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| GAZALA KHAN |
‘सीधा सादा डाकिया जादू करे महान, एक ही थैले में भरे आंसू और मुस्कान’ निदा फाजली के ये शब्द घर-घर जाकर चिट्ठियां बांटने वाले डाकिए की पूरी कहानी बयां करते हैं और उसके महत्व को दर्शाते हैं। ‘नाइदर रेन नॉर स्नो डे’ सात सितंबर को मनाया जाता है। लोग ‘नाइदर रेन नॉर स्नो’ को अमेरिकी डाक सेवा का मोटो मानते हैं हालांकि इसका कोई आधिकारिक मोटो नहीं हैं। यह लाइन डाक वितरित करने वालों की मेहनत और किसी भी मौसम, किसी भी स्थिति में काम के प्रति उनके समर्पण की याद दिलाती है।
आज की मोबाइल और एसएमएस वाली पीढ़ी भले ही डाकिए याच्चिट्ठियों का महत्व न समझती हो, लेकिन आज से कुछ साल पहले जब मोबाइल या इंटरनेट वगैरह नहीं थे तब स्थिति इससे एकदम अलग थी। तब सचमुच डाकिए को भगवान का रूप माना जाता था जो लोगों को उनके अपनों की, उनके सुख-दुःख की खबर देता था। पूछ कर देखिए अपनी मां, दादी या नानी से, किस तरह डाकिए का इंतजार किया जाता था। जिस समय वह गुजरता लोग घरों के दरवाजे पर यह पूछने के लिए उसकी राह देखते खड़े रहते कि उनकी कोई चिट्ठी तो नहीं है, खासकर उस समय जब उन्हें किसी अपने के पत्र का इंतजार होता। खबर अच्छी होने पर बाकायदा डाकिए का मुंह मीठा कराया जाता। शादी ब्याह जैसी खुशखबरी हो या किसी के निधन की दुखद खबर डाकिया ही उन्हें चिट्ठियों के माध्यम से बांटता। गांव देहात में तो डाकिया लोगों को चिट्ठियां बांटने के साथ ही पढ़ने का काम भी करता था। जो लोग अनपढ़ होने की वजह से पत्र नहीं पढ़ पाते थे, डाकिया उन्हें चिट्ठी पढ़ कर सुनाता। 45 वर्षीय शशि शेवडे़ ने कहा कि आज भले ही डाकिए का महत्व कुछ कम हो गया हो लेकिन पहले वह एक दिन न आए तो लोग परेशान हो जाते थे।
http://www.visharadtimes.com/
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