Tuesday, 23 August 2011

हम क्या, हमारा क्या?

रावण बहुत बड़ा ज्ञानी था। उसने कड़े तप किए थे। पराक्रमी भी था, लेकिन जो उसे ले डूबा, वह था उसका घमंड। यह बातें हमने बचपन से सुनी हैं।
आजकल व्यक्तित्व निखार के सबक का हिस्सा खुद पर नाज करना सिखाने का भी है। नाज और घमंड में कितना अंतर है, यह जानना रोचक हो सकता है।
पिछले दिनों एक मालिक मकान को अपने किराएदार से कहते सुना कि हमने आपको रहने के लिए घर दिया। इसे आप क्या कहेंगे, नाज या घमंड? कोई किसी को ऐसा क्या दे सकता है, जिस पर अधिकार से कह सके कि मैंने दिया? याचक तो हम सब हैं। अगर नहीं, तो इंकार कर दें कि किसी की दी हवा में सांस नहीं लेंगे, किसी की धरती पर कदम नहीं रखेंगे, किसी और का बरसाया पानी नहीं ग्रहण करेंगे। सब खुद रचें और फिर इस्तेमाल करें।
या हो सके, तो जो अब तक इस्तेमाल कर लिया है पीढ़ियों दर पीढ़ी, उसका मोल चुका दें और फिर कहें कि हम किसी के देनदार नहीं। वह आसमान का टुकड़ा हमारा है, जिसके नीचे बसी धरती पर हमने हवा पर घर बनाया है।
नाज शब्द को जब प्राइड से जोड़ा जाता है, तब भी समझने की बात यह है कि इसमें अपने किए या पाए पर इठलाने का मुद्दा नहीं है। व्यक्तित्व निखार के जरिए, जिस प्राइड या नाज की बात की जाती है, वह घमंड से कोसों दूर है। जो आप कर रहे हैं, उस पर, अपनी मेहनत पर और उसके नतीजों में मिले इत्मीनान को स्वीकार करने या महसूस करने का ही अर्थ है यहां। नतीजे ठीक न मिले हों, तो कमतर न समझें। बस, इतना ही।
नाज खुद पर किया भी नहीं जाता। किसी बेहद काबिल को अपना कह पाने के सौभाग्य पर ही नाज किया जा सकता है। नाज खुद पर है, तो घमंड के बराबर है। घमंड उसे होता है, जो यह मानता है कि उसके जैसा दूसरा कोई नहीं। उसके पास जो है, वैसा किसी और के पास नहीं हो सकता। यह भाव तुलनात्मक है। लेकिन तुलना तो उनमें की जा सकती है, जिनमें ठहराव हो, बदलें न। जो सदा परिवर्तनशील है, उनमें तुलना सम्भव नहीं। शाश्वत हम हैं नहीं, तो नाज किस पर, और कैसा? न वक्त रुकता है और न हालात एक जैसे रहते हैं।
हम इंसान जिस दिन इन पर काबू पा लें, उस दिन कह सकते हैं कि हमें नाज है खुद पर। तब तक यही मानना चाहिए कि हम किसी को दे ही क्या सकते हैं। बस, जरिया हैं चीजों के अदल-बदल होने का।
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