मुन्नार की मखमली खूबसूरती से तीन दिन तक रू-ब-रू रहने के बाद हमारी टोली ऊटी के लिए रवाना हुई तो एक उदासी-सी मन में थी। एक तो जन्नत जैसे मुन्नार से हम विदा ले रहे थे जहां से वापस आने का दिल शायद ही किसी का करे। दूसरे, मन में यह सवाल बार-बार सिर उठा रहा था कि मुन्नार को देखने के बाद ऊटी कहीं फीका लगा और अगले दो दिन बेकार चले गए, तो? मुन्नार से कोयम्बटूर और वहां से आगे ऊटी जाने के लिए यूं तो अच्छी सडक है, पर चूंकि टोली में आठ-दस बच्चे और कुछ महिलाएं भी थीं, तो बेहतर यही था कि सडक के मुश्किल सफर के बजाय ऊटी तक की दूरी ट्रेन से तय की जाए। इस फैसले की वजह मेट्टूपालयम से ऊटी तक घुमावदार पहाडी रास्तों पर रेंगने वाली टॉय ट्रेन भी थी जो खासकर बच्चों के लिए मजेदार अनुभव होता।
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| ARVISH KHAN |
छुक-छुक रेलगाडी पर मुन्नार को अलविदा कहकर हम बस से कोच्चि पहुंचे, जहां से कोयम्बटूर और फिर आगे मेट्टूपालयम तक हमें ट्रेन से जाना था। मेट्टूपालयम कस्बा कोयम्बटूर से 35 किलोमीटर की दूरी पर है और यहां तक बडी लाइन की ट्रेनें जाती हैं। सफर का असल रोमांच मेट्टूपालयम से शुरू होता है जहां से नैरोगेज लाइन पर चार डिब्बों वाली ट्रेन ऊटी के लिए निकलती है। नीलगिरी पहाडियों में चीड के पेडों के बीच से मंद गति से तय होता यह सफर बेहतरीन कुदरती नजारे हमारे सामने पेश कर रहा था। कहीं ऊंचाई से गिरते पानी का शोर था, कहीं पहाडों ने अपने हरे चोगे पर सफेद बादल कंगन की तरह टांग रखे थे, तो कहीं सांप की तरह रेंगती सडक हमसे आ मिलने को बेताब दिख रही थी। रास्ते में प्रहरी की तरह खडे ऊंचे पेड और कुछ पलों के लिए ट्रेन को निगल लेने वाली सुरंगें हमारे रोमांच को दूना करने में कोई कसर नहीं छोड रहे थे। जैसे ही ट्रेन सुरंग के अंधेरे में समाती, यात्रियों का जोशभरा शोर उस अंधेरे पर भारी पडता दिखता। इस पूरे सफर के दौरान दिक्कत थी तो सिर्फ एक, और वो यह कि इस छुटकी-सी ट्रेन में बैठने की जगह बेहद तंग थी। लेकिन इस दौरान अगर आप खुद को कुदरत के मोहपाश में जकडे रहने देते हैं तो इस दिक्कत का एहसास ही नहीं होता।
एक सफर में दो रंग
ऊटी तक के ट्रेन के इस सफर को हम दो हिस्सों में बांट सकते हैं। पहला, मेट्टूपालयम से कुन्नूर। यहां ट्रेन स्टीम इंजन से चलती है। स्टीम इंजन है तो जाहिर है ट्रेन की चाल भी बेहद धीमी रहती है। कुन्नूर तक चढाई ज्यादा तीखी है जिसे स्टीम इंजन अपनी कछुआ चाल से बडी आसानी से तय कर लेता है। पूरा रास्ता चट्टानी है, रास्ते में ऊंचे पेड हैं और अनेक छोटे-बडे पुल भी। कुन्नूर इस रेलखंड का एक अहम स्टेशन है जहां गाडी काफी देर रुकती है। खाने-पीने के यहां बेहतर बंदोबस्त हैं। कुन्नूर में ट्रेन स्टीम इंजन का दामन छोडकर डीजल इंजन को अपना सारथी बनाती है, और शुरू हो जाता है सफर का दूसरा हिस्सा जो कहीं ज्यादा सुकून देने वाला है। कह सकते हैं कि ऊटी का असल रंग दिखना यहीं से शुरू होता है। चाय के तराशे हुए बौने पौधे ऊंचे पेडों की जगह ले लेते हैं। अभी तक जो गहरा हरा रंग आंखों तक पहुंच रहा था, उस पर लगता है जैसे प्रकृति ने दिल खोलकर धूप मसल दी हो। चारों तरफ खिली हुई हरियाली.. मन को प्रफुल्लित करती हरियाली। और इस हरियाली के बीच गर्व से सिर उठाए खडे छोटे-छोटे घर.. एक अलग ही दृश्य है यह, जो एक बार दिल पर छप गया तो फिर कभी धूमिल होने वाला नहीं।
