Monday, 12 December 2011

81 करोड़ की मालकिन बनी बिल्ली!

यकीन करने में भले ही मुश्किल लगेए लेकिन यह सच है कि अपनी मालकिन की मौत के बाद एक बिल्ली एक करोड़ पाउंड राशि की मालकिन बन गई है। उसके मालिक ने उसे दुनिया का तीसरा सबसे धनी पालतू पशु बना दिया है।
 



समाचारों के मुताबिक मारिया असुंता ;94द्ध की पिछले महीने ही मृत्यु हुई है। उनकी संपति की देखभाल करने वाले वकीलों का कहना है कि वे अपनी सारी संपति सड़क से उठाई गई एक बिल्ली ष्तोमासिनोष् के नाम कर गई हैं। असुंता बिल्ली को अपने पशु प्रेम के कारण सड़क से उठा लाई थीं।
असुंता के पास पूरे देश में मकान और विला हैंए कई बैंक खाते हैंए लेकिन कोई जीवित रिश्तेदार नहीं है। उनका प्रतिनिधित्व कर रही वकीलों एना ओरेचिओनी और गियासिंटो कानजोना ने कहा कि अक्टूबर 2009 में लिखकर हमारे रोम कार्यालय में जमा की गई वसीयत में असुंता ने अपनी सारी संपति तोमासिनो के नाम कर दी है। ओरेचिओनी ने कहा कि इटली के कानून के मुताबिक ष्तोमासिनोष् संपति को सीधे तौर पर नहीं ले सकती है।

                                                                                                                 Gazala Khan
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Friday, 9 December 2011

इलू का मतलब

हमारे देश में आई लव यू आ गया है। अंग्रेज़ आये तब नहीं आया। उन्होंने डेढ़ सौ साल राज किया तब नहीं आया। टीवी आया तब भी नहीं आया। उसे तो सैटेलाइट चैनलों का इंतज़ार था। जैसे ही विदेशी सैटेलाइट चैनल आये, आई लव यू भी आ गया। जब तक सैटेलाइट चैनल नहीं आये थे, लगता है हमारे यहां प्रेम होता ही नहीं था। हीरो-हीरोइन के बीच में हमेशा एक पेड़ खड़ा रहता था।



कितना बड़ा हीरो हुआ दिलीप कुमार, ट्रैजेडी किंग! प्रेम की खातिर जान दे देना उसकी स्पेशलिटी थी। देवदास पारो के लिए तड़पता रहा। पारो देवदास के लिए तड़पती रही। पर, कभी आई लव यू नहीं कहा। और, राजकपूर आवारा, चार सौ बीस, जोकर! लेकिन मज़ाक में भी नरगिस से नहीं कहा, आई लव यू। हमारी संस्कृति में प्रेम व्यवहार में होता है, वाक्य में नहीं। प्रेम आचरण में होता है, संवाद में नहीं। हमारे यहां कबीर ने कहा है, ढाई आखर प्रेम का पढ़ै सो पंडित होय। कबीर ने पढ़ै कहा, बोलै नहीं। पढ़ना आचरण है, बोलना दिखावा है। और पढ़ै सो पंडित होय कहा, पढ़ै सो प्रेमी होय नहीं कहा। क्योंकि प्रेम सिर्फ भावना नहीं है, ज्ञान भी है।
पर, अब ज्ञान गायब होता जा रहा है। छोकरे छोकरी स्कूल तो जाते नहीं, स्टूडियो चले जाते हैं, हीरो हीरोइन बनने। जाते ही इलू इलू करने लगते हैं। हाईस्कूल तो पास कर नहीं पाते, लव की डिग्री पा लेते हैं आई लव यू! आज टीवी कार्यक्रमों में सबसे ज़्यादा लोकप्रिय डायलएग यही है, आई लव यू। हीरो हीरोइन से कहे तो ठीक, पर बेटा बाप से कहता है, आई लव यू। बाप बेटी से कहता है, आई लव यू। बेटी मां से कहती है, आई लव यू। अफसर सेक्रेटरी से कहता है, आई लव यू। अफसर की बीवी पड़ोसी से कहती है आई लव यू। हर प्रोग्राम आई लव यू है, हर संबंध आई लव यू है। जायज़ रिश्ता भी आई लव यू, नाजायज़ रिश्ता भी आई लव यू। प्रेम इतना मैला कभी नहीं हुआ था, जितना टीवी ने कर दिया। हमारा देश अजीब विकास कर रहा है। आर्थिक विकास में तो हांगकांग तक भी नहीं पहुंचा, मनोरंजन के विकास में सीधा अमेरिका पहुंच गया।

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आजकल, हीरो जब बगीचे में हीरोइन से मिलता है तो हलो बाद में बोलता है, पहले आई लव यू कहता है। फिर, लड़की का हाथ पकड़ लेता है। लड़की फौरन टेढ़ी हो जाती है। भुजंगासन की मुद्रा में पीठ को पीछे की ओर ऐसे मोड़ती है कि हीरो अगर पकड़े नहीं तो गिर ही पड़े। कोई कोई हीरोइन तो इतनी ज़्यादा मुड़ जाती है कि पता ही नहीं चलता वह खड़ी है या लेटी है। बगीचा बेडरूम बन जाता है।
हर फिल्म में प्रेम होता है। हीरो हीरोइन इलू इलू बोलते ही रहते हैं। एक निर्माता बोला मैं कुछ नया करूंगा। स्त्री पुरुष का प्रेम तो बहुत दिखा लिया, मैं कोई दूसरा प्रेम दिखाऊंगा। आजकल पर्यावरण की रक्षा का फैशन है। सो, उसने सोचा कुदरत का प्रेम दिखाया जाये। तो, हीरो एक नारियल के पेड़ के पास पहुंचा और बोला, आई लव यू। पेड़ ने आई लव यू का जवाब दिया। ऊपर से एक नारियल गिरा। क्या है कि कुदरत को झूठ बरदाश्त नहीं होता।
दूसरे प्रोड्यूसर ने सोचा संस्कृति का प्रेम दिखाया जाये। जबसे बीजेपी की ताकत बढ़ी है सबको संस्कृति याद आने लगी है। कुदरत का प्रतीक पेड़ है तो संस्कृति का प्रतीक हिमालय है। हीरो हिमालय पर गया। पहाड़ वीरान खड़े थे। हीरो चिल्ला कर बोला, आई लव यू। पहाड़ों पर चांदी जैसी चमकदार बर्फ जम गयी। अब हीरोइन की बारी थी। उसने अपना डायलएग नाक से बोला। हीरोइन का खयाल था कि नाक से बोलने पर उसकी आवाज़ सेक्सी हो जाती है। हिंदुस्तान में भी सेक्सी अब इज़्ज़तदार शब्द मान लिया गया है।
gazala khan
तो हीरोइन अपनी नकसुरी आवाज़ में बोली, आई लव यू। गोमुख सूखा पड़ा था, उसमें से गंगा बहने लगी। ये कम्प्यूटर भी कमाल की चीज़ है। अपने स्पेशल इफेक्ट से वह नंगे पहाड़ों पर बर्फ जमा सकता है, सूखे गोमुख से गंगा बहा सकता है। किसी भी विदेशी औरत के नंगे शरीर पर भारतीय संस्कृति का चेहरा चिपका सकता है। इस देश में आई लव यू का फैशन तो आ गया, अब आगे का न आये तो अच्छा। वरना टीवी की यह अपसंस्कृति विकृतियों की ऐसी धारा बहायेगी कि हमारा सब कुछ उसमें बह जायेगा








Wednesday, 7 December 2011

साल में कई बार आता है ‘नए साल‘ का मौका

हर बार नया साल नई खुशियां, नई उमंग, नई उम्मीदें और जश्न मनाने के तमाम नए कारण लेकर आता है लेकिन आप अपना उत्साह थोड़ा बचाकर रखियो क्योंकि भारत ही नहीं दुनिया के तमाम देशों में कई बार नए साल के मौके आते हैं। चौंकिए नहीं दुनिया भर में तमाम कैलेंडर हैं और हर कैलेंडर का नया साल अलग-अलग होता है। एक मोटे अनुमान के अनुसार अकेले भारत में ही करीब 50 कैलेंडर (पंचांग) हैं और इनमें से कई का नया साल अलग दिनों पर होता है।


एक जनवरी को मनाया जाने वाला नववर्ष दरअसल गेगोरियन कैलेंडर पर आधारित है। इसकी शुरुआत रोमन कैलेंडर से हुई है। पारंपरिक रोमन कैलेंडर का नववर्ष एक मार्च से शुरू होता है। प्रसिद्ध रोमन सम्राट जूलियस सीजर ने 47 ईसा पूर्व में इस कैलेंडर में परिवर्तन किया और इसमें जुलाई माह जोड़ा। इसके बाद उसके भतीजे के नाम के आधार पर इसमें अगस्त माह जोड़ा गया। दुनिया भर में आज जो कैलेंडर प्रचलित है उसे पोप गेगोरी अष्टम ने 1582 में तैयार किया था। ग्रेगोरी ने इसमें लीप ईयर का प्रावधान किया था। ईसाइयों का एक अन्य पंथ ईस्टर्न आर्थोडाक्स चर्च तथा इसके अनुयायी गेगोरियन कैलेंडर को मान्यता न देकर पारंपरिक रोमन कैलेंडर को ही मानते हैं। इस कैलेंडर के अनुसार नव वर्ष 14 जनवरी को मनाया जाता है। इस कैलेंडर की मान्यता के अनुसार जार्जिया, रूस, यरूशलम, सर्बिया आदि में 14 जनवरी को नववर्ष मनाया जाता है।


