।
समय-समय पर देहव्यापार को कानूनी अधिकार देने की बातें इस देश में भी उठती रहती हैं। हर मामले में दुनिया की नकल करने पर आमादा हमारे लोग वैसे ही बनने पर उतारू हैं। जाहिर तौर पर यह संकट बहुत बड़ा है। ऐसा अधिकार देकर हम देह के बाजार को न सिर्फ कानूनी बना रहे होंगे, बल्कि मानवता के विरुद्ध एक अपराध भी कर रहे होंगे।
हम देखें तो सुप्रीमकोर्ट की पहल के बाद एक बार फिर वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता देने की बातचीत तेज हो गई है। यह बहस हाल में ही सुप्रीमकोर्ट द्वारा इस मामले में वकीलों के पैनल व विशेषज्ञों से उस राय के मागने के बाद छिड़ी है, जिसमें कोर्ट ने पूछा है कि क्या ऐसे लोगों को सम्मान से अपना पेशा चलाने का अधिकार दिया जा सकता है? उनके संरक्षण के लिए क्या शर्ते होनी चाहिए?
कुछ समय पहले काग्रेस की सासद प्रिया दत्त ने वेश्यावृत्ति को लेकर एक नई बहस छेड़ दी थी, तब उन्होंने कहा था, ‘मेरा मानना है कि वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता प्रदान कर देनी चाहिए ताकि यौन कर्मियों की आजीविका प्रभावित न हो।’ प्रिया के बयान के पहले भी इस तरह की मागें उठती रही हैं। कई संगठन इसे लेकर बात करते रहे हैं। खासकर ‘पतिता उद्धार सभा’ ने वेश्याओं को लेकर कई महत्वपूर्ण मागें उठाई थीं।
हमें देखना होगा कि आखिर हम वेश्यावृत्ति को कानूनी जामा पहनाकर क्या हासिल करेंगे? क्या भारतीय समाज इसके लिए तैयार है कि वह इस तरह की प्रवृत्ति को सामाजिक रूप से मान्य कर सके। दूसरा विचार यह भी है कि इससे इस पूरे दबे-छिपे चल रहे व्यवसाय में शोषण कम होने के बजाए बढ़ जाएगा। आज भी यहा स्त्रिया कम प्रताड़ित नहीं हैं। 
दुनिया भर की नजर इस समय औरत की देह को अनावृत करने में है। ये आकड़े हमें चौंकाने वाले ही लगेंगे कि 100 बिलियन डॉलर के आसपास का बाजार आज देह व्यापार उद्योग ने खड़ा कर रखा है। हमारे अपने देश में भी 1 करोड़ से ज्यादा लोग देह व्यापार से जुड़े हैं, जिनमें पांच लाख बच्चे भी शामिल हैं।
सेक्स और मीडिया के समन्वय से जो अर्थशास्त्र बनता है, उसने सारे मूल्यों को शीर्षासन करवा दिया है। फिल्मों, इंटरनेट, मोबाइल, टीवी चैनलों से आगे अब वह मुद्रित माध्यमों पर पसरा पड़ा है। प्रिंट मीडिया जो पहले अपने दैहिक विमर्शाे के लिए ‘प्लेबॉय’ या ‘डेबोनियर’ तक सीमित था, अब दैनिक अखबारों से लेकर हर पत्र-पत्रिका में अपनी जगह बना चुका है।
अखबारों में ग्लैमर वर्ल्ड के कॉलम ही नहीं, खबरों के पृष्ठों पर भी लगभग निर्वसन विषकन्याओं का कैटवाक खासी जगह घेर रहा है। वह पूरा हल्लाबोल 24 घटे के चैनलों के कोलाहल और सुबह के अखबारों के माध्यम से दैनिक होकर जिंदगी में एक खास जगह बना चुका है। शायद इसीलिए इंटरनेट के माध्यम से चलने वाला ग्लोबल सेक्स बाजार करीब 60 अरब डॉलर तक जा पहुंचा है। मोबाइल के नए प्रयोगों ने इस कारोबार को शक्ति दी है।
