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| warisha khan |
ऐसी भरपूर सजावट, जैसी आप भारत में किसी भी विवाह समारोह में आम तौर पर देखते हैं। हां, शैली कुछ उत्तर-दक्षिण मिली जुली थी, उसी तरह जैसे जिसे हम शहनाई समझ रहे थे, असल में वो दक्षिण भारत की सुरनाई थी। सजावट में कदली स्तंभ (केले के पेड) तो थे ही, नारियल परिवार की भरपूर उपस्थिति थी। हम जैसे अपने यहां आम के पत्तों का वंदनवार सजाते हैं, उनका भी भरपूर इस्तेमाल किया गया था, हां, जब नजदीक से उन्हें नुमाया करने की कोशिश की तो पता लगा कि वो असली नहीं थे। फिर भी माहौल कुछ ऐसा था कि मन ने दिमाग से कहा कि इन्हें असल की तरह ही लो और जो कुछ भी है, उसे असल की तरह ही जियो, एहसास करो। कई गीतों का सफर तय करते हुए इस वक्त सुरनाई राजेश खन्ना के सदाबहार गाने पर आ गई थी, मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू..?
जिंदगी की तमाम चीजें जिस तरह से ग्लोबल हो रही हैं, उसे देखते हुए मलेशिया में भारतीय रीति से शादी का आयोजन कोई अजीब बात तो नहीं है लेकिन भारत से समंदर पार मलेशिया में पूरे भारतीय रस्मो रिवाज के साथ शादी रचते हुए देखना जरूर एक खास किस्म का एहसास था। सभी बाराती भारत से और सभी घराती भारत से। चेन्नई से दो बोइंग घरातियों-बारातियों को लेकर कुआलालंपुर पहुंचे थे। पुरोहित से लेकर शगुन का साज सामान भारत से और इस पूरी गतिविधि के कर्ताधर्ता मलेशिया से, जापान से, कंबोडिया से और फिलीपींस से। ये सारी चीजें अब बहुत कुछ जानने और देखने के लिए प्रेरित कर रही थीं, बाध्य कर रही थीं। बारात की रस्म के लिए हम देर शाम पुत्राजया से 20 किलोमीटर दूर एक दूसरे होटल में पहुंचे। वहां बारातियों के स्वागत लिए पारंपरिक भारतीय व्यंजन संजोने में जुटी एक कंबोडियाई कन्या से जब हमने मलाई की गिलौरी की तरफ इशारा करते हुए उसके बारे में पूछा तो उसने सिरे से अनजानियत जाहिर कर दी। उसके पास एक फाइल थी, जिसमें सिर्फ और सिर्फ आइटम नंबर का जिक्र था और उसे फाइल में दर्ज मेज नंबर पर सजाना भर था। उसके लिए अगर मलाई की गिलौरी एक आइटम थी तो समधियों के लिए राजस्थानी शैली की पगडियां भी एक आइटम ही थीं। उन पगडियों को जिन्हें सिपुर्द करना था, समधी स्तर के वो बाराती भी उनके लिए आइटम ही थे, उनकी फाइल में हर बाराती-घराती के लिए एक नंबर तय था। सभी बारातियों-घरातियों के लिए मोबाइल फोन अनिवार्य था। हर बाराती के लिए एक डायरेक्टरी थी और मैरिज प्लान था। इवेंट मैनेजमेंट का एक पहलू हमने ऐसे भी देखा।
हमारे लिए ये अचरज भरा अनुभव था। अचरज तो और बढ गया जब हमें होटल प्रबंधन से ये जानकारी मिली कि वो औसतन तीन महीने में इस तरह की एक भारतीय शादी का आयोजन करते हैं। ये जानकारी सिर्फ एक होटल के स्तर पर थी। लेकिन ये मामला सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं था। पोर्ट डिक्सन में जब हम वहां के एक होटल प्रबंधन से मिले तो उन्होंने हमें समंदर के रेतीले किनारे पर ले जाकर दिखाया कि वहां दो-दो शादियों की तैयारियां चल रही थी, एक चीनी और दूसरी जापानी। उन्होंने दूसरी तरफ उजडते हुए एक पांडाल की ओर इशारा करते हुए बताया कि कल भी एक जापानी युगल विवाह बंधन की डोर में बंधे हैं। और ये सब कुआलालंपुर, पुत्राजया या पोर्ट डिक्सन तक ही सीमित नहीं है। पोर्ट डिक्सन से लौटते हुए हम वादियों से घिरे एक गांव पहुंचे। वहां के सामुदायिक केंद्र के एक कमरे में