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इस्लाम धर्म के कैलेंडर को हिजरी साल के नाम से जाना जाता है। इसका नववर्ष मोहर्रम माह के पहले दिन होता है। मौजूदा हिजरी संवत 1430 इस साल 30 दिसंबर को शुरू हुआ था। हिजरी कैलेंडर कर्बला की लड़ाई के पहले ही निर्धारित कर लिया गया था। मोहर्रम के दसवें दिन को आशूरा के रूप में जाना जाता है। इसी दिन पैगम्बर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन बगदाद के निकट कर्बला में शहीद हुए थे। आशूरा इस बार आठ जनवरी को होगा। हिजरी कैलेंडर के बारे में एक दिलचस्प बात है कि इसमें चंद्रमा की घटती बढ़ती चाल के अनुसार दिनों का संयोजन नहीं किया गया है। लिहाजा इसके महीने हर साल करीब 10 दिन पीछे खिसकते रहते हैं। यदि पड़ोसी देश और देश की पुरानी सभ्यताओं में से एक चीन की बात करें तो वहां का भी अपना एक अलग कैलेंडर है। तकरीबन सभी पुरानी सभ्याताओं के अनुसार चीन का कैलेंडर भी चंद्र गणना पर आधारित है। इसका नया साल 21 जनवरी से 21 फरवरी के बीच पड़ता है। चीनी वर्ष के नाम 12 जानवरों के नाम पर रखे गए हैं। चीनी ज्योतिष में लोगों की राशियां भी 12 जानवरों के नाम पर होती हैं। लिहाजा यदि किसी की बंदर राशि है और नया वर्ष भी बंदर आ रहा हो तो वह साल उस व्यक्ति के लिए विशेषतौर पर भाग्यशाली माना जाता है।
भारत भी कैलेंडरों अर्थात पंचांग के मामले में कम समृद्ध नहीं है। फिलहाल देश में विक्रम संवत, शक संवत, हिजरी संवत, फसली संवत, बांग्ला संवत, बौद्ध संवत, जैन संवत, खालसा संवत, तमिल संवत, मलयालम संवत, तेलुगु संवत आदि तमाम साल प्रचलित हैं। इनमें से हर एक के अपने अलग-अलग नववर्ष होते हैं। देश में सर्वाधिक प्रचलित विक्रम संवत और शक संवत है। माना जाता है कि विक्रम संवत गुप्त सम्राट विक्रमादित्य ने उज्ज्यनी में शकों को पराजित करने की याद में शुरू किया था। यह संवत 58 ईसा पूर्व शुरू हुआ था। विक्रम संवत चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होता है। इसी समय चैत्र नवरात्र का प्रारंभ होता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन उत्तर भारत के अलावा गुड़ी पड़वा और उगादी के रूप में भारत के विभिन्न हिस्सों में नव वर्ष मनाया जाता है। सिंधी लोग इसी दिन चेटी चंद के रूप में नव वर्ष मनाते हैं। शक सवंत को शालीवाहन शक संवत के रूप में भी जाना जाता है। माना जाता है कि इसे शक सम्राट कनिष्क ने 78 ई. में शुरू किया था। स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने इसी शक संवत में मामूली फेरबदल करते हुए इसे राष्ट्रीय संवत के रूप में अपना लिया। राष्ट्रीय संवत का नव वर्ष 22 मार्च को होता है जबकि लीप ईयर में यह 21 मार्च होता है।
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                                                                                                                  Gazala khan

Thursday, 1 December 2011

बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भयंकर साजिश एड्स बना हौव्वा