एक आकड़े के मुताबिक मोबाइल पर अश्लीलता का कारोबार भी पांच सालों में पांच अरब डॉलर तक जा पहुंचेगा।
बाजार के केंद्र में भारतीय स्त्री है और उद्देश्य उसकी शुचिता का अपहरण है। सेक्स सांस्कृतिक विनिमय की पहली सीढ़ी है। शायद इसीलिए जब कोई भी हमलावर किसी भी जातीय अस्मिता पर हमला बोलता है तो निशाने पर सबसे पहले उसकी औरतें होती हैं। यह बाजारवाद अब भारतीय अस्मिता के अपहरण में लगा है- निशाना भारतीय औरतें हैं।
ऐसे बाजार में वेश्यावृत्ति को कानूनी जामा पहनाने से जो खतरे सामने हैं, उससे यह एक उद्योग बन जाएगा। आज कोठेवालिया पैसे बना रही हैं तो कल बड़े उद्योगपति इस क्षेत्र में उतरेंगे। युवा पीढ़ी पैसे की ललक में आज भी गलत कामों की ओर बढ़ रही है, कानूनी जामा होने से यह हवा एक आंधी में बदल जाएगी। इससे हर शहर में ऐसे खतरे आ पहुंचेंगे। जिन शहरों में यह काम चोरी-छिपे हो रहा है, वह सार्वजनिक रूप से होने लगेगा। ऐसी कालोनिया बस जाएंगी और ऐसे इलाके बन जाएंगे।
संभव है कि इसमें विदेशी निवेश और माफिया का पैसा भी लगे। हम इतने खतरों को उठाने के लिए तैयार नहीं हैं। जाहिर तौर पर स्थितिया हतप्रभ कर देने वाली हैं। इनमें मजबूरियों से उपजी कहानिया हैं तो मौज-मजे के लिए इस दुनिया में उतरे किस्से भी हैं। भारत जैसे देश में लड़कियों को किस तरह इस व्यापार में उतारा जा रहा है, ये किस्से आम हैं। आदिवासी इलाकों से निरंतर गायब हो रही लड़किया और उनके शोषण के अंतहीन किस्से इस व्यथा को बयान करते हैं।
खतरा यह है कि शोषण रोकने के नाम पर देहव्यापार को कानूनी मान्यता देने के बाद सेक्स रैकेट को एक कारोबार का दर्जा मिल जाएगा।
सबसे बड़ा खतरा हमारी सामाजिक व्यवस्था के लिए पैदा होगा, जहा देह व्यापार भी एक प्रोफेशन के रूप में मान्य हो जाएगा। आज चल रहे गुपचुप सेक्स रैकेट कानूनी दर्जा पाकर अंधेरगर्दी पर उतर आएंगे। परिवार नाम की संस्था को भी इससे गहरी चोट पहुंचेगी। हमें देखना है कि क्या हमारा समाज इस तरह के बदलावों को स्वीकार करने की स्थिति में है। यह भी बड़ा सवाल है कि क्या औरत की देह को उसकी इच्छा के विरुद्ध बाजार में उतारना और उसकी बोली लगाना उचित है? क्या औरतें एक मनुष्य न होकर एक वस्तु में नहीं बदल जाएंगी, जिनकी बोली लगेगी और वे नीलाम की जाएंगी? स्त्री की देह का मामला सिर्फ श्रम को बेचने का मामला नहीं है।
देह और मन से मिलकर होने वाली क्रिया को हम क्यों बाजार के हवाले कर देने पर आमादा हैं, यह एक बड़ा मुद्दा है। औरत की देह पर सिर्फ और सिर्फ उसका हक है। उसे यह तय करने का हक है कि वह उसका कैसा इस्तेमाल करना चाहती है। इस तरह के कानून औरत की निजता को एक सामूहिक प्रोडक्ट में बदलने का वातावरण बनाते हैं। अपने मन और इच्छा के विरुद्ध औरत के जीने की स्थितिया बनाते हैं। यह अपराध कम से कम भारत की जमीन पर नहीं होना चाहिए।
