Monday, 12 September 2011

भारतीय महिलाओ का बाजारी करण

Gazala Khan
भारतीय महिलाओ को आजकल विज्ञापन के माध्यम से बाजार में परोसा जा रहा है। जिससे भारतीय सभ्यता और समाजिक मान्यताओ पर गहरा असर पड रहा है। अब तो देश की सर्वश्रेष्ठ अदालत ने भी नये बाजार को मान्यता देने के लिये विचार शुरू कर दिया है। 
एक वह बाजार है, जो परंपरा से सजा हुआ है और दूसरा वह बाजार है, जिसने औरतों के लिए एक नया बाजार पैदा किया है। जबकी महिलाओ के शरीर की नुमाइश कर मीडिया लोकप्रियता (टीआरपी) बढाने में चौबिसो घंटे प्रयासरत रहती हैं।
 
समय-समय पर देहव्यापार को कानूनी अधिकार देने की बातें इस देश में भी उठती रहती हैं। हर मामले में दुनिया की नकल करने पर आमादा हमारे लोग वैसे ही बनने पर उतारू हैं। जाहिर तौर पर यह संकट बहुत बड़ा है। ऐसा अधिकार देकर हम देह के बाजार को न सिर्फ कानूनी बना रहे होंगे, बल्कि मानवता के विरुद्ध एक अपराध भी कर रहे होंगे।
हम देखें तो सुप्रीमकोर्ट की पहल के बाद एक बार फिर वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता देने की बातचीत तेज हो गई है। यह बहस हाल में ही सुप्रीमकोर्ट द्वारा इस मामले में वकीलों के पैनल व विशेषज्ञों से उस राय के मागने के बाद छिड़ी है, जिसमें कोर्ट ने पूछा है कि क्या ऐसे लोगों को सम्मान से अपना पेशा चलाने का अधिकार दिया जा सकता है? उनके संरक्षण के लिए क्या शर्ते होनी चाहिए?
कुछ समय पहले काग्रेस की सासद प्रिया दत्त ने वेश्यावृत्ति को लेकर एक नई बहस छेड़ दी थी, तब उन्होंने कहा था, ‘मेरा मानना है कि वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता प्रदान कर देनी चाहिए ताकि यौन कर्मियों की आजीविका प्रभावित न हो।’ प्रिया के बयान के पहले भी इस तरह की मागें उठती रही हैं। कई संगठन इसे लेकर बात करते रहे हैं। खासकर ‘पतिता उद्धार सभा’ ने वेश्याओं को लेकर कई महत्वपूर्ण मागें उठाई थीं।
हमें देखना होगा कि आखिर हम वेश्यावृत्ति को कानूनी जामा पहनाकर क्या हासिल करेंगे? क्या भारतीय समाज इसके लिए तैयार है कि वह इस तरह की प्रवृत्ति को सामाजिक रूप से मान्य कर सके। दूसरा विचार यह भी है कि इससे इस पूरे दबे-छिपे चल रहे व्यवसाय में शोषण कम होने के बजाए बढ़ जाएगा। आज भी यहा स्त्रिया कम प्रताड़ित नहीं हैं। 
दुनिया भर की नजर इस समय औरत की देह को अनावृत करने में है। ये आकड़े हमें चौंकाने वाले ही लगेंगे कि 100 बिलियन डॉलर के आसपास का बाजार आज देह व्यापार उद्योग ने खड़ा कर रखा है। हमारे अपने देश में भी 1 करोड़ से ज्यादा लोग देह व्यापार से जुड़े हैं, जिनमें पांच लाख बच्चे भी शामिल हैं।
सेक्स और मीडिया के समन्वय से जो अर्थशास्त्र बनता है, उसने सारे मूल्यों को शीर्षासन करवा दिया है। फिल्मों, इंटरनेट, मोबाइल, टीवी चैनलों से आगे अब वह मुद्रित माध्यमों पर पसरा पड़ा है। प्रिंट मीडिया जो पहले अपने दैहिक विमर्शाे के लिए ‘प्लेबॉय’ या ‘डेबोनियर’ तक सीमित था, अब दैनिक अखबारों से लेकर हर पत्र-पत्रिका में अपनी जगह बना चुका है।