Gazalakhan
visharadtimes.com

एड्स का हौव्वा और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भयंकर साजिश में उलझा चिकित्सा शास्त्र समुद्र की तरह से अगाध है इसे लाखों ‘लोकों से भी वर्णन नहीं करा जा सकता है । आप यहाँ स्पष्टतः जान लें कि यह चिकित्सा शास्त्र आयुर्वेद ही है । भारतीय संस्कृति की रंगत की पहचान इसके अनेकानेक इन्द्रधनुषी घटक हैं लेकिन इस सप्तरंगी संस्कृति के दो मुख्य संवाहक घटक हैं योग और आयुर्वेद किंतु यह एक दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि आज योग तो योगा हो गया है एवं आयुर्वेद का अर्थ है ----एक देहाती व गंवार किस्म के भारतीयों द्वारा प्रयोग करी जाने वाली एक कथित तौर पर अवैज्ञानिक वष्स्लो-एक्शनष् चिकित्सा पद्धति जो यदा-कदा सर्दी-जुकाम ठीक करने में उपयोगी हो जाती है इस कथित देहाती व गंवारू किस्म की चिकित्सा पद्धति पर तमाम स्वयंभू विकसित राष्ट्रों ने रोक लगा रखी है और कारण बताया है कि इस पद्धति के अनेकों उत्पादों में बहुत अधिक मात्रा में भारी खनिज जैसे कि पारा व संखिया आदि हैं जोकि मानव के लिए अत्यंत घातक हैं भले ही उनके द्वारा विकसित करी गयी विभिन्न एलोपैथिक ड्रग्स के विषाक्त प्रभाव जगजाहिर हों फिर भी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हमारे देश में उन ड्रग्स को बना व बेच रहीं हैं । जिस प्रकार कुछ लोगों पर धार्मिक अंधविविश्वासी होने का आरोप लगाया जाता है तो ठीक उसी प्रकार से तथाकथित ‘‘एजुकेटेड’’ लोगों पर भी वैज्ञानिक अंधविविश्वासी होने का आरोप हो सकता है क्योंकि अभी तक कोई भी दावे से यह नहीं कह सकता है कि समस्त वैज्ञानिक मान्यताएं पूर्णतरू सत्य हैं क्योंकि जब लेखक एक छात्र था उस समय तक वैज्ञानिक सत्य यह था कि परमाणु उसके तीन मूलकणों से बना है जो कि इलैक्ट्रॉन प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन हैं व इनमें से प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन परमाणु के नाभिक में रहते हैं और इलैक्ट्रॉन अपनी निश्चित कक्षाओं में चक्कर लगाते रहते हैं । कहा जाता रहा था कि सभी मूलकणों को तोड़ा नहीं जा सकता है यानि ये कण अविभाज्य हैं तथा समस्त प्रकृति के पदार्थ का निर्माण इनसे ही हुआ है तथा पदार्थ का ऊर्जा के रूप में परिवर्तन एक निश्चित समीकरण के आधार पर होता है जो कि हम आइंस्टीन समीकरण’ के रूप में जानते थे किंतु आज कहा जाता है कि अब विज्ञान उन्नति कर चुका है अतरू पूर्वकथित धारणाएं निर्मूल हैं अब नयी धारणाएं आ गयी हैं जिनके आधार पर कहा जा रहा है कि वस्तुतः सृष्टि में पदार्थ का कोई अस्तित्व नहीं है जो कुछ भी है वह ऊर्जा ही है और सृष्टि का निर्माण कणों से नहीं हुआ दरअसल वे बहुआयामी ऊर्जा-तंत्रियाँ यानि एनर्जी-स्ट्रिन्ग्स हैं जिनके भिन्न-भिन्न स्पंदनों से भिन्न- भिन्न कणों की उत्पत्ति होती है जिनको कि क्वाक्र्स कहते हैं तथा अब मूलकणों की संख्या भी तीन नहीं रह गई है बल्कि फोटॉन,पॉजिट्रॉन,बोसॉन,मेसॉन,पाई- मेसॉन तथा ग्रेविटॉन आदि-आदि। इन सबके बावजूद कथित विज्ञान से सृष्टि के अनेकानेक रहस्य सुलझाए नहीं सुलझते हैं । कदाचित पाठकजनों को प्रतीत हो रहा होगा कि लेख की विषयवस्तु भटक गई है किंतु विद्वजन ऐसा न सोचें,यह सारा शब्द प्रपंच लेखक ने इसलिए करा है ताकि लोग यह न समझ लें कि आयुर्वेद पढ़ने वाले नितान्त ही चटनी-चूरन छाप होते हैं दरअसल ये कुछ और नहीं बल्कि आयुर्वेद के पदार्थ विज्ञान का ही अंश है । ठीक से समझ लीजिए कि आयुर्वेद मात्र चिकित्सा पद्धति नहीं अपितु समस्त सृष्टि का विज्ञान है जिसे कि हम एक ‘‘यूनिफाइड साइंस’’ के रूप में जान सकते हैं और जीवन से संबंध रखने वाली हर जिज्ञासा का समाधान पा सकते हैं। ज्ञानीजनों अब मैं मूल विषय पर आता हूँ जो कि स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शास्त्र से संबंधित है । जैसा कि आपको बताया जाता है कि मानव जाति पर ‘‘एड्स’’ का कैसा भयानक खतरा मंडरा रहा है कि यदि समय रहते ही कोई सही मार्ग न निकाला गया तो कदाचित यह रोग एक दिन मानव जाति का समूल नाश कर दे । अतरू अब आवश्यक है कि इस विषय पर अत्यंत ही गहन चर्चा करी जाए कि आप इसके बारे में क्या और कितना जानते हैं तो पाठकों आप सब ‘एड्स क्या व हेपेटायटिस-बी’ क्या?सभी के बारे में उतना ही जानते हैं जो कि आपको विभिन्न समाचार-पत्रों व मैग्जीन्स के द्वारा बताया जाता है और फिर कुछ बातें जिनका न सिर होता है न ही पैर बार-बार विज्ञापन शैली में दोहरा कर आपके दिमाग में ठूँस दी जाती हैं तथा आप इस पूरी बकवास को जिस पर कि वैज्ञानिक शोध की फर्जी मुहर भी लगी होती है तथ्य मान कर स्वीकार कर लेते हैं और आपकी मानसिकता अनुकूल हो जाती है इनके और यहाँ इन दुष्टों को लाभ होता है आयुर्वेद निदान यानि डायग्नोसिस के मानस घटक ष्प्रज्ञापराधष् का और इसके बाद शुरू होता है किसी बहुराष्ट्रीयकंपनी के द्वारा दवा बाजार में लंबे शोध एवं अनुसंधान के बाद उक्त बीमारी की दवा को बड़े ही सस्ते दाम में लानेका नाटक । विभिन्न समाचार-पत्रों व मैग्जीन्स को तो एक सनसनीखेज विषय मिल जाता है ही प्रकाशन हेतु और सैकड़ो-हजारों की संख्या में गैर-सरकारी संगठन बरसात में उगे कुकुरमुत्तों की तरह प्रकट हो जाते हैं बीमारी से बचाव और जागरूकता देने के कार्यक्रमों में सरकारी मशीनरी का हाथ बंटाने के लिए। जबकि सच तो यह रहता है कि इन स्वयंभू संगठनों के पास उनके अपने कोई शोधात्मक तथ्य और अनुसंधान तो होते नहीं हैं फिर ये इतने दावे के साथ कैसे बातों को पेश करते हैं ,दरअसल होता यह है कि ये बस बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दिए हुए बेसिर-पैरकी बातों को बार-बार दोहराते रहते हैं कि अमेरिका की अमुक-अमुक शोध संस्था के वैज्ञानिकों के दल ने अपने लंबे अनुसंधान के बाद फलाँ-फलाँ जानकारियाँ प्रस्तुत करीं हैं । यह सम्पूर्ण लेख बिना किसी व्यक्तिगत दुर्भाव के है अतरू विद्वान पाठक जन इन बातों को अनर्गल शब्दप्रहार न मानें क्योंकि सच जानकर भी यदि उसे समाज में न बताया जाए तो यह एक जघन्य अपराध होगा । इसलिए जिज्ञासुजनों जान लीजिए कि कथित महाभयावह रोग ष्एड्सष्और एच.आइ.वी. का पॉजिटिव परिणाम आने का आपस में सत्यतरू कोई संबंध होने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है यह रॉबर्ट गैलो नामक एक ऐसे वैज्ञानिक का विचार मात्र है जो कि एक प्रसिद्धि के भूखे के रूप में जाना जाता रहा है । पहले यही व्यक्ति कैंसर के क्षेत्र में कार्य कर रहा था किंतु जब एड्स का नाम शोध के क्षेत्र में आया तो इसने तुरंत पाला बदल लिया और यह घोषणा कर दी कि उसने रहस्यमय बीमारी एड्स का संभावित कारण ढूँढ लिया है जो कि एक विषाणु है जिसे एच.आइ.वी. का नाम दिया गया जबकि आज तक कथित एच.आइ.वी. का अस्तित्त्व आज तक संदिग्ध ही है तो विद्वजनों अब हम एक ऐसे झूठ की पोल खोलते हैं जिस पर एक विशेष लॉबी ने वैज्ञानिकता की मुहर लगा रखी है ----
बहुप्रचारित महाभयावह रोग ‘एड्स’ की जाँच का प्राथमिक टेस्ट है ‘‘एलिसा’’ जोकि आपको बताता है कि अब आप यमपाश में जकड़े जा चुके हैं और यह पाश शनैरू-शनैरू कस जाएगा और आप तड़प-तड़प कर मर जाएंगे फिर इसके बाद करा जाता है एक और परीक्षण - वेस्टर्न ब्लॉट, जो कि निश्चितीकरण के लिए है कि आप जिस पाश में जकड़े हैं वह यमराज का पाश ही है या बस एक साधारण सी रस्सी है तो क्या हमारे विद्वान पाठक यह नहीं समझ सकते कि पहले करे गए परीक्षण की विश्वसनीयता कितने पानी में है । अब जरा आप लोग इस परीक्षण के अंत में लिखी जाने वाली अत्यंत धूर्तता भरी भाषा ,जिसमें हिन्दी प्रयोग नहीं करी जाती बल्कि अंग्रेजी का प्रयोग करा जाता है जिससे कि हम देहाती तथा गंवारू आयुर्वेद को मानने वाले तो कदाचित इस शाब्दिक जंजाल में ही उलझ कर चुप हो जाएं ,लिखा होता है और इस भाषा को जानने वाले विद्वान इसे पढ़ कर भली प्रकार से समझ सकते हैं कि इस परीक्षण का कितना औचित्य है ।वस्तुतरू ये परीक्षण किसी वायरस की जाँच नहीं करता अपितु प्रोटीन तथा एंटीबॉडीकी आपसी क्रिया का पता लगाते हैं जिसे कि रॉबर्टगैलो और उसके ही जैसे लोग जरूरी मानते हैं। अब ये लोग कहते हें कि एड्स के विषाणु की जाँच का कार्य अत्यंत ही जटिल है क्योंकि जब ये कथित एच.आइ.वी.देह मे प्रवेश करता है तो रक्त में तीन माह बाद ही एंटीबॉडी बनना शुरू होते हैं अब यही लोग कहने लगे हैं कि कभी-कभी तो किन्हीं विशेष परिस्थितियों में कुछ लोगों में कई वर्ष तक एंटीबॉडीज नहीं बनते किंतु ये स्थिति संक्रमित जन के लिए अधिक घातक होती है। इनकी जमात ने तो एड्स विषाणु की संरचना के बारे में भी बताया है कि वह कैसा दिखता है ,इनके अनुसार यह विषाणुएक गोलक आकृति का होता है जिसका व्यास एक मिलीमीटर का हजारवाँ हिस्सा होता है जो दो लिपिड झिल्लियों से घिरा होता है इस झिल्ली में दो प्रकार के ग्लाइकोप्रोटीन - जी.पी.41 तथा जी.