बादलों का है अलग रिश्ता
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समुद्र तल से 2240 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ऊटी अंग्रेजों का समर रिजॉर्ट हुआ करता था। मूल रूप से यह इलाका टोडा जनजाति का घर है। उन्होंने अंग्रेजों को अपनी जमीन का एक बडा हिस्सा दे दिया था, जिस पर अंग्रेजों ने शहर बसाया। इस इलाके का असल नाम ऊटकमंड है, इसी को अंग्रेजों ने छोटा करके ऊटी कर दिया। हालांकि, अब शहर का आधिकारिक नाम उदगमंडलम है जो ऊटकमंड का तमिलीकरण है। पांच घंटे के सफर के बाद दिन में करीब 12 बजे ट्रेन उदगमंडलम स्टेशन पर जा लगी तो बूंदाबांदी हो रही थी। हम लोग मानसून के दौरान वहां गए थे। इस मौसम में बादलों का दिल कब हो जाए ऊटी को भिगोने का, कह नहीं सकते। बादलों का ऊटी से अलग ही रिश्ता है। जब-जब दिल करता है, ये बादल किसी बेसब्र प्रेमी की तरह आकर ऊटी को अपने आगोश में ले लेते हैं। इसका प्रमाण ऊटी की गोद में विचरण करते वक्त मिला। बादल चेहरे पर आ-आकर ठहरते और पानी के कण गालों पर छोडकर आगे निकल जाते। बारिश मुन्नार में भी खूब देखी हमने.वहां भी बादल पहाडों व पेडों के साथ अठखेलियां करते दिखे। लेकिन वहां के अप्रतिम सौंदर्य को बादल अपने आलिंगन में नहीं लेते। मानो, कोई झिझक उन पर तारी रहती हो। लेकिन ऊटी में समीकरण अलग है। यहां बादल आएंगे तो पहले प्यार में डूबकर हर गोशे को छुएंगे और फिर भावुक होकर बरस पडेंगे।
खूबसूरत शहर और चाय फैक्टरी
ऊटी की सुंदरता की किसी और जगह से तुलना बेमानी है। नीलगिरी की गोद में एक चुप्पी ओढे शहर की तस्वीर पेश करता है यह। बडे नाम वाले हिल स्टेशनों के मुकाबले जिंदगी बहुत तेज नहीं है यहां। ऊंचाई से देखो तो अंग्रेजी स्टाइल में बने घरों की छटा अलग ही है। घरों के जमावडे के बीच से झांकता वहां का मशहूर रेसकोर्स.. इसके अलावा हरे-भरे बाग, झील, गोल्फ कोर्स, स्टेशन परिसर.. हमने ऊटी का यह विहंगम नजारा डोडाबेटा टी फैक्टरी की बालकनी से देखा। यह दक्षिण भारत में सबसे ज्यादा ऊंचाई पर बनी टी-फैक्टरी है। पांच रुपये की टिकट पर चाय बनाने की प्रक्रिया यहां देख सकते हैं। ताजा चाय की महक में तलब लगना लाजिमी है। लीजिए, इलायची वाली चाय का कप भी हाजिर है आपके लिए। चुस्की लीजिए और तर-ओ-ताजा हो जाइए। यहां कई तरह की चाय बिक्री के लिए भी उपलब्ध है। हमारे साथियों ने कितनी खरीदारी की यहां, इसका पता बाहर आकर चला जब हरेक के हाथ में दो-दो थैले झूलते नजर आए।
कई रंग हैं ऊटी में