पर्यटन विभाग का छोटा सा दफ्तर था। दफ्तर के मुलाजिमों ने हमें बताया कि किस तरह दुनिया के तमाम मुल्क और खासकर दक्षिण एशियाई देशों से लोग मलय परंपरा में निबद्ध तौर तरीकों से यहां विवाह रचाने आते हैं। गांव के मुखिया वहां के स्थानीय स्कूल में अंग्रेजी के अध्यापक भी हैं। उन्होंने तो हमसे पेशकश कर डाली कि अगर मैं खुद चाहूं तो एक बार मलय परंपरा से शादी क्यों न रचा लूं? उन्होंने मुझसे पूछा कि मेरी शादी को कितने साल हो गए? जवाब मिलने के बाद उनका प्रस्ताव था कि क्यों न मुझे शादी की रजत जयंती यहीं आकर मनानी चाहिए। उनके आग्रह में मेजबानी का अवसर उठाने का भाव तो था ही आग्रह में व्यावसायिकता भी भरपूर तरीके से छिपी हुई थी।
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दरअसल पर्यटन मलेशिया के आमदनी उद्यमों में प्रमुख है। वहां की शहरी आबादी का हर चौथा-पांचवां शख्स परोक्ष-अपरोक्ष तरीके से पर्यटन कारोबार से जुडा है। मलेशिया ने पिछले एक दशक के दौरान पारंपरिक पर्यटन से हटकर तमाम नई विधाओं को खोजने की कोशिश की है। विलेज टूरिज्म से लेकर मैरिज टूरिज्म तक। लगभग ढाई करोड आबादी वाले इस मुल्क में भारतीय मूल की आबादी साढे सात फीसदी तक पहुंच गई है। उनमें हिंदू भी हैं, मुस्लिम भी और सिख भी। अपनी उद्यमशीलता के चलते राजनीति से लेकर उद्योग-व्यवसाय में भारतीयों की प्रभावी उपस्थिति झलकती है। हमें वहां ऐसे भारतीय भी मिले जो तीन पीढी से हैं तमाम ऐसे भी जो छह-सात पीढियों से वहां हैं। दो-तीन पीढियों से जो लोग हैं, उनके भारतीय जडों से संपर्क तो कायम हैं लेकिन जो छह-सात पीढियों से हैं, उनमें अब अपनी मूल भारतीय जडों की तलाश जोरों से ललक मार रही है। वहां का पर्यटन विभाग इसमें भी व्यावसायिकता की संभावनाएं देख रहा है। जोर इस बात का है कि लोग तमिलनाडु और केरल में बसे अपने मूल लोगों को तलाशें। उन्हें आमंत्रित करें। हमारे गाइड दत्ता नघेसन, जिनके पूर्वज मूल रूप से केरल के रहने वाले थे, उनका कहना था कि इससे दोहरे पर्यटन की संभावनाएं उपजती हैं। हम वहां जाएंगे और वो यहां आएंगे। मलेशियाई पर्यटन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी चंद्रा सेहगरन थंगास्वामी, जो संयोग से भारतीय मूल के हैं, उनका कहना है कि हम अपने तमाम संस्कारों को भूल गए हैं, हमारे तमाम संस्कार और रीति-रिवाज यहां की शैली से गड्ड-मड्ड हो गए हैं। अगर भारत से हमारे गांव-खानदान के लोग यहां आएंगे, हमारे त्योहारों और पारिवारिक कार्यक्रमों में शामिल होंगे तो हमें अपने वास्तविक रीति-रिवाजों और संस्कारों को समझने में मदद मिलेगी। हमारे संस्कार संशोधित होंगे, परिवर्धित होंगे, परिशोधित होंगे।
आसमान से बातें करती तरक्की
कुदरत ने तो सभी को कुछ न कुछ नायाब चीजें बख्शी हैं लेकिन उन्हें कैसे सहेजा जा सकता है, संवारा जा सकता है, इसे देखना हो तो मलेशिया एक बेहतर जगह हो सकती है। पाम के मीलों लंबे खेत फोटोजेनिक हो सकते हैं और टिन की बेकार हो चुकी गहरी खदानें न सिर्फ वाटर पार्क में तब्दील हो सकती हैं बल्कि शहर की जलापूर्ति में भी भरपूर मददगार हो सकती हैं। कई किलोमीटर तक फैली एक शानदार सुंदर झील के पहले का चित्र देखकर विश्वास ही नहीं हुआ कि टिन माइनिंग के चलते बंजर वीराना हो चुका इलाका आदमजात के हाथों प्राकृतिक सौंदर्य को मात करने वाली सुंदरता हासिल कर सकता है। अगर हम आजाद मलेशिया की बात करें तो वो भारत से कुल दस साल छोटा है। यानी मलेशिया को ब्रिटिश राजशाही से 1957 में आजादी मिली, महीना अगस्त का ही था। 13 राज्यों और अपने यहां के चंडीगढ की तरह तीन संघ शासित राज्यों वाला ये मुल्क घोषित इस्लामी देश है। आम तौर तरीकों से लेकर कानूनी बंदिशों तक हर जगह इस्लामी आग्रह पूरी शिद्दत से मौजूद है। लेकिन.. धार्मिक आग्रहों के बीच व्यावसायिक-औद्योगिक तालमेल जबर्दस्त है।