अखबारों में ग्लैमर वर्ल्ड के कॉलम ही नहीं, खबरों के पृष्ठों पर भी लगभग निर्वसन विषकन्याओं का कैटवाक खासी जगह घेर रहा है। वह पूरा हल्लाबोल 24 घटे के चैनलों के कोलाहल और सुबह के अखबारों के माध्यम से दैनिक होकर जिंदगी में एक खास जगह बना चुका है। शायद इसीलिए इंटरनेट के माध्यम से चलने वाला ग्लोबल सेक्स बाजार करीब 60 अरब डॉलर तक जा पहुंचा है। मोबाइल के नए प्रयोगों ने इस कारोबार को शक्ति दी है।
एक आकड़े के मुताबिक मोबाइल पर अश्लीलता का कारोबार भी पांच सालों में पांच अरब डॉलर तक जा पहुंचेगा।
बाजार के केंद्र में भारतीय स्त्री है और उद्देश्य उसकी शुचिता का अपहरण है। सेक्स सांस्कृतिक विनिमय की पहली सीढ़ी है। शायद इसीलिए जब कोई भी हमलावर किसी भी जातीय अस्मिता पर हमला बोलता है तो निशाने पर सबसे पहले उसकी औरतें होती हैं। यह बाजारवाद अब भारतीय अस्मिता के अपहरण में लगा है- निशाना भारतीय औरतें हैं।
ऐसे बाजार में वेश्यावृत्ति को कानूनी जामा पहनाने से जो खतरे सामने हैं, उससे यह एक उद्योग बन जाएगा। आज कोठेवालिया पैसे बना रही हैं तो कल बड़े उद्योगपति इस क्षेत्र में उतरेंगे। युवा पीढ़ी पैसे की ललक में आज भी गलत कामों की ओर बढ़ रही है, कानूनी जामा होने से यह हवा एक आंधी में बदल जाएगी। इससे हर शहर में ऐसे खतरे आ पहुंचेंगे। जिन शहरों में यह काम चोरी-छिपे हो रहा है, वह सार्वजनिक रूप से होने लगेगा। ऐसी कालोनिया बस जाएंगी और ऐसे इलाके बन जाएंगे।
संभव है कि इसमें विदेशी निवेश और माफिया का पैसा भी लगे। हम इतने खतरों को उठाने के लिए तैयार नहीं हैं। जाहिर तौर पर स्थितिया हतप्रभ कर देने वाली हैं। इनमें मजबूरियों से उपजी कहानिया हैं तो मौज-मजे के लिए इस दुनिया में उतरे किस्से भी हैं। भारत जैसे देश में लड़कियों को किस तरह इस व्यापार में उतारा जा रहा है, ये किस्से आम हैं। आदिवासी इलाकों से निरंतर गायब हो रही लड़किया और उनके शोषण के अंतहीन किस्से इस व्यथा को बयान करते हैं।
खतरा यह है कि शोषण रोकने के नाम पर देहव्यापार को कानूनी मान्यता देने के बाद सेक्स रैकेट को एक कारोबार का दर्जा मिल जाएगा।
सबसे बड़ा खतरा हमारी सामाजिक व्यवस्था के लिए पैदा होगा, जहा देह व्यापार भी एक प्रोफेशन के रूप में मान्य हो जाएगा। आज चल रहे गुपचुप सेक्स रैकेट कानूनी दर्जा पाकर अंधेरगर्दी पर उतर आएंगे। परिवार नाम की संस्था को भी इससे गहरी चोट पहुंचेगी। हमें देखना है कि क्या हमारा समाज इस तरह के बदलावों को स्वीकार करने की स्थिति में है। यह भी बड़ा सवाल है कि क्या औरत की देह को उसकी इच्छा के विरुद्ध बाजार में उतारना और उसकी बोली लगाना उचित है? क्या औरतें एक मनुष्य न होकर एक वस्तु में नहीं बदल जाएंगी, जिनकी बोली लगेगी और वे नीलाम की जाएंगी? स्त्री की देह का मामला सिर्फ श्रम को बेचने का मामला नहीं है।