हमारे सामने ऊटी शहर अपने विविध रंगों को लेकर शान से खडा था। घूमने-फिरने के लिए ऊटी में और इसके आस-पास कई जगहें हैं। ऊटी की बात करें तो सबसे पहले जिक्र झील का आएगा। स्टेशन से दो किलोमीटर की दूरी पर मौजूद इस कृत्रिम झील पर सैलानियों तथा छुट्टी बिताने आए स्थानीय लोगों की भीड हमें नजर आई। 190 साल पहले यह झील जॉन सुलिवन ने बनवाई थी। यहां पर नौका विहार का आनंद लेने से हम खुद को नहीं रोक पाए। नाव में आधे घंटे तक झील की सैर के दौरान कितने ही प्यारे-प्यारे नजारों ने हमें बांधे रखा। यहां नौका विहार के अलावा मनोरंजन के अन्य साधन भी हैं, खासकर बच्चों के लिए। टॉय ट्रेन आपको झील के किनारे-किनारे चक्कर कटाकर लाती है तो लेक गार्डन में थोडी देर सुस्ताना सारी थकान भगा देगा। इसके अलावा, खाने-पीने व शॉपिंग के भी यहां खासे विकल्प नजर आए। झील के पास ही ऊटी का मशहूर थ्रेड गार्डन है, जहां धागे से रंग-बिरंगे फूल बनाए जाते हैं। यहां की खासियत है कि फूलों को हाथ से बनाया जाता है और इन्हें बनाने में सुई का इस्तेमाल भी नहीं होता। इसके अलावा, दुनियाभर में मशहूर बॉटेनिकल गार्डन यहां है जहां हजारों प्रजातियों के पेड-पौधे हैं। 22 एकड में फैले इस गार्डन में हर साल मई में होने वाले फ्लावर शो में बडी तादाद में लोग पहुंचते हैं। यहां एक अन्य आकर्षण एक पेड का करीब दो करोड साल पुराना जीवाश्म है। बॉटेनिकल गार्डन के पास ही चिल्ड्रन पार्क है। यहां जाएंगे तो लगेगा कि मखमल का कोई गलीचा आपके सामने बिछा हुआ है। बच्चों का दिल अगर यहां से आने को न करे तो इसमें उनका कोई कुसूर नहीं। ऊटी का एक अन्य आकर्षण छह एकड में फैला रोज गार्डन है। यह विजयनगरम इलाके में एल्क हिल की ढलान पर है जहां गुलाब के 17,000 से ज्यादा पौधे हैं। तभी तो इसे देश का सबसे बडा रोज गार्डन होने का गौरव हासिल है। इसके अलावा, गोल्फ कोर्स व रेस कोर्स की हरियाली वहां जाने वाले को अपने जादू में बांध लेने के लिए काफी है।
आस-पास भी बहुत कुछ
ऊटी व आस-पास घूमने के लिए हमने एक दिन के लिए छोटी बस किराये पर ली थी। मानसून में ऑफ सीजन होता है, तो हमें यह बेहद कम दाम में उपलब्ध हो गई। ऊटी में तो हम जगह-जगह घूमे ही, ऊटी के आस-पास भी बहुत-से ऐसे स्थान थे जहां जाकर हम रोमांचित हुए बिना नहीं रह सके। पहले जिक्र करते हैं ऊटी से आठ किलोमीटर दूर और समुद्र तल से 2623 मीटर की ऊंचाई पर स्थित डोडाबेटा शिखर की। यहां पूर्वी व पश्चिमी घाटों का मिलन होता है। यहां से नीलगिरी पहाडियों का अकल्पनीय दृश्य नजर आता है। डोडाबेटा शिखर शोला वनों से घिरा है। पर्यटन विभाग ने यहां एक दूरबीन भी लगा रखी है जिससे आस-पास के दृश्यों को बेहतर तरीके से देखा जा सकता है। हमारे पास ऊटी में दो दिन ही थे, इसलिए सभी स्थान देखना संभव नहीं था। ऐसे में हमने रुख किया मैसूर रोड पर पायकरा तक का। पायकरा तक ज्यादातर इलाका संरक्षित वनक्षेत्र है, इसलिए हर जगह जाने की अनुमति नहीं है। लेकिन रास्ते में बहुत-सी ऐसी जगहें हमने देखीं जहां खो जाने का मन करता रहा। ऊटी की तरह पायकरा में