आर्थिक उबाल के रास्ते में धार्मिक बंदिशों का ठंडापन आडे नहीं आता। आपको बाहर से जो इमारत एक सितारा होटल की तरह लग रही है, दरअसल वो आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं से भरपूर एक अति आधुनिक अस्पताल हो सकता है या किसी अमेरिकन-यूरोपीय यूनिवर्सटी की फ्रेंचाइजी। पूर्ण सरकारी खर्चे पर प्राथमिक (बेसिक) शिक्षा अनिवार्य है और उसमें भी स्कूली शिक्षा में अंग्रेजी की एकदम अनिवार्यता है।
मलेशिया ने ये काफी पहले समझ लिया था कि टिन, रबर, पाम और पेट्रोलियम जैसे परंपरागत साधनों के बल पर ही वो सब कुछ नहीं हासिल किया जा सकता जो आर्थिक रूप से मजबूत एक मुल्क के लिए जरूरी है। उसने पर्यटन को भविष्य की भरपूर संभावनाओं के तौर पर देखा और सबसे पहले अपनी तस्वीर बदलने की ठानी। आधुनिक मलेशिया के निर्माता कहे जाने वाले डॉ. महातिर मोहम्मद की धारणा ही यही थी कि तस्वीर बदलेगी तो तासीर भी बदलेगी और तदबीर भी। खासकर पश्चिमी मलेशिया में उन्नत राजमार्ग, दुनिया के महंगे से महंगे ब्रांड्स से भरे पडे विशालकाय माल्स और गगनचुंबी इमारतें, भूख और बेकारी की समस्या से अभी भी जूझ रहे दक्षिण एशिया की तस्वीर को धुंधली करने की कोशिश करते दिखते हैं। ये बात अब पूरे दम से नहीं कही जा सकती कि दुनिया की सबसे ऊंची जुडवां इमारत पेट्रोनास को शहर के हर हिस्से से देखा सकता है। दर्जनों आसमान छूती इमारतें उससे होड लेती दिखती हैं। लोगों की नजरों में कुआलालंपुर भले ही दुनिया की सर्वाधिक व्यवस्थित आकर्षक राजधानियों में एक थी, लेकिन इस देश ने एक और नई राजधानी बनाने की ठानी, जो पहले प्रधानमंत्री तुंकु अब्दुल रहमान पुत्रा के नाम पर पुत्राजया के रूप में आज दुनिया के सामने है। इतने कम समय में इतने व्यापक और विस्तृत निर्माण के लिए नजीर के तौर पर पेश किये जाने वाले इस शहर को मुल्क का एक वर्ग सफेद हाथी के रूप में भी मानता है, खासकर वाम विचारों के लोग।
बेशक तमाम उजालों के अंधेरे पहलू भी होते हैं। विकास की तमाम तहों में मलेशिया में भ्रष्टाचार भी रह-रह कर उघडता है और कई बडे पदों पर बैठे हुए लोगों के दामन दागदार हुए हैं, खुद डॉ. महातिर मोहम्मद भी आरोपों से बचे नहीं। चकाचौंध के बीच रातभर जागने वाले शहर कुआलालंपुर में रंगीनियों की अपनी अलग दुनिया है, उसमें जिस्मानी कारोबार का सबब बना दूसरे मुल्कों से अवैध आव्रजन का मामला भी शुमार है और अंडरवर्ल्ड का भी। शुद्धता का हामी यहां का एक तबका ये डर जताने में संकोच नहीं करता कि कि चौतरफा आधुनिकता की जबरदस्त होड सुदूर गांवों में छिपी पाक मलय संस्कृति को अपनी ओर खींच रही है। एक तबका अब शहरों से गांवों को दूर रखने के लिए आंदोलित है, उसका कहना है कि मलेशिया सिर्फ सात सितारा होटलों, लंबे चौडे राजमागरें और जिंटेंग हाईलैंड्स जैसे अजूबों की वजह से ही नहीं है, मलेशिया उस मलय शब्द से है जिसका मूल मलय या संस्कृत में एक अर्थ होता है पवित्र पहाडों के बीच बसा पवित्र देश।



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