स्त्री आज के समय में घर और बाहर दोनों स्थानों पर अपेक्षित आदर प्राप्त कर रही है। वह समाज को नए नजरिये से देख रही है। उसका आकलन कर रही है और अपने लिए निरंतर नए क्षितिज खोल रही है। ऐसी सामर्थ्यशाली स्त्री को शिखर छूने के अवसर देने के बजाए हम उसे बाजार के जाल में फंसा रहे हैं। वह अपनी निजता और सौंदर्यबोध के साथ जीने की स्थितिया और आदर समाज जीवन में प्राप्त कर सके, हमें इसका प्रयास करना चाहिए। हमारे समाज में स्त्रियों के प्रति धारणा निरंतर बदल रही है।
स्त्री सही मायने में इस दौर में ज्यादा शक्तिशाली होकर उभरी है, लेकिन बाजार हर जगह शिकार तलाश ही लेता है। वह औरत की शक्ति का बाजारीकरण करना चाहता है। हमें देखना होगा कि भारतीय स्त्री पर मुग्ध बाजार उसकी शक्ति तो बने, लेकिन उसका शोषण न कर सके।
आज मीडियामय और विज्ञापनी बाजार में औरत के लिए हर कदम पर खतरे हैं। पल-पल पर उसके लिए बाजार सजे हैं। देह के भी, रूप के भी, प्रतिभा के भी, कलंक के भी। हद तो यह कि कलंक भी पब्लिसिटी के काम आ रहे हैं, क्योंकि यह समय कह रहा है कि दाग अच्छे हैं। बाजार इसी तरह से हमें रिझा रहा है और बोली लगा रहा है। हमें इस समय से बचते हुए इसके बेहतर प्रभावों को ग्रहण करना है। सुप्रीमकोर्ट को चाहिए कि वह ऐसे लोगों की मंशा को समझे, जो औरत को बाजार की वस्तु बना देना चाहते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर महिलाओं के प्रति अपनी संवेदनशीलता का परिचय देते हुए परमादेश जारी किया है कि केंद्र और राच्य सरकारें एक सर्वेक्षण करके उन यौन कर्मियों के बारे में बताएं, जो अपने जीवन को बेहतर ढंग से जीने की इच्छा रखती हैं, ताकि उन्हें बेहतर और श्रेष्ठ कामों के मौके दिए जा सकें और वे एक सम्मानित जीवन जी सकें।
अपने आप में यह एक प्रगतिशील फैसला है, क्योंकि इससे यौनकर्म में दासता और अपमान का जीवन जी रही लाखों महिलाओं को मुक्ति की आशा और राह दिखाई दे रही है। बेशक यौन कर्मियों के पुनर्वास और तकनीकी हुनर विकास के लिए दिया यह आदेश स्वागत योग्य है, लेकिन इससे भी कई बड़े सवाल हैं, जो कहीं आगे सोचने पर मजबूर करते हैं। यौन कर्म या यौन व्यापार में शामिल महिलाओं का पुनर्वास समस्या का सिर्फ एक पक्ष है। उससे जुड़े और भी गंभीर मुद्दे हैं, जैसे पारिवारिक और सामाजिक स्वीकृति, सम्मान और पहचान, श्रम-मूल्य और उनके वैकल्पिक श्रम को मान्यता।
कड़वा सच तो यह है कि आज दलितों के पास श्रम विकल्प मौजूद हैं, मगर सामाजिक स्वीकृति न होने के कारण आज भी उन्हें अछूत माना जाता है। आज भी असंख्य लोग सामाजिक स्वीकृति के अभाव में अपने जातीय व्यवसाय को ही अपनाए रखने पर विवश हैं। पारिवारिक और सामािजक स्वीकृति के अभाव में कितनी ही यौनकर्मी महिलाएं जिल्लत और अपमान का जीवन जीने पर विवश होकर वापस इसी व्यवसाय में लौट आती हैं।