भी झील है, जहां नौका विहार किया जा सकता है। ऊटी की तरह यहां भी खाने-पीने की सुविधाएं ठीक-ठाक हैं। झील से थोडी दूरी पर एक झरना भी है। झरना तो बहुत खास नहीं था, लेकिन झरने की तरफ जाते वक्त ऐसा दृश्य सामने था जिनका वर्णन परीकथाओं में ही दिखता है। इसे अपलक निहारने के अलावा आप कुछ और कर ही नहीं सकते। यह दृश्य मेरी स्मृतियों में बहुत गहरे कैद है और इसे आपसे शब्दों व तस्वीरों के जरिये ही साझा किया जा सकता है। पायकरा के रास्ते में ही चीड वन है जहां वृक्षों को बेहद व्यवस्थित तरीके से उगाया गया है। इस जगह आकर हमें कुछ खूबसूरत दृश्यावलियां देखने को मिलीं। चारों तरफ हरियाली का राज.. बादलों से पहली मुलाकात भी यहीं पर हुई थी। यहां आस-पास टोडा जनजाति के लोगों के घर भी हैं, लेकिन उन्हें दूर से ही देखा जा सकता है।
वेनलॉक का जादू
टोडा जनजाति के घरों को तो हमने दूर से देखा, लेकिन वेनलॉक के नैसर्गिक सौंदर्य को हम अपने भीतर भरकर ले लाए। सफेद बादलों में लिपटी चटख हरे रंग की पहाडियां.. हर बार पलकें उठाते ही भीतर एक पूरी दुनिया आबाद हो रही थी, और हर सांस के साथ मानो अमृत घुलता जा रहा था शरीर में। यह स्थान ऊटी से छह मील व नौ मील के बीच स्थित है। स्थानीय लोग बोलचाल में इसे फिल्म शूटिंग पॉइंट कहते हैं। चाय की खेती होने से पहले नीलगिरी पर्वतमाला की हर पहाडी ऐसी ही होती थी। हल्की ढलान वाली इन बल खाती हुई पहाडियों की तुलना ब्रिटेन के यॉर्कशर डेल्स से की जाती है। पहले तो हमने सोचा कि बारिश में कौन चढेगा पहाडी के ऊपर, चलो रहने देते हैं। लेकिन फिर हिम्मत की तो ऊपर जाकर पता चला कि हमसे क्या छूटने जा रहा था। एक पहाडी की ढलान दूसरी पहाडी की ढलान में मिल रही थी। दूर तक जन्नत के सिवा कुछ नहीं था। ये क्या! अभी-अभी जो जगह साफ दिख रही थी, उसे अचानक सफेद जलकणों ने ढक लिया था। ठंड से हम कांप रहे थे और कानों के सिरे लाल हुए जा रहे थे। लेकिन यकीन मानिए, वहां से वापस आने के लिए मन को समझाना मुश्किल हो रहा था। हमारे सामने जो था, वो किसी स्वप्न से कम नहीं था। हमारा ऊटी आना सफल हो गया था।
ऊटी जा रहे हैं तो..
1.ऊटी में झील परिसर में जाने के लिए टिकट लगता है। लेकिन पायकरा में यह निरूशुल्क है। वहां केवल नौका विहार के पैसे हैं।
2.डोडाबेटा व पायकरा बोट हाउस पर खाने-पीने की व्यवस्था है। बाकी जगहों पर ठेले व रेहडियों पर खाने-पीने का सामान मिल जाता है। अगर आप स्ट्रीट फूड खाने से बचना चाहते हैं तो अपने साथ कुछ ले जाएं।
3.ऊटी में चाय के बागानों का नजारा आते-जाते हो जाता है, लेकिन नजदीक जाकर देखना चाहते हैं तो टैक्सी वाले से पता कर लें कि दिनभर के टूर में यह शामिल है कि नहीं।
4.ताजा चाय के अलावा होम-मेड चॉकलेट व कई तरह के औशिधीय तेल भी ऊटी में मिलते हैं। बेहतर है, इन्हें सरकारी मान्यता प्राप्त दुकानों से ही खरीदें ताकि शुद्धता की गारंटी रहे।
http://www.visharadtimes.com/
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