देह और मन से मिलकर होने वाली क्रिया को हम क्यों बाजार के हवाले कर देने पर आमादा हैं, यह एक बड़ा मुद्दा है। औरत की देह पर सिर्फ और सिर्फ उसका हक है। उसे यह तय करने का हक है कि वह उसका कैसा इस्तेमाल करना चाहती है। इस तरह के कानून औरत की निजता को एक सामूहिक प्रोडक्ट में बदलने का वातावरण बनाते हैं। अपने मन और इच्छा के विरुद्ध औरत के जीने की स्थितिया बनाते हैं। यह अपराध कम से कम भारत की जमीन पर नहीं होना चाहिए।
स्त्री आज के समय में घर और बाहर दोनों स्थानों पर अपेक्षित आदर प्राप्त कर रही है। वह समाज को नए नजरिये से देख रही है। उसका आकलन कर रही है और अपने लिए निरंतर नए क्षितिज खोल रही है। ऐसी सामर्थ्यशाली स्त्री को शिखर छूने के अवसर देने के बजाए हम उसे बाजार के जाल में फंसा रहे हैं। वह अपनी निजता और सौंदर्यबोध के साथ जीने की स्थितिया और आदर समाज जीवन में प्राप्त कर सके, हमें इसका प्रयास करना चाहिए। हमारे समाज में स्त्रियों के प्रति धारणा निरंतर बदल रही है।
स्त्री सही मायने में इस दौर में ज्यादा शक्तिशाली होकर उभरी है, लेकिन बाजार हर जगह शिकार तलाश ही लेता है। वह औरत की शक्ति का बाजारीकरण करना चाहता है। हमें देखना होगा कि भारतीय स्त्री पर मुग्ध बाजार उसकी शक्ति तो बने, लेकिन उसका शोषण न कर सके।
आज मीडियामय और विज्ञापनी बाजार में औरत के लिए हर कदम पर खतरे हैं। पल-पल पर उसके लिए बाजार सजे हैं। देह के भी, रूप के भी, प्रतिभा के भी, कलंक के भी। हद तो यह कि कलंक भी पब्लिसिटी के काम आ रहे हैं, क्योंकि यह समय कह रहा है कि दाग अच्छे हैं। बाजार इसी तरह से हमें रिझा रहा है और बोली लगा रहा है। हमें इस समय से बचते हुए इसके बेहतर प्रभावों को ग्रहण करना है। सुप्रीमकोर्ट को चाहिए कि वह ऐसे लोगों की मंशा को समझे, जो औरत को बाजार की वस्तु बना देना चाहते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर महिलाओं के प्रति अपनी संवेदनशीलता का परिचय देते हुए परमादेश जारी किया है कि केंद्र और राच्य सरकारें एक सर्वेक्षण करके उन यौन कर्मियों के बारे में बताएं, जो अपने जीवन को बेहतर ढंग से जीने की इच्छा रखती हैं, ताकि उन्हें बेहतर और श्रेष्ठ कामों के मौके दिए जा सकें और वे एक सम्मानित जीवन जी सकें।
अपने आप में यह एक प्रगतिशील फैसला है, क्योंकि इससे यौनकर्म में दासता और अपमान का जीवन जी रही लाखों महिलाओं को मुक्ति की आशा और राह दिखाई दे रही है। बेशक यौन कर्मियों के पुनर्वास और तकनीकी हुनर विकास के लिए दिया यह आदेश स्वागत योग्य है, लेकिन इससे भी कई बड़े सवाल हैं, जो कहीं आगे सोचने पर मजबूर करते हैं। यौन कर्म या यौन व्यापार में शामिल महिलाओं का पुनर्वास समस्या का सिर्फ एक पक्ष है। उससे जुड़े और भी गंभीर मुद्दे हैं, जैसे पारिवारिक और सामाजिक स्वीकृति, सम्मान और पहचान, श्रम-मूल्य और उनके वैकल्पिक श्रम को मान्यता।
कड़वा सच तो यह है कि आज दलितों के पास श्रम विकल्प मौजूद हैं, मगर सामाजिक स्वीकृति न होने के कारण आज भी उन्हें अछूत माना जाता है। आज भी असंख्य लोग सामाजिक स्वीकृति के अभाव में अपने जातीय व्यवसाय को ही अपनाए रखने पर विवश हैं। पारिवारिक और सामािजक स्वीकृति के अभाव में कितनी ही यौनकर्मी महिलाएं जिल्लत और अपमान का जीवन जीने पर विवश होकर वापस इसी व्यवसाय में लौट आती हैं।