दुनिया के बहुत से देशों में यौन कर्म को एक वैध व्यापार के रूप में मान्यता प्राप्त है। वहा इसे इतनी हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता। यह भी एक प्रकार का श्रम ही माना जाता है। एक मजदूर अपनी मेहनत बेचकर मजदूरी प्राप्त करता है और एक कलाकार अपने कलात्मक श्रम का मूल्य पाता है। इसी तरह एक यौन कर्मी अपने कलात्मक दैहिक श्रम का मूल्य पाती है। इसलिए उसमें हेयता और तुच्छता की सोच नहीं होनी चाहिए। अन्य श्रम व्यापारों की ही भाति उसका भी नियमन और उसे मान्यता दी जानी चाहिए।
दूसरी बात यह कि आज यौन कर्म एक अवैध व्यापार है, मगर फिर भी वह धड़ल्ले से जारी है। आम आदमी से लेकर बड़े और सम्मानित जनों तक यौन कर्म की महिमा व्याप्त है। यौन कर्म को वैध करार दिए जाने से उससे जुड़े तमाम अवैध कार्याे और तरीकों को रोका जा सकता है। एक व्यापारी की भाति अपना पूरा मूल्य पाने का अधिकार यौन कर्मियों को मिल सकता है। उन्हें दलालों और पेशेवर व्यापारियों के जाल में फंसने से बचाया जा सकता है। बस जो होता है, वह चोरी छिपे होता है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण हमें अपने इतिहास से ही मिल जाता है।
न्यूजीलैंड, फिलिपींस, थाइलैंड, कनाडा जैसे देशों की भांति अगर भारत समेत दूसरे देशों में यौन कर्म एक वैध व्यापार के रूप में स्वीकृत होता है तो इससे यौन कर्मियों के साथ होने वाले भेदभाव, जबरदस्ती और हिंसा को रोका जा सकेगा। वैधता के रहते उन्हें अपना मूल्य, अपनी इच्छा-अनिच्छा और मोल-भाव करने की आजादी प्राप्त होगी। वे दलालों और ठेकेदारों के चंगुल से आजाद और आगाह होंगी। उन्हें देह-व्यापार के वैध और अवैध रूप के बारे में जानकारी होगी। यौन सावधानियों और सुरक्षा उपायों पर उनका नियंत्रण होगा। ठीक उसी तरह जैसे अन्य किसी भी तरह के व्यापार में व्यापारियों के हाथ में नियंत्रण होता है। यौन कर्मी स्त्रिया ग्राहक और ठेकदार पुरुषों के शोषण को चुनौती दे पाएंगी।
बेशक, पुनर्वास और तकनीकी हुनर विकास यौनकर्मियों के लिए एक बेहतरीन विकल्प है, मगर तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि पुनर्वास के बाद भी तमाम स्त्रियां इस व्यापार में लौट आती हैं। दरअसल, समाज में दोबारा उन्हें न तो परिवार स्वीकार करता है और न ही उन्हें सम्मानित दर्जा मिल पाता है। यौन कर्म को वैधता मिल जाने पर उनके बच्चों को समाज और शिक्षा की मुख्य धारा के साथ जोड़ा जा सकेगा। उनके बच्चों को बेहतर विकल्पों और श्रम क्षेत्रों में आगे बढ़ने के मौके दिए जा सकेंगे।
यौन कर्म की वैधता इस क्षेत्र में चोरी छिपे चल रहे व्यापारों और धाधलियों को रोक सकती है। एक व्यापार के रूप में शासकीय नियंत्रण में वह एक बेहतर व्यापारिक क्षेत्र साबित हो सकता है।