पी.120 के स्तर हैं, जिसमें झिल्ली से ढके दो प्रोटीन स्तर हैं - पी.18 तथा पी.24 । अब देखिए कि इन लोगों का आगे क्या वक्तव्य है ये कहते हैं कि प्रायरू एड्स विषाणु की रचना हमेशा ही एक जैसी नहीं रहती है विभिन्न लोगों में इनकी विभिन्न जातियाँ पायी जाती हैं जो कि परिवर्तनशील भीहोती हैं इसी कारण इसका प्रभावी वैक्सीन बन पाना एक समस्या है । यहाँ हम जरा सी भी तार्किकता की बात करें तो इस सारी बकवास की पोल खुल जाती है जैसे कि आपको पता हो कि किसी भी अपराध के लिए दोषी व्यक्ति कोपहचान लिया गया है और पुलिस को आप उसकी पहचान बताएं कि उसका नाम डॉ. रूपेश श्रीवास्तव है और हत्या के समय वह 6फुट लंबा गोरा और पतला था किंतु जब उसने बलात्कार करा तो 5फुट 6इंच लंबा साँवला मोटा था और जब वह लूटपाट कर रहा था तब वह 4फुट व 11इंच का एक ठिगना सा काला व्यक्ति था तो इस सब विवरणके देने पर पुलिस आपका क्या करेगी यह बताने की कदाचित आवश्यकता नहीं है । ये बातें न तो तर्कसंगत हैं न हीविज्ञान की भाषा में कही हुई क्योंकि विज्ञान की भाषा ठोस होती है न कि संभावना पर आधारित जैसे कि आपसे यह कहा जाए कि यदि हम पानी व शर्करा को मिश्रित करें तो शर्बत बनता है जिसे कि तापान्तर से हल्का-गाढ़ा करा जा सकता है यह है शर्बत का विज्ञान, यहाँ हम यह नहीं कहते हैं कि शर्बत बन सकता है या फिर शर्बत बनने की संभावना है । क्या आपने आज तक कहीं यह पढ़ा है कि ऐसा-ऐसा करने से एड्स हो ही जाता है तो क्या ये सब अंधेरे में चलाए जा रहे तीर नहीं हैं तो क्या है । यदि एलिसा में परिणाम पॉजिटिव है तो कोई भी माई का लाल आगे के परीक्षण वेस्टर्न ब्लॉट को आपके विरोध में आने से नहीं रोक सकता है क्योंकि इसे तो और अधिक संवेदनशील डिजाइन करा गया है। वस्तुतरू एच.आइ.वी. का कोई भी परीक्षण पूरी तरह से विश्वसनीय नहीं है क्योंकि ऐसे बहुत से अन्य विषाणु , जीवाणु एवं दूसरे एंटीजेन अथवा एंटीबॉडी जेनेरेटिंग हैं जिनके अस्तित्त्व में होने के कारण जीवित देह की प्रतिरक्षा प्रणाली या इम्यून सिस्टम एंटीबॉडीज़ बना देता है जोकि एच.आइ.वी.का परिणाम पॉजिटिव ला देता है । सच तो यह है कि उन एंटीबॉडीज़ और पुराने विषाणुओं के अवशेष शरीर में बरसों बरस या आजीवन पाए जा सकते हैं जो कि ‘‘फाल्स पॉजिटिव’’ परिणाम ला देते हैं जिनके आधार पर यह तो हरगिज नहीं कहा जा सकता है कि रोगी संक्रमण से ग्रस्त है । जैसा कि सुविज्ञ पाठक जानते हैं कि कम्प्यूटर-वायरस के बारे में कि ये मात्र दुष्टता वश बनाए हुए प्रोग्राम रहते हैं जो कि आपके सामान्य अनुदेशों पर अवांछनीय परिणाम लाकर आपको परेशान कर देते हैं,ये प्रोग्राम या वायरस कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर के साधारण जानकारों द्वारा सरलता से नहीं बनाए जा सकते हैं क्योंकि इनके लिए अत्यधिक बौद्धिक ऊर्जा,ज्ञान तथा श्रम की आवश्यकता होती है ठीक उसीप्रकार पैथोलॉजी के कुटिल जानकारों ने इस तरह के परीक्षणों को बनाया है और हमारे जैसे विकासशील देशों में इन परीक्षणों को डिजाइन करके आतंक उपजा कर चाँदी काट रहे हैं ।आप जरा यह देखिए कि यदि आप कभी इन समस्याओं से गुजर चुके हैं तो आपकी देह की मूल प्रकृति के आधार पर आपका परिणाम पॉजिटिव आ सकता है-- फ्लू ,हर्पीज़ ,हेपेटायटिस ,टी.बी. ,लीवर के विकार ,फीताकृमि तथा पेट में पलने वाले अनेक कीड़े व गंभीर प्रकार का मलेरिया आदि-आदि और न जाने क्या कुछ जिन पर अभी इनकी पोल नहीं खुली है । मेरे अपने अनुभव में भी कई बार आया है कि परिणाम पॉजिटिव आने के बाद भी लोगों को दीर्घायु पाया है । क्या आपने विभिन्न संगठनों के उन कार्यकर्ताओं को जो कि स्वयं एच.आइ. वी.पॉजिटिव हैं तथा एड्स जागरूकता के लिए कार्य कर रहे हैं उन्हें तड़प-तड़प कर मरते देखा है, नहींरूवे तो हकीकत को जानते हैं और मजे कर रहे होते हैं अपने भोलेपन से आपको आतंकित करके । शराबियों में हेपेटायटिस बी. के टीके के बाद व्यक्ति के शरीर की प्रकृति के आधार पर परिणाम पॉजिटिव आना तो बहुत ही संभव हो जाता है । अतः कुल मिला कर एक ही तथ्य सामने आता है कि यदि बारंबार जाँच में भी परिणाम पॉजिटिव आए तो यह ये प्रमाणित नहीं करता कि वायरल इंफेक्शन है। क्या कोई भी पैथोलॉजी का बड़े से बड़ा जानकार सीना ठोंक कर मेरी इस बात का विरोध कर सकता है कि किसी स्वस्थ शरीर में किसी भी विशेष एंटीबॉडी का होना किसी रूग्णता का परिचायक नहीं है अपितु स्वस्थ शरीर की एक नैसर्गिक प्रतिक्रिया है व इसे स्वस्थ शरीर की उपस्थित रोगों से लड़ पाने का नैसर्गिक प्रतिरोध -क्षम होने का सूचक माना जाता था किंतु जैसे ही रॉबर्ट गैलो ने यह कहा कि मैंने एड्स का संभावित कारण तलाश कर लिया है जो कि एच.आइ.वी. है तब अचानक ही पैथोलॉजी के सारे नियम बदल गए । इस पूरे लेख का आशय है आपको आश्वस्त करना है कि यदि परिणाम पॉजिटिव आए तो भी रंचमात्र भयभीत न हों अपितु आयुर्वेद को अपना कर स्वयं को स्वस्थ बनाए रखें । किंतु यह साजिश भली प्रकार से सोच समझ कर बनायी गयी है तो फिर आपसे सी.डी.-4 जाँच के लिए कहा जाता है कि यदि आप इस परीक्षण में एक निर्धारित सीमा से आगे हैं तो चिंता की बात नहीं है और आप खतरे से बाहर हैं किंतु फिर भी आपको ष्ष्कैमोथैरेपीष्ष्के घातक व विषैले उपचारों को अपना लेना चाहिए ।बात यहाँ ही समाप्त नहीं हो जाती है इसके बाद आपका इंतजार कर रहा होता है पी.सी.आर. नामक परीक्षण जिसे कि डी.एन.ए. का आधार ले कर बनाया गया है जोकि ष्ष्वायरल लोडष्ष् की बेतुकी धारणा को जाँचने के लिए करा जाता है । कुल मिला कर ये बात सामने आती है कि ये सब रक्त पिपासु पिशाच आपका खून पीते ही रहते हैं कभी मच्छर कभी खटमल कभी जोंक और कभी डॉक्टर बन कर अतरू इनसे बच कर रहें और सनातन आयुर्वेद को अपनाए रहें । यदि आप जानते है कि देह में कहाँ क्या अप्राकृत है तो आप उसे जाँचने के लिए एक नहीं विज्ञान का प्रयोग करके हजार टेस्ट बनासकते हैं अब यदि आप जानना ही चाहते हैं तो जान लीजिए कि इन दुष्टों की इस श्रंखला में एक और नया टेस्ट जुड़ गया है जिसे कि संयुक्त राज्य अमेरिका की संस्था फेडरल सेंटर्स फॉर डिज़ीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ने ओरामोर विधि के तहत विकसित करा है ,यह एक विशेष पैड है जोकि थूक से पता करेगा कि अमुक रोगी एड्स से ग्रस्त है और यह जाँच तो तब ही संभव हो सकती है जबकि थूक व लार भी विषाणु के संक्रमण के प्रभाव के दायरे में हो जबकि अभी तक तो इन दुष्टों के द्वारा कहा जाता था कि मुँह में जख्म न होने की स्थिति में अधर चुम्बन सुरक्षित है उससे एच.आइ. वी.का संक्रमण नहीं होता है और ये संस्कृति द्रोही इसी संदर्भ में मुखमैथुन की भी वकालत करते हैं किंतु इन्ही के दिए तथ्य से यह भी सिद्ध होता है कि अधर चुम्बन तथा मुखमैथुन सुरक्षित नहीं है। तथ्यों मे रोज सुबह शाम यह फेरबदल इसलिए हो जाती है कि गरीब राष्ट्रों मे लूट खसोट के लिए क्या उपाय अधिक कारगर सिद्ध होगा यह स्पष्ट नहीं हो पाया है इसलिए चित भी उनकी और पट भी उनकी । कुछ समय पहले तक कहा जारहा था कि एच.आइ.वी. ग्रस्त दम्पत्ति गर्भ के बारे में तो सोचें भी नहीं और इस बात पर इन लोगों ने लाखों गर्भपात करे फिर अचानक एक दिन पुनः इनके लिए विज्ञान के नियम बदल गए तथा जगह-जगह प्रचार दिखने लगा कि कोई जरूरी नहीं कि एच.आइ.वी. ग्रस्त दम्पत्ति से उनकी संतान को भी संक्रमण हो ,संक्रमण-ग्रस्त माता पिता से संतति में भी संक्रमण का आ जाने का मात्र 30ऽ खतरा रहता है जोकि ए.जेड.टी. नामक एलोपैथी की कथित जादू भरी दवा के खा लेने से मात्र 1ऽ रह जाताहै । ऐसा नहीं है कि यह कथित जादू भरी दवा आज ही खोज ली गयी हो लेकिन क्या करा जाए तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ इसका उत्पादन करके भारत पाकिस्तान बांग्लादेश जैसे विकासशील देशों में खपाने के लिए बाजार बनाए बैठी हैं इसलिए कहीं इतनी मेहनत करके जो बाजार बनाए गए हैं खो न जाएं इसलिए कुछ न कुछ तो इस प्रकार की उछलकूद तो करते रहना जरूरी हो ही जाता है जब हम यह जान लें कि किसी व्यक्ति में यदि कफ के कोप के कारण कोई व्याधि उत्पंन हो गयी है तो आप आयुर्वेद के निदान के अनुसार किसी भी तरीके से यह जान सकते हैं किकफ के साथ और कौन से दोष कुपित हैं और व्यक्ति-दोष-काल के अनुसार क्या-क्या आवरण हो सकते हैं जिससे कि क्या उपद्रव हो सकते हैं जिन्हें कि हम किन रोगों का नाम दे सकते हैं इसके लिए हमें विभिन्न पैथोलॉजिकल टैस्टों की श्रंखला को खड़ा करने की कोई जरूरत नहीं है लेकिन यह तभी संभव हो सकेगा जबकि आयुर्वेद के निदान को भली प्रकार से जान लिया जाए। आज जबकि हर ओर आयुर्वेद और योग की दुंदुभि बजना प्रारंभ हो गई है तो न सिर्फ औषधियाँ अपितु निदान भी आयुर्वेद का ही हो तब ही रोगों का समूल नाश संभव है जबकि निदानऐलोपैथी का हो व उपचार आयुर्वेद का तो ऐसे में रोगी मात्र चूहे या खरगोश की तरह प्रायोगिक जंतु बन कर रह जाता है । अतरू यदि आयुर्वेद के निदान का गहन अध्ययन चिकित्सक के पास है तो किसी रोग को समझने के लिए हमें किसी परीक्षण की आवश्यकता नहीं है जैसा कि भगवान चरक ने कहा है कि आयु संबंधी ज्ञान की कोई सीमा नहीं है ,सम्पूर्ण संसार बुद्धिमानों के लिए गुरू है और मूर्खों के लिए शत्रु है अतः जो वाक्य यशप्रद है आयुप्रद है और धन्य है उसे चाहे वह किसी शत्रु का भी क्यों ना हो ग्रहण कर लेना चाहिए । भगवान चरक ने यह भी कहा है किष्ष्यदी हास्ति तदेवास्ति यन्नेहास्ति न् तत्क्वचित्श्श् अर्थात जो यहाँ कह दिया गया है वही अन्यत्र होगा जो यहाँ नहीं कहा है वह कहीं भी नहीं होगा । विद्वजनों आज मैं पुनरू आपके समक्ष एकबार आयुर्वेद के उस गौरवशाली अतीत की बात को दोहराता हूँ जो कि भगवान चरक ने कहा था कि लाभकारी चिकित्सा के बस निम्न भेद ही हो सकते हैं----
1 हेतु विपरीत औषधि
2 हेतु विपरीत अन्न
3 हेतु विपरीत विहार
4 व्याधि विपरीत औषधि
5 व्याधि विपरीत अन्न
6 व्याधि विपरीत विहार
7 हेतु व्याधि के विपरीत औषधि
8 हेतु व्याधि के विपरीत अन्न
9 हेतु व्याधि के विपरीत विहार
10 हेतु के विपरीत औषधि तथा अन्न
11 व्याधि के विपरीत औषधि तथा अन्न
12 हेतु व्याधि के विपरीत औषधि तथा अन्न
13 हेतु के विपरीत अन्न तथा विहार
14 व्याधि के विपरीत अन्न तथा विहार
15 हेतु व्याधि के विपरीत विहार तथा अन्न
16 हेतु के विपरीत औषधि तथा विहार
17 व्याधि के विपरीत औषधि तथा विहार
18 व्याधि और हेतु के विपरीत औषधि तथा विहार
19 हेतु के विपरीत औषधि अन्न तथा विहार
20 व्याधि के विपरीत औषधि अन्न तथा विहार
21 हेतु व्याधि के विपरीत औषधि अन्न तथा विहार
