Friday, 4 November 2011

दोस्ती का मतलब


एक जंगल में एक ऊंट और सियार रहते थे। दोनों बेस्ट फ्रेंड थे। अपने स्वभाव के अनुकूल ऊंट सीधा-सादा और शांत था, जबकि सियार चालाक और ज्यादा बोलने वाला था। एक दिन सियार ने ऊंट से कहा, ‘भाई तरबूज का मौसम है। जंगल से थोड़ी ही दूरी पर एक किसान का खेत है, चलो किसी दिन उसके खेत पर धावा बोलते हैं। पेट भर के तरबूज खाएंगे।’ ऊंट ने कहा, ‘लेकिन तुम वहां कैसे जा सकते हो, जानते नहीं हो कि रास्ते में एक नदी पड़ती है, और आजकल तो उसका बहाव भी तेज होगा।’ सियार ने कहा, ‘हां, मैं जानता हूं, लेकिन इसमें कौन सी घबराने वाली बात है? जब नदी आएगी तो मैं तुम्हारी पीठ पर बैठ जाऊंगा और दोनों आराम से नदी पार कर लेंगे।’ ऊंट, सियार की सोच पर मुस्कुराया और बोला, ‘ठीक है, किसी दिन चलते हैं।’
एक दिन सुबह दोनों तरबूज खाने के लिए निकले। रास्ते में जब नदी आई तो सियार ने ऊंट की पीठ पर चढ़कर नदी पार कर ली। जब तक दोनों तरबूज के खेत के पास पहुंचे, दोपहर हो चुकी थी। खेत का मालिक अपने घर जा चुका था। यह देखकर दोनों बहुत खुश हुए और उन्होंने तरबूज खाना शुरू कर दिया।
सियार तो चालाक था ही, उसने जल्दी-जल्दी तरबूज खाना शुरू किया, दूसरी ओर ऊंट आराम से खा रहा था। तुम्हें तो पता ही होगा कि सियार का पेट, ऊंट की तुलना में छोटा होता है, इसलिए सियार का पेट जल्दी ही भर गया और उसे डकार आने लगी। तब सियार ने कहा, ‘भाई, अब तो मैं हुक्का-हुआ करूंगा।’ ऊंट बोला, ‘सियार भाई, क्या कह रहे हो। पास ही खेत के मालिक का गांव है। तुम्हारी आवाज सुनकर वह चैंकेगा और भागकर खेत में आ जाएगा। हम दोंनों पकड़े जाएंगे और हमारी पिटाई होगी।’
सियार ने यह सुनकर बड़ी चालाकी से कहा, ‘नहीं भाई, मैं तो रोज खाने के बाद हुक्का-हुआ ही करता हूं, इसलिए आज भी करूंगा।’ यह कहकर वह जोर-जोर से हुक्का-हुआ करने लगा। उसकी आवाज सुनकर खेत का मालिक आ गया। उसे देखकर सियार पास ही छिप गया, लेकिन बड़ा शरीर होने की वजह से ऊंट छिप नहीं सका। खेतवाले ने ऊंट को देख लिया और यह भी देखा कि खेत में तरबूज के छिलके पड़े थे। उसकी समझ में सारा माजरा आ गया और उसने पास ही पड़ा डंडा उठाकर ऊंट को पीटना शुरू कर दिया। खेतवाले ने ऊंट को खूब मारा। ऊंट की आंखों से आंसू निकलने लगे।
सियार पास ही छिपा हुआ अपने दोस्त को मार खाते हुए देख रहा था। ऊंट को जी भर के मारने के बाद खेतवाला चला गया।
पिटने के बाद ऊंट की हालत बुरी हो गई थी। वह थके हुए कदमों से जंगल की ओर वापस चला तो पीछे से आकर सियार साथ चलने लगा। रास्ते में जब नदी आई तो उसने ऊंट से कहा, ‘भाई, नदी तो मैं तुम्हारी मदद से ही पार कर पाऊंगी।’ ऊंट कुछ नहीं बोला, बस झुक कर बैठ गया, लेकिन उसने सोच लिया था कि ऐसे मतलबी दोस्त को मजा चखाना जरूरी है। सियार उसकी पीठ पर चढ़ गया। दोनों नदी पार करने लगे। बीच नदी में जहां पानी का बहाव तेज था, ऊंट रुक गया और सियार से बोला, ‘भाई, अब तो मैं लेटने जा रहा हूं।’
सियार ने कहा, ‘यह क्या कह रहे हो भाई, देख नहीं रहे कि पानी कितना तेज है। तुम लेटोगे तो तुम्हारा तो कुछ नहीं, लेकिन मैं तो बह ही जाऊंगा।’ ऊंट ने कहा, ‘लेकिन मैं तो रोज खाने के बाद थोड़ा आराम करने के लिए लेटता हूं, इसलिए आज भी ऐसा ही करने का मन कर रहा है। फिर हुक्का-हुआ करने से पहले क्या तुमने मेरे बारे में सोचा था?’
इतना कहकर ऊंट पानी में बैठ गया। तभी पानी का तेज बहाव आया और सियार उसकी पीठ से गिरकर उसमें बहता चला गया। बाद में वो किसी दूसरे गांव में जाकर निकला। वहां जाकर उसे एहसास हुआ कि उसने दोस्त के साथ गलत किया है। उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था। वह काफी पछता भी रहा था। लेकिन अब तो उसके हाथ में कुछ भी शेष नहीं रहा था।
कहानी कुछ कहती है
दोस्त वह होते हैं, जिन पर हम पूरा भरोसा करते हैं। हम ऐसा नहीं सोचते कि उनकी वजह से हम पर मुसीबत आएगी या नहीं, हम तो हर हाल में उनका साथ देते हैं। चाहे दुख हो या खुशी, साथ मिलकर रहते हैं। हां, अगर कोई तुम्हारे साथ भी सियार की तरह बर्ताव करता है तो उसे सबक सिखाकर खुद को उससे अलग करना ही बेहतर होता है।

प्रस्तुति
GAZALA KHAN

www.visharadtimes.com

No comments:

Post a Comment