गजाला खान
visharadtimes.com

Friday, 22 July 2011

अब फेसबुक की बादशाहत पर खतरा

सोशल नेटवर्किग की दुनिया में फेसबुक की बादशाहत पर खतरा मंडराता नजर आ रहा है। फेसबुक को टक्कर देने के लिए लोकप्रिय सर्च इंजन गूगल की ओर से हाल ही में लांच की गई गूगल प्लस की लोकप्रियता में दिनों-दिन इजाफा हो रहा है। इस सोशल नेटवर्किंग साइट ने शुरू होने के तीन सप्ताह के भीतर ही दो करोड़ इंटरनेट यूजर्स को अपनी ओर आकर्षित कर लिया है। इनमें आधे लोग अमेरिका और भारत से हैं।
रिसर्च फर्म कामस्कोर के मुताबिक, 29 जून से 19 जुलाई के बीच गूगल प्लस को लगभग दो करोड़ लोगों ने देखा। इनमें से करीब 50 लाख अमेरिका और 30 लाख भारत से थे। इसके बाद लंदन, जर्मनी और फ्रांस के लोगों ने देखा। कामस्कोर के उपाध्यक्ष एंड्रयू लिप्समेन ने कहा कि मैंने कभी भी इतनी तेजी से किसी साइट को विकास करते हुए नहीं देखा। 28 जून को लांच हुआ गूगल प्लस प्रतिद्वंद्वी फेसबुक को गूगल का जवाब माना जाता है। इसमें यूजर्स अपने दोस्तों के समूह के बीच फोटो अपलोड करने के साथ संदेश और टिप्पणियां भी पोस्ट कर सकते हैं। गूगल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी लैरी पेज ने पिछले हफ्ते कहा था कि गूगल प्लस के यूजर्स की संख्या एक करोड़ से ज्यादा है।

इंटरनेट से जुड़े बच्चों पर रहेगी तीसरी आंख

ARVISH KHAN
अगर आपका बच्चा इंटरनेट का ज्यादा इस्तेमाल करता है और आपको आशंका है कि वह गलत साइट देखता है, मगर आप कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं है तो अब आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि एक ऐसा साफ्टवेयर तैयार किया गया है जो आपको श्तीसरी नजरश् देगा और इंटरनेट पर की जाने वाली बच्चे की हर हरकतों की जानकारी उपलब्ध कराएगा।
प्रौद्योगिक के क्षेत्र में हो रहे नित नए बदलाव या यूं कहें कि विकास, कई समस्याओं को साथ लेकर आ रहा है। वर्तमान दौर में विकास के परिचायक है कम्प्यूटर व इंटरनेट। लेकिन अब यही इंटरनेट नई पीढ़ी के एक वर्ग को भटकाव के रास्ते पर भी ले जा रहा है। इस बात को अभिभावक भी जानते है, मगर क्या करें क्योंकि उनके पास इसे पर लगाम लगाने का कोई तरीका नहीं है।
अभिभावक अपने बच्चे द्वारा इंटरनेट पर की गई हरकतों को जान सकें, इसके लिए भोपाल के शाजी जान ने एक सॉफ्टवेयर तैयार किया है, जिसे नाम दिया है ‘फन एंड लर्न’। इस सॉफ्टवेयर के सम्बंधित कम्प्यूटर पर अपलोड होने पर बच्चा निर्धारित समय 15 मिनट तक ही मनचाही साइट देख सकेगा या गेम खेल सकेगा। तय वक्त गुजर जाने के बाद वह साइट व गेम खुलेगा ही नहीं, अगर बच्चा उसे आगे जारी रखना चाहता है तो उसे आने वाले सवालों का जवाब देना होगा, ये सवाल उसके पाठ्यक्रम से संबंधित होंगे।
जॉन बताते है कि इस साफ्टवेयर के जरिए पहली से लेकर 12वीं तक के पाठयक्रम को भी कम्प्यूटर पर अपलोड किया जाता है। जब बच्चा साइट देखते या गेम को खेलते हुए निर्धारित समय को पार करने पर पूछे गए सवालों का जवाब दे देता है तो उसे डालर मिलते है। इन अर्जित किए गए डालर से भी वह आगे तय समय तक ही मनचाही साइट देख या गेम खेल सकता है। इस तरह बच्चे को मनपसंद साइट को देखने के लिए परीक्षा पास करना होगी तभी तो उसे डालर मिलेंगे। इस तरह पढ़ाई करते जाइए और खेलते जाइए।
जॉन द्वारा बनाए गए इस साफ्टवेयर की एक और खूबी है। संबंधित कम्प्यूटर पर बच्चे ने इंटरनेट का कितना इस्तेमाल किया है इसकी जानकारी अभिभावक की मेल आईडी पर आ जाएगी। इसमें यह ब्योरा होगा कि बच्चे ने कितनी देर कौन-सी साइट देखी है। इस तरह अभिभावक का वह काम आसान हो जाएगा जो अभी उन्हें परेशान किए रहता है कि उनका बच्चा इंटरनेट पर क्या करता है। जॉन बताते है कि यह साफ्टवेयर अभिभावकों के लिए एक शक्तिशाली शस्त्र है जिसके माध्यम से वे अपने बच्चे में शैक्षणिक श्रेष्ठता लाने के साथ अच्छे संस्कार व चरित्र निर्माण कर सकते है। इस सॉफ्टवेयर को बनाने में जॉन को लगभग सात वर्षाे का समय लगा। अब यह सॉफ्टवेयर मूर्तरूप ले चुका है।