कदाचित पाठकजनों को यह सब पढ़ कर उबासी आने लगी होगी कि ये क्या बताया जा रहा है किंतु विद्वजनों यह है आयुर्वेद द्वारा बताया गया वह ज्ञान जोकि एक सीमारेखा बना देता है कि संसार की समस्त चिकित्सा पद्धतियों पर कि वे कुछ भी राग अलापें किंतु इससे आगे नहीं हो सकती हैं यदि ऐलोपैथी का कोई विद्वान चाहे तो इस विषय पर सादर शास्त्रार्थ के लिए आमंत्रित है जो कि आयुर्वेद को अभी भी ओझागिरी ही मानते हैं । मैंने यह इस लिए लिखा है कि लोग आयुर्वेद की महत्ता को समझ सकें व स्वीकार लें साथ ही साथ आपको ऐसे लोगों से भी सावधान करता हूँ जोकि मुर्दे के कफन में से भी अपना मुँह पोंछने का रूमाल निकालने के चक्कर में रहते हैं वे ये लोग हैं जोकि कौड़ी भर की आयुर्वेद की अक्ल भले न रखते हों किंतु हेल्पलाइन बना कर फोन से या मैग्जीन्स में लोगों की स्वास्थ्य समस्याएं सुलझाते रहते हैं या फिर पत्र-पत्रिकाओं में विज्ञापन शैली में ऐसे लेख लिखते हैं कि हमने तो एड्स के सैकड़ों मरीज ठीक करे हैं और ऐसे स्वनाम धन्य जनों से जब इनकी दवा की फार्मेकोलॉजी आदि की जानकारी मांगी जाए तो ये साफ कन्नी काट जाते हैं लेकिन दुरूख तो इस बात का कि मासिक पत्र-पत्रिकाओं के संपादक इस संबंध में दरकिनार रहते हैं कि आवश्यक नहीं है कि संपादक की लेखक के मतों या तर्कों के साथ सहमति हो । इस तरह के लोग रोगी से एक माह की दवा का दो हजार से दस हजार रूपया तक झटक लेते हैं इस तर्ज पर कि जितना गुड़ डालो उतना ही मीठा होगा और फिर कम से कम साल-छह माह तो दवा यथेष्ट परिणामों के लिए लेना ही होगा ऐसे में सोचिए कि यदि हजारों मरीजों में से कुछ सौ मरीजों ने ही बस एकबार ही इनकी दवा ली तो भी ये लोग लाखों की चाँदी काट लेते हैं और कानून के शिकंजे में ये दुष्ट इसलिए नहीं आ पाते क्योंकि मरीज तो अपनी समस्या से जूझ रहा होता है ऐसे में उसे या उसके परिवारीजनो को कहाँ होश रहता है कि वे कानूनी कबड्डी खेलें । ऐसे में पत्र-पत्रिकाओं के संपादको का नैतिक उत्तरदायित्त्व बनता है कि वे स्वयं पाठकों को सजग करें न कि ऐसे लेखकों को मात्र पत्रिका में जगह भरने के लिए स्थान दें । यदि आप ऐसे लेखों को ध्यान से पढ़ें तो आप खुद ही समझ जाएंगे कि जो लेखक बड़ी-बड़ी बातें कर रहा है उसने जीवन में कभी किसी एड्स के रोगी को कदाचित देखा तक नहीं है ,किसी प्रयोगशाला का मुँह भी देखा है या बस यूँ ही आयुर्वेद का गाना गाकर दवाएं बना रहा है । आदरणीय पाठकों मैं आपके समक्ष कुछ बातें और रखना चाहूँगा कि यह मात्र यौन संक्रामक रोग नहीं है लेकिन फिर भी हमारे देश और अन्य विकासशील देशों को इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपनी एंटी-रेट्रो वायरल दवाओं की प्रयोगशाला और कंडोम का बाजार तो बनाना ही था इसलिए यह प्रचार पूरी ताकत से करा गया है । कहा जाता है कि यह रोग आपको किसी कीटदंश या मच्छर के काटने से नहीं होता है तो मित्रों एक तर्क आपके सामने बिना इस संकोच के रख रहा हूँ कि आप कदाचित मूर्ख कहेंगे तो भी मैं ऐसा करने का दुरूसाहस करना मैं अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानता हूँ जैसा कि तमामोतमाम विज्ञान संबंधी लेखन करने वाले मेरे बंधु-भगिनी गण विवादों पड़ कर अपने लेखन पर प्रश्नचिन्ह लगने से बचने के लिए नहीं ही करते और कोई भी इन धूर्तों की धूर्तता का विरोध नहीं करता है यदि जानते भी हैं तो चुपचाप सह जाते हैं । मैं नहीं सहन कर सकता इसलिए विरोध कर रहा हूँ भले ही कुछ भी परिणाम हो । जो नशेड़ी समूह में एक ही सिरिंज का उपयोग करते हैं यदि उनमें से कोई एक भी एड्स का रोगी है तो शेष लोगों का तो भगवान ही मालिक है उन्हें एड्स रोगी होने से कोई नहीं बचा सकता है क्योंकि सिरिंज पर तो इनका कथित बृहृास्त्र भी नहीं चढ़ाया जा सकता है और यदि मैं इस विषय पर कहूँ कि सिरिंज का आकार तीन मिलीमीटर के आसपास कर दिया जाए और उस सिरिंज के पंख निकल आएं तो फिर यहाँ पर विज्ञान के नियम ही बदल जाते हैं ये लोग कहते हैं कि कथित वायरस मच्छर की तेज पाचन क्षमता का सामना नहीं कर पाता और खंडित हो जाता है किंतु इसी लॉबी के नामचीन टी.वी. चैनल ‘‘डिस्कवरी’’ के मच्छरों से संबंधित एक कार्यक्रम में कहा गया कि मच्छरों के काटने से एक करोड़ में से किसी एक आदमी को एड्स का संक्रमण होने की संभावना होती है तो इस हिसाब से हमारे देश की जनसंख्या के आधार पर अनुमानतरू सौ से अधिक निर्दाेष तो मात्र इसी तरह से संक्रमित हुए होंगे और न जाने कितनों को लैंगिक संबंधों से इन लोगों ने संक्रमित किया होगा । मेरे एक परिचित विद्वान चिकित्सक मित्र ने कहा कि मच्छर रक्त की इतनी कम मात्रा के संपर्क में आता है कि ये खतरा नगण्य रहता है किंतु उनके पास इस बात का कोई उत्तर नहीं है कि यह तथ्य मलेरिया,फाइलेरिया,चिकन गुनिया आदि-आदि पर क्यों लागू नहीं होता जबकि वहाँ भी संक्रमण विषाणुओं,परजीवियों आदि से ही होता है । क्या ये सारी बातें आपलोगों के गले से नीचे उतर पाती हैं या किंचित भी तर्कसंगत हैं। आज से कुछ समय पूर्व इनका ‘‘निजी विज्ञान’’ यह समझाते नहीं थक रहा था कि जिनकी रक्त की जाँच में रोगी दुर्भाग्य से एच.आई.वी. पॉजिटिव पाए गए हैं वे अभागे गर्भधारणा के बारे में तो सोचें भी नहीं किंतु अब इस खेमे से पूर्वनियोजित पाखंड के तहत इन लोगों ने सुगबुगाहट सी शुरू कर दी है और प्रचार भी करना प्रारंभ कर दिया है कि कोई जरूरी नहीं कि एच.आई. वी.पॉजिटिव/एड्स ग्रस्त दंपत्ति से उनकी संतान में भी संक्रमण हो क्योंकि इनकी विज्ञान संबंधी धारणा बदल गयी है ,नहीं ऐसा नहीं है कि कोई जादू भरी दवा खोज ली गयी हो जो कि ऐसा संभव करेगी । जाहिर सी बात है कि यह दवा हमारे जैसे जाहिलों के देश में तो खोजी ही नहीं जा सकती है और वह है ए.जेड टी.नाम की एक वो दवा जो कि वर्षों से विवाद में रही है अपने विषाक्त पश्चप्रभावों के कारण । मित्रों अब ये दुष्ट फिर वही करना चाहते हैं जो कि ये हमेशा करते आए हैं कि धीरे-धीरे माहौल बना कर एक दिन बहुत ही मँहगे दामों पर कोई दवा पेश कर दी जाएगी जोकि आपको पुनः स्वच्छंद जीवन जीने तथा मनचाहा भोग-विलास करने हेतु स्वतंत्रता प्रदान कर देगी लेकिन बस ‘‘एक गोली रोजाना’’,जैसे कि इन लोगों ने डायबिटीज,ब्लड प्रेशर,अस्थमा आदि के लिए कर लिया है फिर धीरे-धीरे विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुदान व सहायता से वह दवा सस्ते दामोंमें मिलने लगेगी और हमारे नेता- गण इसका श्रेय लेते हुए अपनी ही पीठ थपथपाते नहीं थकेंगे और बेचारगी भरी जनता इसी में खुश हो जाएगी कि चलो अमुक सरकार ने उक्त दवा सस्ते में उपलब्ध कराने का मार्ग बना दिया जबकि होता यह है कि हमारा देश उस दवा का हमेशा हमेशा का ग्राहक बन जाता है। आदरणीय जनों आयुर्वेद के अनुसार देह में जब भी कुछ कष्टप्रद होता है तो उसका अवश्यमेव एक उचित स्पष्टीकरण होता है न कि ऐलोपैथी की तरह जीवाणुओं, विषाणुओं या कीटाणुओं के सिर पर उस रोग के कारण का ठीकरा फोड़ दिया जाए इसलिए आदरणीय पाठकों अब आपके सामने लाया जाता है आयुर्वेद के निदान और उपचार का मंत्र जो कि इस आलेख का आशय है----
यहाँ हम एकदम सरल शब्दों में कहें तो आयुर्वेद की जरा सी भी समझ रखने वाले लोग जानते हैं कि यदि कफ-पित्त-वात साम्यावस्था में हैं तो आप स्वस्थ हैं अन्यथा अस्वस्थ । अब आगे के लेख को आप मात्र मनोरंजन के लिए न पढ़ें अपितु यह जानें कि लेखक आपको इतने बड़े लेख में क्या समझाने का जतन कर रहा है अतः विशेष ध्यान दीजिए ,आयुर्वेद में वात के पाँच भेद कहे गए हैं जोकि क्रमशः 1. प्राण 2.उदान 3.समान 4.व्यान 5.अपान हैं जिनके कि निज स्थान ,कर्म व रोग हैं और इनमें ही प्रत्येक में अंतर्भावित हैं और पाँच भेद जो कि क्रमशरू नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त तथा धनंजय हैं । चरक हों या शारंगधर सबने वात के अस्सी विकार बताए हैं किंतु साथ ही चरक सूत्रस्थान में यह भी स्पष्ट लिखा है कि सत्य तो यह है कि शरीर में जितने भी विकार होते हैं उन सबकी उत्पत्ति का कारण वात ही है क्योंकि कफ व पित्त को पंगु माना गया है और इन दोषों की गति वात से ही होती है ,रोग शाखा में हो या कोष्ठ में अथवा मर्म में ,किसी मार्ग में हुआ हो या सर्वांग में किंवा एकांग में ,ऊध्र्व में हो या अधरू में या फिर तिर्यक में ,पित्त से हो या कफ से अथवा पुरीषादि मल या विषम किंवा दूषित हुए रसादि धातुओं में से किसी के कारण हो -- सबका चरम मूल तो वायु ही है। इसका कारण यह है कि वायु का एक प्रमुख कर्म है ------- ‘‘समो मोक्षो गतिमताम् ’’अर्थात जितने भी मल हैं उनको अपने अपने बहिमुर्ख छिद्र से बाहर निकालते रहकर उनका साम्य बनाए रखना । जब वायु कुपित होता है तो सम्यक संशोधन न होने से देह में उसकी वृद्धि किंवा ह्यास व प्रकोप होकर तज्जनित रोग होते हैं जैसे कि वायु कुपित हो और उसका रूक्ष गुण अधिक वृद्धि को प्राप्त हो तो पित्त प्रसेक में याकृत पित्त शुष्कता को प्राप्त होकर तीव्र शूल पैदा होता है जिसे कि आधुनिक निदान में ठपसपंतल बवसपब कहते हैं । पुरीष की शुष्कता से इसी प्रकार का विबन्ध पैदा होता है । प्राणवह स्रोत में यदि कफ शुष्क हो जाए तो कास-श्वासादि उत्पन्न हो जाते हैं रूक्ष गुण स्रोतों में पैदा हो जाए तो उनकी स्निग्धता नष्ट हो जाती है व स्थिति स्थापकता न्यून होकर वे भंगुर हो जाती हैं और जरा सा भी दबाव सहन नहीं कर पाती हैं व टूट जाती हैं तथा तत्तत रोग होते हैं जिनका कि वायु के प्रकोप से कोई संबंध ही नहीं प्रतीत होता है । इसी प्रकार से पक्षाघात का कारण मस्तिष्क की केशिकाओं का रक्त के वेगाधिक्य के कारण टूट जाना कहा जाता है किंतु इसका मूल कारण तो वात कोप से उत्पंन भंगुरता ही है । इन कथनों का आशय प्रबुद्ध पाठकों को यह बताना है कि यदि बीमारी का मूल कारण समझ लें तो फिर उसे जय कर पाना आसान हो जाता है किंतु यदि हमें कारण का ही पता नहीं है तो फिर कैसा उपचार और कैसा स्वास्थ्य? एच.