Sunday, 4 September 2011

उम्मीद आपका नाम है!

GAZAL KHAN
क्या आप अपने बेटे या बेटी पर भरोसा करते हैं? याद रखिए कि इस समय कठघरे में आप हैं और फैसला भी आपको ही करना है। इसलिए आकलन पूरी ईमानदारी से कीजिएगा। दूसरा सवाल क्या आपके बच्चे आप पर भरोसा करते हैं?
आप असमंजस में हैं?
बड़े हो रहे बच्चों की सोच और व्यवहार में तेजी से परिवर्तन आता है। ये बदलाव ज्यादातर अभिभावकों को डरा देते हैं। भय सीमाओं को रेखांकित करता है और सीमाएं पहरों को। बस, यहीं से अविश्वास का बीज अंकुरित होने लगता है। यह स्थिति दोनों के बीच एक द्वंद्व को जन्म देती है। रही सही कसर संवादहीनता से पूरी हो जाती है। रास्ते अलग होते जाएंगे, तो दिशाएं एक रह पाना मुश्किल है।
समय जब मिलता है
जैसे ही दूरियां बढ़ती हैं, एक-दूसरे के साथ बिताने के लिए समय कम होता जाता है। जब समय मिलता है, तो उसमें अभिभावकों को लगता है कि वे बच्चे का उन मामलों पर मार्गदर्शन कर लें, जिनमें वे कमी पाते हैं। इससे बच्चे को लगता है कि वे मीनमेख निकाल रहे हैं और वह और कटने लगता है।
साथ छूटा, भरोसा टूटा
युवावस्था की दहलीज पर कदम रखे बच्चे अपने बड़े होने को लेकर बेहद उत्साहित होते हैं। वे अपने फैसले खुद लेना चाहते हैं। घर के मार्गदर्शन को वे आलोचना मानने ही लगते हैं, सो दोस्तों की अहमियत बढ़ने लगती है। बच्चों की इस कच्ची उम्र से वाकिफ अभिभावक अब और ज्यादा ही सचेत हो जाते हैं। उन्हें जिम्मेदारियों के निर्वाह, लोगों की परख और सही और गलत में फर्क कर पाने को लेकर बच्चों की समझ पर संशय होता है। ये संशय अभिभावकों को बात-बात पर बच्चों को समझाइश देने या सवाल पूछने के लिए प्रेरित करता है। कुल मिलाकर हालात बिगड़ते चले जाते हैं।
1. बच्चे पहले ही मान लेते हैं कि माता-पिता उनकी बातों को एक बार में नहीं मानेंगे, इसलिए अपनी बात रखने के साथ-साथ वे विरोध दर्ज करने के लिए भी तैयार रहते हैं और मौका पड़ते ही पूरी ताकत लगा देते हैं। फिर संवाद नहीं सिर्फ तर्क-विर्तक होता है। इससे रिश्तों में कड़वाहट का शामिल होना लाजमी है। दो-तीन ऐसे वाकये बच्चे को विश्वास दिला देते हैं कि आप अभिभावक उसकी बातों को कभी नहीं समझ पाएंगे। इसलिए धीरे-धीरे वह अपनी बातों को बांटना छोड़ देता है और अपनी दुनिया में व्यस्त होने लगता है।
2. माता-पिता बच्चे के लिए आईना होते हैं। आपकी तारीफ उन्हें बेहतर प्रदर्शन करने की प्रेरणा देती है। आपके भरोसे को कायम रखने के लिए वह जी-जान से कोशिश करते हैं। लेकिन जब वे इसी भरोसे को डगमगाते देखते हैं, तो उनके आत्मविश्वास को चोट पहुंचती है। इस बात को समझिए कि बच्चे की हर बात को लेकर आपका संदेह, उसे खुद पर भी भरोसा करने नहीं देगा। ऐसे में वह हीन भावना से घिरने लगेगा। अपनी खूबियों को नजरअंदाज करेगा। इन बातों का सीधा असर उसके मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास पर पड़ेगा।
क्या करें
स्वस्थ संवाद कीजिए। ध्यान रखें कि संवाद तभी होता है, जब दोनों पक्ष एक-दूसरे को सुनें। आपको बच्चे की बातों न सिर्फ सुनना है, बल्कि उसे समझने की कोशिश भी करना है। जैसे-जैसे आपके बीच संवाद की डोर मजबूत होगी, अविश्वास की गुंजाइश कम होती जाएगी। बच्चे को क्या और क्यों मना किया जा रहा है, साफ-साफ बताइए। यह बचपन से करें, तो और बेहतर। बच्चे को छोटी-छोटी जिम्मेदारियां सौंपिए। यदि कोई कमी रह गई हो, तो उसके बारे में भी प्यार से बताएं। आपका भरोसा उसका सम्बल है। सकारात्मक रवैया अपनाएं। बच्चे की संगत और उसके दोस्तों के बारे में शक के साथ नहीं, बल्कि केवल जानकारीपरक बातें करें। उम्र के इस पड़ाव में बच्चे आजादीभरा माहौल चाहते हैं। यदि आपको बच्चे के रहन-सहन को लेकर कोई आपत्ति है, तो उसे डांटने के बजाय अपना तर्क रखें। बच्च खुद-ब-खुद समझ जाएगा। आपके दिए भरोसे के कारण ही आपका बच्च एक भरोसेमंद इंसान बन पाएगा। जो आपसे पाएगा, वो उसके व्यक्तित्व में झलकेगा। आप उसकी उम्मीद बनेंगे, वो आपका भरोसा।

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