मेट्रो और मोबाइल

गजाला खान


निकलते हैं जब घर से हम

चेहरे पर होती

मुस्कान-हंसी और ठहाके

मीठी-मीठी होतीं हैं

दिल की बातें

मेट्रो के सफर में

रगड़ खाने के बाद

खो जाती हैं कहीं

मुलाकातों की यादे

मोबाइल पर बातों का करना

मेट्रो के एनाउंसमेंट

भीड़ की चिल्लाहट

किसी बच्चे के रोने

की आवाज

तब बदल जाता है

चेहरे का भूगोल,

जुबान की मिठास

हो जाती है गायब

कई बार टूटते हैं

कई बार जुड़ते हैं

हर रोज होता है

यह सिलसिला

बार बार मोबाइल पर

इस सफर में

जुडते और टूटते हैं

यह दिल ।

Thursday, 21 July 2011

जहां बच्चे बोलते हैं 44 भाषाएं

Gazala khan
managing editor
visharadtimes.com
आपको यकीन हो या न हो, लेकिन यह सच है जहां बच्चे 44 भाषाएं बोलते हैं। ब्रिटेन में एक ऐसा प्राइमरी स्कूल है जहां के सभी बच्चो को 44  भाषाओ का ज्ञान है जो अपने आप में एक रिकार्ड है। इस स्कूल का नाम है सेंट मैथ्यूज चर्च आफ इंग्लैंड प्राइमरी स्कूल।
यहां पर बोली जाने वाली भाषाओं में भारत की दो प्रादेशिक भाषाएं कन्नड़ और तेलुगु भी शामिल है। इसके अलावा बच्चे अफ्रीकी, फिलीपिनो, गा, किसी, योरुबा और जुलु जैसी भाषाएं भी बोलते हैं। कुल मिलाकर यहां सात महाद्वीपों की भाषाएं बोली जाती हैं।
यहां पढ़ने वाले 477 बच्चों में से 178 बच्चे मातृ भाषा के तौर पर अंग्रेजी नहीं बोलते। स्कूल की प्राध्यापक जेनेट लाइटफुट ने बताया, ‘अक्सर लोग इसे एक जटिलता के रूप में देखते हैं, लेकिन हमें अपनी यह विभिन्नता बहुत पसंद है। यही बात हमारे स्कूल को सबसे खास बनाती है।’
40 साल पुराना चर्च आफ इंग्लैंड स्कूल गैर अंग्रेजी बच्चों को वरीयता देता है। यहां दाखिला लेने वाले जिन बच्चों को अंग्रेजी नहीं आती, उन्हें अलग से अंग्रेजी की शिक्षा दी जाती है। आंकड़ों के मुताबिक, ब्रिटेन में पांच से 16 साल के करीब दस लाख बच्चे ऐसे हैं जो अंग्रेजी को द्वितीय भाषा के तौर पर बोलते हैं।

चैथे चांद की खोज: नासा

अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने घोषणा की है कि खगोलविदों ने बर्फीले बौने ग्रह प्लूटो का चक्कर लगाते एक चैथे चांद की खोज की है।
 
<iframe width="425" height="349" src="http://www.youtube.com/embed/RdwyMAD63A4" frameborder="0" allowfullscreen></iframe>
 