आई.वी. पॉजिटिव रोगियों का गहन नैदानिक परीक्षण आयुर्वेद के अनुसार करा जाए व यह जाना जाए कि मूलतरू वात की क्या स्थिति है क्योंकि मेरे पास आज तक एच.आई.वी. पॉजिटिव जितने भी मरीज आए है उनमें किन्हीं दो रोगियों में मैंने वात की समान वैकृत अवस्था नहीं पायी है । आधुनिक एलोपैथिक निदान के पास तो वायरस के संक्रमण होने पर भिन्न-भिन्न रोगियों में भिन्न-भिन्न विकार उपजने का बस एक ही रटा-रटाया सा उत्तर है कि चूँकि इम्यून सिस्टम प्रभावित हो चुका है तो फिर कोई भी बीमारी हो सकती है किंतु यह निदान ही जब भ्रामक है तो फिर उपचार का तो भगवान ही मालिक है जबकि भीतर ही भीतर इस मिथ्या धारणा को फैलाने वाले तो इस तथ्य को समझते ही हैं बस उन्हें तो इंतजार है समय का जबकि वे अपने इस नाटक का अंतिम दृश्य प्रस्तुत करेंगे एड्स की सफल दवा के प्रस्तुतीकरण का,आप यकीन मानिए कि यह दवा कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी ही लाएगी क्योंकि जन सामान्य में तो एक ऐसी दुष्ट धारणा रोपित कर दी गयी है कि भारत के सभी औषधि वैज्ञानिक निरे गधे ही हैं और इन सभी बातों का श्रेय सीधा-सीधा जाता है बिल गेट्स जैसे धनकुबेरों द्वारा बनायी गयी संस्थाओं को जिनके लिए धन के अतिरिक्त जीवन में कुछ और है ही नहीं तथा यदि ये दान भी देते हैं तो इस बात की योजना बना कर कि इस दान के एवज में उन्हें क्या अधिक लाभप्रद मिलने वाला है । मित्रों इन धन के भूखे पिशाचों के लिए मृत्यु का विषय भी व्यापार से परे नहीं है जिसके लिए सारे संसार में चलने वाले शोधों को ये प्रोत्साहन देने के नाम पर ये जानते रहते हैं कि इनकी योजना के संबंधमें लोग क्या कर रहे हैं क्या इनके विरूद्ध चल रहा है और क्या इनके पक्ष में है और हमारे यहाँ के लोग यही सोच कर प्रसन्न होते रहते हैं कि भगवान ने इन फिरंगियों को सद्बुद्धि दे दी है इसीलिए ये बीमारियों के नाश के लिए विश्वस्तरीय कार्यक्रम चला रहे हैं । आदरणीय पाठकों मैं आपको सचेत करने के लिए कलम ही घसीट-घसीट कर रह गया और जैसा कि मैंने पहले हीकहा था कि इनका ष्ष्एक गोली रोजाना ष्ष्इस नाटक का अंत होगा तो लीजिए वह हो ही गया और इन्होंने ‘कॉमर्शियल सेक्स वर्कर्स ‘और ‘पुरूष-पुरूष से गुदा-मैथुन ’ करने वाले लोगों के लिए खतरे से बाहर बनाए रखने की गोली बन भी गयी जिसका नाम है ज्मदवविअपत ; यह गोली एक रोज लेने से कुकर्म करने वाले लोगों को एड्स का खतरा नगण्य हो जाएगा बस अब क्या है हमारी सभ्यता के नाश की इनकी जो योजना है वह चरणबद्ध तरीके से कामयाब होती जा रही है और लेखक जैसे मुट्ठी भर लोगों की आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज सिद्ध हो रही है । अब तो दूरदर्शन पर भी नियमित रूप से ही जिस प्रकार विभिन्न बीमारियों से बचाव के विज्ञापनी प्रचार आते रहे हैं उनमें एड्स का नाम भी शामिल हो गया है । पहले इस लॉबी ने अपने एक हथियार काँडोम को परिवार नियोजन के उपाय के रूप में हमारे सामने रखा और हमने इसे खुशी से स्वीकार लिया क्योंकि हमारे यहाँ रखा और हमने इसे खुशी से स्वीकार लिया क्योंकि हमारे यहाँ का दुर्भाग्य है कि हम सदा से इतने भोले रहे हैं कि हम छद्मरूप में आए किसी को नहीं पहचान पाए हैं जबकि इतिहास गवाह है कि इस लॉबी के पूर्वज अंग्रेज जब ईस्ट इंडिया कंपनी लेकर व्यापारी के रूप में हमारे देश में घुसे और शासक बन बैठे ठीक वही अब भी हुआ कि इस लॉबी ने काँडोम को परिवार नियोजन के उपाय के रूप में हमारे सामने लाया और अब वह सही रूप में आ गया है जिसे एड्स से बचाव का उपाय कहकर प्रचारित करा जा रहा है यानि कि आप कुछ भी कुकर्म स्वच्छंद रूप से करें किंतु यदि आप काँडोम का प्रयोग करते हैं तो आप एड्स से बचे रहेंगे । इस प्रकार रबर के इस गुब्बारे से अरबों-खरबों रूपयों का व्यापार कर डाला इन लोगों ने जिसमें कि हमारे नेतागण भी मिट्टी के माधो बन कर शामिल हो जाते हैं। अब तो वह समय जल्दी ही आने वाला है कि जब यह लॉबी हमारी सरकारों को समझाने में कामयाब हो जाएगी कि हर गर्भवती का परीक्षण करा जाए ताकि एड्स का उन्मूलन करा जा सके और इसके लिए प्रतिवर्ष लगा करेंगी एड्स के परीक्षण हेतु इस लॉबी द्वारा उत्पादित अरबों रूपयों की मोटी रकम की ष्ष्टेस्ट किट्सष्ष्,जिनकी सरकारी खरीद में नेता और बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ दोनो मिल कर चाँदी काटेंगे और बढ़ती मंहगाई और टैक्सों के बोझ से पिसेगी आम जनता। पाठकों एच.आई.वी. पॉजिटिव होने से लेकर मृत्यु तक का सफर तय करने में रोगी अपनी निजप्रकृति के अनुसार विकृत वात के विभिन्न चरणों से गुजरता हुआ अंततरू मृत्यु को प्राप्त होता है । वस्तुतरू वात आदि दोषों के प्रकोप के कारणों का उल्लेख इस लेख की विषय वस्तु नहीं है अतरू उक्त विषय की गहनता को पाठकजन जानना चाहें तो आयुर्वेद की पदार्थ विज्ञान, क्रिया-शारीर, शरीर क्रिया विज्ञान के गृन्थों का अध्ययन करें या किसी वैद्य से सम्पर्क करें ।वात के भिन्न स्थानों पर जैसे आमाशय,पक्वाशय,ज्ञानेन्द्रियाँ,कोष्ठ,गुद,सर्वांग,त्वचा,माँस,मेद,रक्त,अस्थि मज्जा,शुक्र,स्नायु,सिरा व संधि मे कुपित होने पर अनेकानेक रोग होते हैं और इस कोप का कारण भिन्न धातुओं के क्षय किंवा इनमें से किसी के द्वारा उसके मार्ग का आवृत होना है,पंचविध वायु भी एक-दूसरे को आवृत करते हैं व अतिकष्टकारी रोगों को पैदा करते हैं । जिस प्रकार से विभिन्न धातुएं वायुओं को आवृत करती हैं उसी प्रकार से पंचविध वायुओं के भी परस्पर आवरण होते हैं । ये संख्या में बीस होते हैं - प्राणावृत व्यान, व्यानावृत प्राण ,प्राणावृत समान , समानावृत अपान ,प्राणावृत उदान, उदानावृत प्राण, उदानावृत अपान , अपानावृत उदान , व्यानावृत अपान, अपानावृत व्यान ,समानावृत व्यान ,उदानावृत व्यान तथा इसी प्रकार अन्यान्य भी समझने चाहिए। यदि इनमें से कथित एड्स को हम समझें तो आयुर्वेद के अनुसार उदान वायु से प्राण वायु के आवृत होने पर जो कुछ कहा है वही है कथित एच.आई.वी. पॉजिटिव का जानलेवा रूप ---
अर्थात प्राण वायु के उदान वायु से आवृत होने पर कर्म, ओज, बल व वर्ण का नाश अथवा मृत्यु--ये लक्षण होते हैं आज तक यह कहने का साहस कदाचित ही कोई जुटा सका हो कि वह कह सके कि वात का प्रकोप भी इतना भयानक हो सकता है कि देह की रोग प्रतिरोध क्षमता को नष्ट कर दे और रोगी को काल-कवलित ही करा दे। अतरू चिकित्सक मित्रों से स्पष्टतरू कहता हूँ कि यदि एड्स के उपचार में हाथ डाल रहे हैं तो सही उपाय यह है कि पहले रोग का समुचित निदान करें तत्पश्चात उपचार करें । आवरण-वात वात व्याधियों की एक विशिष्ट सी अवस्था है अतरू आवृत और आवरणकर्ता दोनों का ध्यान रख कर चिकित्सा करी जाए । यहाँ कहा गया समस्त विवरण चरक संहिता में अत्यंत गहनता से बताया है जोकि कहे गए आवरणों के सूक्ष्मेक्ष्ण भेदन के लिए उपयोगी है। आवरण का मूल तो वायु ही है अतरू चिकित्सा वायु की करनी चाहिए किंतु उस तक जाने के लिए पहले उस वायु के पर चढ़े आवरण का भेदन करना होता है अन्यथा सब किया कराया व्यर्थ हो जाता है । आवृत वात मे आवरण की चिकित्सा प्रथम तथा मूल हेतु वायु की चिकित्सा बाद में करी जाती है जिसके लिए वातज व्याधियों की चिकित्सा के सामान्य सिद्धांत,उपक्रम तथा आहार-विहार के साथ विविध औषध उपयोगी हैं ।एड्स का उपचार करने के लिए इन सभी तथ्यों का ध्यान रखना परमावश्यक है ,उदानावृत प्राण के उपचार के लिए कहा गया है कि शीतल जल से परिषेक ,आश्वासन ,विश्राम एवं संतर्पण-कारक लघु द्रव्यों विशेषकर फलों का प्रयोग करा जाना चाहिए । यह ध्यान देना आवश्यक है कि पाठक यह दुराग्रह त्यागें कि लेखक ने अभी तक दवाओं का तो नाम तक नहीं लिखा क्योंकि आयुर्वेद में उपचार व्यक्ति ,देश तथा काल के अनुसार ही करी जाती है । विद्वजनों कदाचित अब तक तो आप लोगों को पता भी चला होगा कि लेखक इस पूरे लेख में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जिस साजिश की चेतावनी दे रहा था उस नाटक का पटाक्षेप सिपला नामक कंपनी ने कर दिया और बताया गया है कि तीन अचूक औषध घटकों से तैयार करी गयी खुराक की बस एक गोली रोजाना लेना होगा यानि कि आप बन गये जिंदगी भर के ग्राहक,जैसे कि मधुमेह ,रक्तचाप ,अस्थमा आदि में होता रहा है । बताया जा रहा है कि पहले पहल इस औषधोपचार का खर्च तकरीबन 52000 हजार रूप्रति माह आता था किंतु अब जबसे हमारी प्यारी कंपनी सिपला ने इसे बनाना शुरू करा है तबसे इसका खर्च मात्र 5800 रू प्रति माह आता है तो अब आप ही अंदाज़ लगा लीजिए कि यदि जान बचाना है तो 5800 रू प्रति माह तो दरिद्र से दरिद्र व्यक्ति खर्च करने को तैयार हो ही जाएगा और सिपला की तिजोरी भरने के लिए आजीवन ग्राहक मिल जाता है ,बहुत संभव है कि कुछेक गैरसरकारी संगठन इन दवाओं को कम कीमत या मुफ्त में भी उपलब्ध कराने लगें किंतु उनका अर्थशास्त्र अलग ही होता है क्योंकि वे तो धनकुबेरों या सरकारी योजनाओं से पैसा चूसनें की बंदूक मरणासन्न रोगियों के कंधे पर रख कर चलाते हैं इसलिए वे रोगी नहीं रोग का पोषण करतें हैं कि यदि रोग का उन्मूलन हो गया तो उन्हें पैसा कहाँ से मिलेगा । अब आप यह तो जान लें कि सिपला कंपनी की जादुई दवा करती क्या है ,इस दवा की वक़ालत करने वाले अब एच.आई.वी. के पॉजिटिव या निगेटिव होने की बात ही नहीं करते बल्कि देह की जीवनी शक्ति बढ़ाने की बात करते हैं जिसको वे सी.डी.4/सी.डी.8 की गणना करके अपने द्वारा ही तय करे नियमों से रोगी को बताते रहते हैं कि जीवन कितना शेष है कदाचित इन विज्ञान कलंकों से तो सड़क पर तोता लेकर बैठने वाला ज्योतिषी आयु के विषय में अधिक सफल भविष्यवाणी कर सकता होगा ।