दुनिया के बहुत से देशों में यौन कर्म को एक वैध व्यापार के रूप में मान्यता प्राप्त है। वहा इसे इतनी हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता। यह भी एक प्रकार का श्रम ही माना जाता है। एक मजदूर अपनी मेहनत बेचकर मजदूरी प्राप्त करता है और एक कलाकार अपने कलात्मक श्रम का मूल्य पाता है। इसी तरह एक यौन कर्मी अपने कलात्मक दैहिक श्रम का मूल्य पाती है। इसलिए उसमें हेयता और तुच्छता की सोच नहीं होनी चाहिए। अन्य श्रम व्यापारों की ही भाति उसका भी नियमन और उसे मान्यता दी जानी चाहिए।
दूसरी बात यह कि आज यौन कर्म एक अवैध व्यापार है, मगर फिर भी वह धड़ल्ले से जारी है। आम आदमी से लेकर बड़े और सम्मानित जनों तक यौन कर्म की महिमा व्याप्त है। यौन कर्म को वैध करार दिए जाने से उससे जुड़े तमाम अवैध कार्याे और तरीकों को रोका जा सकता है। एक व्यापारी की भाति अपना पूरा मूल्य पाने का अधिकार यौन कर्मियों को मिल सकता है। उन्हें दलालों और पेशेवर व्यापारियों के जाल में फंसने से बचाया जा सकता है। बस जो होता है, वह चोरी छिपे होता है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण हमें अपने इतिहास से ही मिल जाता है।
न्यूजीलैंड, फिलिपींस, थाइलैंड, कनाडा जैसे देशों की भांति अगर भारत समेत दूसरे देशों में यौन कर्म एक वैध व्यापार के रूप में स्वीकृत होता है तो इससे यौन कर्मियों के साथ होने वाले भेदभाव, जबरदस्ती और हिंसा को रोका जा सकेगा। वैधता के रहते उन्हें अपना मूल्य, अपनी इच्छा-अनिच्छा और मोल-भाव करने की आजादी प्राप्त होगी। वे दलालों और ठेकेदारों के चंगुल से आजाद और आगाह होंगी। उन्हें देह-व्यापार के वैध और अवैध रूप के बारे में जानकारी होगी। यौन सावधानियों और सुरक्षा उपायों पर उनका नियंत्रण होगा। ठीक उसी तरह जैसे अन्य किसी भी तरह के व्यापार में व्यापारियों के हाथ में नियंत्रण होता है। यौन कर्मी स्त्रिया ग्राहक और ठेकदार पुरुषों के शोषण को चुनौती दे पाएंगी।
बेशक, पुनर्वास और तकनीकी हुनर विकास यौनकर्मियों के लिए एक बेहतरीन विकल्प है, मगर तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि पुनर्वास के बाद भी तमाम स्त्रियां इस व्यापार में लौट आती हैं। दरअसल, समाज में दोबारा उन्हें न तो परिवार स्वीकार करता है और न ही उन्हें सम्मानित दर्जा मिल पाता है। यौन कर्म को वैधता मिल जाने पर उनके बच्चों को समाज और शिक्षा की मुख्य धारा के साथ जोड़ा जा सकेगा। उनके बच्चों को बेहतर विकल्पों और श्रम क्षेत्रों में आगे बढ़ने के मौके दिए जा सकेंगे।
यौन कर्म की वैधता इस क्षेत्र में चोरी छिपे चल रहे व्यापारों और धाधलियों को रोक सकती है। एक व्यापार के रूप में शासकीय नियंत्रण में वह एक बेहतर व्यापारिक क्षेत्र साबित हो सकता है।

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