Monday, 21 November 2011

रुपये की कमजोरी से हारी सरकार!


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नई दिल्ली 21 नवंबर । अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले रुपये की कीमत में जारी गिरावट अर्थव्यवस्था की सुस्ती और बढ़ा सकती है। सोमवार को भारतीय मुद्रा सुबह के कारोबार में 52 रुपये प्रति डॉलर का स्तर भी पार कर गई। यह रुपये का 32 महीने का निचला स्तर है। रिजर्व बैंक की तरफ से हस्तक्षेप के बावजूद रुपये की इस गिरावट को रोका नहीं जा सका। इसके बाद सरकार ने भी एक तरह से स्वीकार कर लिया है कि इस पर पूरी तरह काबू पाना उसके अख्तियार में नहीं है।  जानकारों का कहना है कि रुपये में और गिरावट की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसा होने से न सिर्फ आर्थिक विकास की रफ्तार और मंद पड़ेगी, बल्कि महंगाई रोकने की सरकारी कोशिशों पर भी पानी फिर जाएगा। वित्तीय मामलों के सचिव आर गोपालन ने रुपये को रोकने में सरकार की असमर्थता जताते हुए कहा कि आरबीआइ एक सीमा तक ही रुपये की कीमत थाम सकता है। दरअसल, रुपया पिछले एक महीने से डॉलर के मुकाबले लुढ़क रहा है, लेकिन सरकार अभी तक हस्तक्षेप नहीं कर रही थी। सोमवार को आरबीआइ की तरफ से सीमित मात्रा में हस्तक्षेप हुआ। यह अलग बात है कि बाजार का मूड देख कर केंद्रीय बैंक ने अपने कदम खींच लिए। अंतर बैंक मुद्रा बाजार के बंद होने के समय रुपया 51.16 प्रति डॉलर के भाव पर था। 
ग्लोबल अर्थंव्यवस्था में सुधार के लक्षण नहीं दिख रहे हैं। भारतीय शेयर बाजार से विदेशी संस्थागत निवेशकों के पूंजी निकालकर भागने का सिलसिला जारी है। ऐसे समय आरबीआइ विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल खुलकर नहीं कर सकता है। उद्योग चैंबर एसोचैम के महासचिव डीएस रावत ने कहा है कि देश का विदेशी मुद्रा भंडार इतना बड़ा नहीं है कि केंद्रीय बैंक रुपये में इस गिरावट को रोकने के लिए बाजार में ज्यादा सक्रिय हो। मौजूदा हालात में आरबीआइ ज्यादा से ज्यादा सटोरिया गतिविधियों को रोकने में अपनी भूमिका निभा सकता है। 
विदेशी बाजार से जुड़े कारोबारियों का कहना है कि एफआइआइ के साथ ही तेल कंपनियां भी बड़े पैमाने पर डॉलर खरीद रही हैं। कच्चे तेल की कीमत में ज्यादा गिरावट नहीं होती दिख रही है। इसलिए तेल कंपनियों को लग रहा है कि आगे भी क्रूड और महंगा हो सकता है। इसलिए वायदा कारोबार में खूब निवेश किया जा रहा है। तेल कंपनियां वैसे तो भविष्य के बोझ को कम करने के लिए यह कदम उठा रही हैं, लेकिन इससे महंगाई पर नियंत्रण की सरकारी कोशिश पर भी उलटा असर पड़ेगा। तेल कंपनियों का घाटा बढ़ेगा। इसकी भरपाई करने के लिए हो सकता है कि घरेलू बाजार में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें बढ़ानी पड़ें। अगर सरकार इन कंपनियों को आर्थिक मदद देती है तो उससे राजकोषीय घाटा बढ़ेगा। इसका भी असर महंगाई पर साफ नजर आएगा। डॉलर के मुकाबले रुपया पिछले तीन से चार महीने के भीतर 43-44 के स्तर से गिरकर 52 के आसपास आ गया है। इससे आयात काफी महंगा हो चुका है। खास तौर पर कैपिटल गुड्स और ऑटोमोबाइल कंपनियों पर ज्यादा बुरा असर पड़ने के आसार हैं। खाद्य तेलों का आयात भी महंगा हो रहा है। इन सब का प्रभाव महंगाई की दर पर भी पड़ेगा।


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