Thursday, 24 November 2011

खुबसुरती छुपी आपके ही घर में


थोड़े से गर्म पानी में नींबू का रस मिला लें और इस पानी से बालों को फाइनल रिंस करें, बालों में नई चमक आ जाएगी। - नींबू के रस और शहद को पानी में मिलाकर बालों में लगाने से रुखापन कम होता है।

3 नींबू, 1 ककड़ी, 1 संतरा और 1 चाय का चम्मच गुलाबजल, मिलाकर रख लें और चेहरे पर नियमित लगाएं। इससे ब्लैकहेड्स की समस्या से छुटकारा मिलता है।
बेसन, नींबू का रस और दही इन सबको समान मात्रा में लेकर बालों में मसाज करें, फिर बालों को धो लें। आखिर में बालों को नींबू के पानी से फाइनल रिंस करें।
एक अंडे में आधा चाय का चम्मच नींबू का रस मिलाकर चेहरे पर लगाएं। इससे चेहरा खिल उठेगा।
अगर आपके बाल बहुत ज्यादा ऑयली हैं तो बालों में दही फेंटकर लगाएं। 20 मिनट बाद बाल धो लें। यह बालों की गहराई तक सफाई करता है और बालों में नई जान लाता है।
हिना ब्यूटी
एक कप मेंहदी में आंवला, शिकाकाई, रीठा -प्रत्येक एक चाय का चम्मच-, मेथी, नीम, तुलसी (सब पाउडर में लें)। सभी वस्तुएं दही में मिलाएं व आधा नींबू का रस भी मिला लें, पूरे बालों में अच्छी तरह से लगाकर एक घंटे तक रहने दें।
मेंहदी को रात में दही में भिगोकर सुबह इसमें नींबू का रस मिलाकर फेंट लें। इस मिश्रण को बालों में लेप कर एक घंटे बाद बाल धो लें।
बेजान व सफेद बालों के लिए मेंहदी में मंडूर पाउडर मिलाकर रात भर भिगोकर दूसरे दिन लगाएं। इस प्रयोग से आपको लाभ होगा।