इस छोटे से नए उपग्रह को अस्थायी तौर पर पी4 नाम दिया गया है। हबल अंतरिक्ष टेलीस्कोप से प्लूटो के चारों ओर बने छल्लों की खोज की जा रही थी और इसी दौरान इस नए उपग्रह के सम्बंध में पता चला। पी4 को सबसे पहले हबल के वाइड फील्ड कैमरा 3 से 28 जून को ली गई एक तस्वीर में देखा गया था। इसके बाद तीन जुलाई और 18 जुलाई को हबल से ली गई अन्य तस्वीरों में इसकी पुष्टि हुई।
यह प्लूटो का चक्कर लगाने वाला अब तक का सबसे छोटा चंद्रमा है। इसका अनुमानित व्यास 13 से 34 किलोमीटर तक है। दूसरी ओर प्लूटो के सबसे बड़े चांद, कैरान का व्यास 1,043 किलोमीटर है। अन्य दो चांदों, निक्स व हाइड्रा का व्यास क्रमशः 32 किलोमीटर व 113 किलोमीटर है।
इस कार्यक्रम से जुड़े कैलीफोर्निया के एसईटीआई संस्थान के मार्क शोवाल्टर का कहना है कि मुझे यह बहुत असाधारण लगा कि हबल के कैमरों से हम इतने सूक्ष्म उपग्रह को तीन अरब मील (या पांच अरब किलोमीटर) से भी लंबी दूरी पर इतनी स्पष्टता के साथ देख सके।
पी4, निक्स व हाइड्रा की कक्षाओं के बीच स्थित है। निक्स व हाइड्रा को 2005 में हबल के जरिए ही खोजा गया था। अमेरिकी नौसेना वेधशाला ने 1978 में कैरान को खोजा था। साल 1990 में हबल के इस्तेमाल से यह स्पष्ट हुआ कि यह प्लूटो से अलग उपग्रह है।

Saturday, 16 July 2011

इबादत, तिलावत और सखावत की रात

मुस्लिम कैलेण्डर के मुताबिक शाबान माह की 14 तारीख (रविवार, 17 जुलाई) को शब-ए-बरात का त्योहार मनाया जा रहा है । इबादत, तिलावत और सखावत (दान-पुण्य) के इस त्योहार के लिए मस्जिदों और कब्रिस्तानों में खास सजावट की जाएगी। रविवार की रात मनाए जाने वाले शब-ए-बरात के त्योहार पर कब्रिस्तानों में भीड़ का आलम रहेगा।
मान्यता है कि पूरेे साल किए गए कर्मों का लेखा-जोखा तैयार करने और आने वाले साल की तकदीर तय करने वाली इस रात को शब-ए-बरात कहा जाता है। इस रात को पूरी तरह इबादत में गुजारने की परंपरा है। नमाज, तिलावत-ए-कुरआन, कब्रिस्तान की जियारत और हैसियत के मुताबिक खैरात करना इस रात के अहम काम है। मालवा-निमाड़ में इस त्योहार पर तरह-तरह के स्वादिष्ट मिष्ठानों पर दिलाई जाने वाली फातेहा के साथ मनाया जाता है।
मुस्लिम धर्मावलंबियों के प्रमुख पर्व शब-ए- बरात के मौके पर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में शानदार सजावट होगी तथा जल्से का एहतेमाम किया जाएगा। रात्रि में मुस्लिम इलाकों में शब-ए-बरात की भरपूर रौनक होगी। शब-ए-बरात की रात शहर में कई स्थानों पर जलसों का आयोजन किया जाएगा।
इस्लामी मान्यता के मुताबिक शब-ए-बरात की सारी रात इबादत और तिलावत का दौर चलता है। साथ ही इस रात मुस्लिम धर्मावलंबी अपने उन परिजनों, जो दुनिया से रूखसत हो चुके हैं, की मग़फिरत (मोक्ष) की दुआएं करने के लिए कब्रिस्तान भी जाते हैं। इस रात दान का भी खास महत्व बताया गया है।