Sunday, 7 August 2011

इस्लाम के अहकाम

इस्लाम मे पांच अहकामों को अनिवार्य माना गया है इन में अहकामो में कल्मा, नमाज, रोजा, जकातऔर हज शामिल है। ईश्वर ने प्रत्येक मुसलमान (धनवान व्यक्ति) के लिए अनिवार्य किया है कि यदि उसके पास कम से कम साढ़े बावन तोला चाँदी या इसके मूल्य के बराबर धन हो और उसे रखे हुए पूरा एक वर्ष बीत जाए,तो वह उसमें से चालीसवाँ भाग अपने किसी ग़रीब नातेदार या किसी मोहताज, किसी असहाय निर्धन, किसी नवमुस्लिम, किसी मुसाफ़िर या किसी क़र्ज़दार व्यक्ति को दे दे। या सत्य-धर्म की सेवा व विस्तार में लगा दे।
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इस प्रकार ईश्वर ने धनवानों की सम्पत्ति में निर्धनों के लिए कम से कम ढाई प्रतिशत भाग निश्चित कर दिया है। इससे अधिक यदि कोई कुछ दे तो यह एहसान है जिसका पुण्य और अधिक होगा।
देखिए, यह हिस्सा अल्लाह को नहीं पहुँचता। उसे आपकी किसी चीज़ की आवश्यकता नहीं। परन्तु वह कहता है कि तुमने यदि प्रसन्नतापूर्वक मेरे लिए अपने किसी ग़रीब भाई को कुछ दिया तो मानो मुझको दिया, उसकी ओर से मैं तुम्हें कई गुना अधिक बदला दूँगा। हाँ, शर्त यह है कि उसको देकर तुम कोई एहसान न जताओ, उसका अपमान न करो, उससे धन्यवाद की आशा न रखो, यह भी कोशिश न करो कि तुम्हारे इस दान की लोगों में चर्चा हो और लोग तुम्हारी प्रशंसा करें कि अमुक सज्जन बड़े दानी हैं। यदि इन सभी नापाक विचारों से अपने मन को शुद्ध रखोगे और केवल मेरी प्रसन्नता के लिए अपने धन में निर्धनों को हिस्सा दोगे तो मैं अपने असीमित धन में से तुमको वह हिस्सा दूँगा जो कभी समाप्त न होगा।
ईश्वर ने इस ‘ज़कात’ को भी हमारे लिए उसी प्रकार अनिवार्य किया है जिस प्रकार नमाज़ और रोज़े को अनिवार्य किया है। यह इस्लाम का बहुत बड़ा स्तंभ है और इसे स्तंभ इसलिए माना गया है कि यह मुसलमानों में ईश्वर (की प्रसन्नता) के लिए बलिदान और त्याग का गुण पैदा करता है। स्वार्थ, तंगदिली और धन-लोलुपता के बुरे गुण को दूर करता है। धन की पूजा करनेवाला और रुपये पर जान देनेवाला लोभी और कंजूस व्यक्ति इस्लाम के किसी काम का नहीं। जो व्यक्ति ईश्वर की आज्ञा से अपने गाढ़े पसीने की कमाई बिना किसी निजी स्वार्थ के निछावर कर सकता हो वही इस्लाम के सीधे मार्ग पर चल सकता है। ज़कात मुसलमानों को इस बलिदान और त्याग का अभ्यास कराती है और उसको इस योग्य बनाती है कि ईश्वर के मार्ग में जब माल ख़र्च करने की आवश्यकता हो, तो वह अपने धन को सीने से चिपटाए न बैठा रहे बल्कि दिल खोलकर ख़र्च करे।
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