Gazala Khan

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ताजमहल दुनिया की खूबसूरती मे एक मिसाल


ताजमहल दुनिया का आठवां आश्चर्य है। यह स्थापत्य कला और सौंदर्य का अद्भुत संगम है, जो हर किसी को अपनी एक झलक देखने पर विवश कर देता हैं। देश-विदेश के कोने-कोने से लोग शाहजहां-मुमताज की निशानी को देखने खिंचे चले आते हैं। मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी प्यारी पत्नी मुमताज की याद में 

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ताजमहल बनवाया था। इसकी बेहतरीन खूबसूरती संध्या के समय और चांद की रोशनी में देखते ही बनती है। चांद की रोशनी ताजमहल की खूबसूरती में चार चांद लगा देती हैं। सर्दी की सुबह पर्यटक ताजमहल को यमुना किनारे से देखते हैं। धुंध में ताजमहल की खूबसूरती और भी निखर जाती है। पूरी तरह से संगमरमर के पत्थरों से बना यह महल लाजवाब है। कहते हैं शाहजहां अपनी पत्नी मुमताज को बेहद चाहते थे। वे पूरी दुनिया को यह दिखाना चाहते थे। इसी महल के एक कोने में उन्होंने अपनी बेगम की कब्र बनाई और बाद में शाहजहां को भी उनकी बेगम के पास ही दफना दिया गया।

शाहजहां ने इसे 1631 में बनवाया था। लगभग 22 साल की मेहनत के बाद यह खूबसूरत महल तैयार हुआ। इसे करीब 20 हजार मजदूरों ने मिलकर बनाया। पारसी, इतावली और फ्रांस के कलाकारों ने इस महल का डिजाइन तैयार किया था। जयपुर के महाराजा ने इस महल के लिए मार्बल बतौर भेंट शाहजहां को दिए थे। शाहजहां ने यों तो कई स्मारक बनवाए हैं, पर सबसे खूबसूरत आगरा का यह ताजमहल ही है जो एक पति का अपनी पत्नी के प्रति असीम प्यार की मिसाल बन गया। 1622 में जब शाहजहां ने सत्ता की बागडोर संभाली, तो उस समय के बेहद क्रूर राजा थे। लेकिन समय के साथ उन्होंने अपने आप को बदला। बाद में गरीबों और अपनी प्रजा के लिए वे अच्छे राजा साबित हुए। वे भारत को बेहतर तरीके से सजाना-संवारना चाहते थे इसलिए कई स्मारक बनवाए और उनमें सबसे खूबसूरत और बेहतरीन था ‘ताजमहल‘।

इस खूबसूरत इमारत का प्रवेश द्वार ठोस चांदी से बनाया गया है। चारों तरफ मार्बल से सुसज्जित और बीच में खूबसूरत बगीचा है। इसी के बीच सुंदर तालाब मन को मोहित कर लेता है। ताजमहल का हर कोना सफेद मार्बल, महंगे धातुओं और पत्थरों से सजाया गया है। इस इमारत के बारह भाग हैं, जिनमें से चार प्रवेशद्वार हैं। हर कोने में एक पतली मीनार है और हर मीनार व इमारत की छत गुंबद की तरह है जो इसकी खूबसूरती में चार चांद लगा देती है। इस इमारत में प्रवेश करते ही ऐसा लगता है, मानों हम स्वर्ग में आ गए हैं। सिर्फ सौ फीट ऊंची इस इमारत को बनने में करीब 22 साल लग गए पर जब यह तैयार हुआ, तो किसी अजूबे से कम नहीं था। ताजमहल के एक-एक पत्थर और एक-एक कोने को इस खूबसूरती से तराशा गया है कि देखने वाले अपलक इसकी खूबसूरती निहारते रहते हैं। धरती पर इससे बेहतर और खूबसूरत प्यार की मिसाल नहीं हो सकती।

ताजमहल देखने के लिए आप किसी भी मौसम में जा सकते हैं लेकिन सर्दी में धुंध के दौरान ताजमहल की खूबसूरती का बयान करना मुश्किल है। रेलमार्ग और सड़क मार्ग से आसानी से यहां पहुंच सकते हैं।

Gazala Khan

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यह अनोखा जैकेट इंसान को उड़ाएगा

एक ऐसा जादुई जैकेट है जिसे पहनकर इंसान हवा में उड़ाने लगेगा।

ये जादुई जैकेट इंसान को आसमान में 15 किलोमीटर प्रति घंटे के रफ्तार से 15 हजार फीट ऊपर तक ले जाता है। खास बात ये है कि यह जैकेट साधारण पेट्रोल से चलता है। इसमें एक बार में 20 लीटर पेट्रोल भरा जा सकता है।
क्या आप कभी सोच सकते हैं कि एक जैकेट पहनने भर से आप हवा में उड़ने लग जाएं। यकीनन अब ऐसा मुमकिन है। उड़ने वाला इंसान और उड़ान की ये तकनीक इजाद करने वाला भी इंसान ही है। ये उड़ान खास नहीं बेहद खास है। सिर्फ एक जादुई जैकेट पहनी और उड़ गए अपनी मंजिल की तरफ। न्यूजीलैंड की मार्टिन नाम की कंपनी ने इस जैकेट को इजाद किया है।

दरअसल हवा में उड़ान भरने वाली इस जादुई जैकेट में बी 4 मॉडल का इंजन लगा है। इसके दोनों विंग्स के ऊपर दो रोटेटरी फैन लगाए गए हैं। जो इसको साईड थ्रस्ट देता है। वहीं जैकेट के पीछे एक नोजल लगा है जो इसको अपवर्ड थ्रस्ट देता है। यही नहीं इसे घुमाने के लिए इसमें खास तरह की जोयइसटिक लगाई गई है। जबकि ऊपर-नीचे करने के लिए इसमें दो कंट्रोल लेफ्टराइट लगा है। जिसे इसे पहने वाला इंसान आसानी से घुमा सकता है। इसके अलावा इसमें जीपीएस सिस्टम भी लगाया गया है। जो इसे आकाश में सही मंजिल तक पहुंचाने के साथ आपात स्थिति में मदद भी मुहैया करायेगा।
इस जैकेट की खूबी देख भारतीय फौज इसे अपने बेड़े में शामिल करने करने पर विचार कर रही है। फौज इस बात की पड़ताल कर रही है कि इस जैकेट का कहां-कहां इस्तेमाल हो सकता है। इस तरह, परिंदे की तरह उड़ने का मौका देने वाली ये जादुई जैकेट अब भारत जैसे देश के लिए एक हकीकत बनने जा रही है।
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इस जैकेट को दुर्गम इलाकों के लिए बनाया गया है। बॉर्डर की निगरानी हो या रेस्कयू ऑपरेशन, ये जैकेट सारे काम चुटकियों में निपटा देगी। यही नहीं इसके एडवासंड वर्जन में तो आदमी की जरूरत भी नहीं है। अकेले ही ये निगरानी और रेस्कूय ऑपरेशन को अंजाम देगी यानी ये एक अनमेंड एरियल वेहिकल का भी काम करेगी। अगर आप महंगी कारें खरीदने के शौकीन हैं तो इस जैकेट को खरीद कर उड़ान भर सकते हैं। क्योंकि इसकी कीमत भी सिर्फ पैंतालिस लाख रुपये है।

                                                                                                              



 

Wednesday, 23 November 2011

ओबामा गर्मियों में भी कार में एसी नहीं चलाते


Gazala Khan

वॉशिंगटन (visharadtimes.com)। गर्मी के दिनों में यात्रा के दौरान भी अमेरिका के राष्ट्रपति बाराक ओबामा अपनी कार के एयरकंडिशनर का इस्तेमाल नहीं करते हैं। एबीसी टीवी के साथ एक इंटरव्यू में राष्ट्रपति ओबामा के निजी सहयोगी , गेटकीपर और बास्केटबॉल के सह खिलाड़ी रेगी लव ने बताया कि मुझे सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यही लगती थी कि ओबामा गर्मी के दिनों में भी बिना एसी के कार में यात्रा करते हैं। उन्होंने बताया कि और मुझे गर्मी लगती थी। मुझे पसीना आने लगता था और मुझे लगता था कि उनकी कार का तापमान 80 डिग्री सेल्सियस है। मुझे लगता था कि मुझे चक्कर आ जाएगा।

अपने हवाई स्थित पैतृक आवास पर जितना तापमान रहता है उतना ही तापमान अपने ओवल ऑफिस का रखने वाले राष्ट्रपति ओबामा जिस समय सेनेटर थे उस समय वर्ष 2006 में कॉलेज के पूर्व बॉस्केटबॉल सह खिलाड़ी लव को अपने साथ ले आए थे। ओबामा के ‘अंगरक्षक ’ से ज्यादा निजी सेवक लव ने इस साल बिजनेस स्कूल में पढ़ने के लिए उनका साथ छोड़ दिया।
Sent at 8:41 PM on Wednesday

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